सुमित्रानंदन पंत ग्रंथावली

खण्ड तीन

सुमित्रानंदन पंत ग्रंथावली खण्ड तीन

उत्तरा रजत-शिखर शिल्पी सौवर्ण युगयुरुष छाया अतिमा

[9 | राजकाल प्रक्ायन

नपी दिल्‍ली पटना

कऊझूहाप २० ५० ०० दधात्ति जोगी

अधपम रासण्रण १६७६

अ्रबाराक राजकमल प्रशाणन प्राइवेट सिमिटेद ८, नेदाजी गुमाप भाग नपी दिल्ली ११०००२

धुश्छ छान प्रिटंस शाहदरा, दिली ११००३२

5४७६ ४४५२ #४।)/&२ ए/"दा (३२७०२॥॥४ »%।.! ६976८ 6 #07$% ५४7१ ५७४(४47730 ॥"30[ एफ८८ 7३६ 50 00

उत्तरा अस्तावता

उत्तरा युंग विषाद युग छाया थुग सघप युग मानव गीत विहग जामरण गान उदपोधन स्वप्न क्रात्त जगत घन ञआ नव्यथा उमेप आगमन मौन सजन युग विराग अचो के पवत प्रगति प्रतिक्रिया मनोमय उद्दीपन भू वीणा परिणय भू प्रागण जीवन उत्सव रूपातर भू यौवन भू जीवन मौन गुजन काव्य चेतना सम्मोहन हुदय चेतना निर्माण काल अनुभूति

अनुक़म

१७३ +

२५ २०५ २६ २६ र्८ र्प २६ ३० ३१ र२ ३३ ३३ ३४ ३४ ३५ इ्श ३६ ३७ ३७ रेप ३६ ३६ ४० ४० ४१ डर डर ४३ ४३ ही १.३. हि है ४५

श्रावाहन स्वम विभा नंद पावक गीत विभव भू वग शोभा क्षण युग दान जीवन कोपल जीवन दान स्वप्न वेभव सत्य

युग मन छाया सरिता सवेदन बदेही

प्रीति शरदागम शरद चेतना चद्रमुखी शरद श्री ममता

फूल ज्वाल स्मति

नमन

बादना मानव ईश्वर स्तवन अभिलापा विनय आद्धान आगमा स्पा परिणति जीवन प्रभात विजय क्रवगाहन प्रीति समपर्ण

प्रतीक्षा प्रमत्य ७० मुवित क्षण ७१ बन-श्री ७९ बसत्त डर रग मगल जरे रजत शिवर ७५-१७१ रजत शिषवर ३६ फूला का देश १०१४, उत्तर शत्ती शै२३ शुश्र पुरुष के विद्युत बसना की शरद चेतना १५६ शिल्पी १७३ २४४५ शिल्पी १७७ ध्वस शेप २०३ अप्सरा २३९ सौदण २४७ ३१६ सौवण २५१ स्वप्न और सत्य रपर३े विग्विजय ३०६ युग पुरुष ३२१ रेरेरे ह्त्प्पा इ४३ ३४७ अतिमा हेड६-४१२ नद अ्रस्णोदय ३४५४ गीतो वा दपण ३५४ नव जागरण ३५६ जिनासा ३५६ जम दिवस ३५७ रश्मि चरण घर प्राप्रो ३६१९ आवाहन श्ष्र प्राण तुम्हारी ताद्रल दीणा ३६४ स्मति ३६४ अत छ्ितिज ३६५ आत्म बोध २६५ मनमसिज ३६६ चद्रषेप्रत्ति ३६७ बाहर भीतर ३ेच७

ज्पाएँ

स्वप्नो ने पथ से घाग्रो झतिमा

प्रायता

धातति और कात्ति सोनजुदी

था धरती कितना देती है कौए वतखें मेढव प्रकाश पतिंगें छिपंकलियाँ श्रात्म दयी

केचुल

प्रस्तर्मानस

स्वण मृग

प्राणो वी सरसी एहो, रस वे सागर दिव्य कर्णा

ध्यान भूमि शिखरो से उतरो नव चत

प्राणो की द्वाभा सृजन वाछ्ि स्वयिम पावक जीवन प्रवाह विनापन

मुरली के प्रति विद्रोह वे' फूल गिरि प्रान्तर पत्र

दीपक

दोपक रचना

एहो, पावक वे पललव वन वेणु कुज

स्फ्थिक वन

युग मन के प्रति मेहरू युग

सदेश

अस्तित्ववाद

आत्म निवेदन झशभिवादन

लाक गीत चूर्माचल क॑ प्रति

३५८ हि दर & ३६६ ३७० ३७१ ३७३ ३७५ ३७७ ३७७ ३७८ ३७६ £ 8-55 इघ८० ३५८१ इ८घ२ ड्दैषर३े ३६३ ३०४ 3पघ4 ड्े८५्‌ ३५८७ ३८ इपप८ शेप ३६० ३६१ ३६२ श्ष्र ३६४ ३६६ ३६६ ३६७ श्ध्प ३६६ ३६६ ०१ ्र ०५, ४०४ ४0०५ ड्ए७

उत्तरा

[प्रथम प्रकाशन वष॒ १६४६]

प्रस्तावना

“उत्तरा' के भ्रचल में भूमिका के रूप में इन थोडे से शब्दों को बाध देना, आवदयक हो गया है, क्योकि इघर 'स्वणक्रिण' शरौर 'स्वणघूलि' को लेकर मेरी काव्य-बेतना के सम्बंध में प्रनेक प्रकार की भ्रातियों का प्रचार हुआ है इस प्रस्तावना वा उद्देश्य उन तरकों या उच्छवासों का निराकरण करना नही, वेवल पाठकों के सामने, कमर से वम शाव्दी म, झ्रपना दृष्टिकोण भर उपस्थित बर देना है। वैसे मेरा विचार अगले काव्य सकलन मे 'युगान्त' के बाद को श्रपनी रचनाश्रो के सम्बंध में विस्तृत आलोचनात्मव निवाध लिसने का है, पर वह कल वी बात है। मेरी इधर वी रचनाप्रा का सुरुय घ्येब वेवल उस युग चेतना को, श्रपने यत्तविचित प्रयत्नो द्वारा, वाणी देने वा रहा है जो हमारे सक्रातति काल वी देन है और जिसने, एक युगजीवी वी तरह, मुझे भी अ्रपने क्षेत्र में प्रभावित कया है। इस प्रकार के प्रयत्न मेरी इतियों म॑ 'ज्योत्स्ना! काल से प्रारम्म हो गये थे, ज्योत्स्ना' की स्वप्न कात चादनी (वैतना) पा प्रवार से 'स्वणविरिण' मे युग प्रभात के! श्रालीक से स्वाणिम हो गयी है 'बहु स्वण भोर को ठहरी जग के ज्योतित झआगन पर तापसी विश्व वी बाला पाने नव जीवन वावर '--- चांदनी यो सम्बोधित 'उ्पोत्त्ता>गुजन' काल घी इन पक्तियों भे पाठय को भेरे उपयुक्त कथन की प्रतिध्वनि मिलेगी मुझे विश्वास है वि “ज्योत्स्ना' के वाद थी मेरी रचनाप्रो को तुलनात्मक दृष्टि से पढने पर पाठक स्वयं भी इसी परिणाम पर पहुंचेंगे बाहरी दृष्टि से उह “युग- वाणी' तथा 'स्वणकिरिण” काल की रचनाओं म॑ शायद परस्पर विरोधी विचार धाराग्रो का समावेश मिले, पर वास्तव में ऐसा नही है ज्योत्स्ना' मे मैंने जीवन की जिन बहिरन्तर मायताओ पा समउय बरने का प्रयत्न तथा नवीन सामाजिक्ता (मानवता) में उनसे रूपातरित होने की भ्रोर इंगित विया है, 'युगवाणी” तथा “ग्राम्या' में छद्ीीं वे पहि- मुंखी (समतल) सचरण को(जों मावसवाद का क्षेत्र है। दया स्वपरिरित! में अतर्मुसी (ऊष्व) सचरण को (जो अ्रध्यात्म वा ह#ैत्र 9] श्रत्रित' प्रधानता दी है, कि तु समावय तथा सलेपण वा दुष्टिक्द एप चएतनित मायताएँ दोनों में समान रूप से वतमान हैं और लेना बाला वी रचनाओं से, इस प्रवार के झनेका उद्धरण हल्यि जा सकते हैं | यगावानी' तथा 'ग्राम्या' से यदि ऊष्ब भावों का सम धरादठ पर समय हुआ है तो 'स्वरणेकिरण', 'स्वण घूलि! मं समतरद मारो का ठत्य घयव्ल पर जा तत्त्वत एक ही लक्ष्य वी ओर निश्य करत हैं कि्तु नित्ती

जाम्यवामूलमारयााा

च्क

झ्रवध्य हो चि त्य तथा अवाछनीय हैँ

अपने युग को में राजनीतिक दृष्टि से जनता त्र वी युग झौर बाई पर

दृष्टि से विश्व मानवता अथवा लोक मीना बा युग माततां हूँ।

दग युद्ध वो इस ये. के विराट सघप द्चे

एवं राजन

राजनीति वे क्षेत्र वे किसी भी प्रमतिकामी बाद गा सद्धात 2 हर घरोध नही हैं। एव तो राजनीति वें नवफा स्खातें में साहित्य हे यग को प्रावाज कीई मस्त नहीं रखती दूसरे इन सभी वादों भी

कलीतर उनकी छपचार भी खोजते हैं, भौर बहिरतर के देय से पीडित, (छले युगी की शझ्रस्थि ववाल रूप चरोहर, जनता के हित वी सामने रख

क्ामी मध्योच्चवर्गीय चेतन बा ध्यान उस झोर आवप्ट करते हैं.

होने पर दुर्वाध भी में झपने युग की दुनिवार तथा मलव मन की दयनीय सीमाओं से पर्रिचित एव पीडित हूँ भेरा दढ विश्वास है कि वेवल राजनीतिक भाथिक दल ब्रो वी

लचल बाह्य सप्तताओो छारा ही मानव जाति के भार (भावी) _ का निर्माण नहीं विया जा सकता इस प्रवार क्वे

ध्रदान करने के जिए, संसार भें, एवं जम ऐेना होगा जौ मानव चेतना हथा झाध्यात्मिक--संम्पुण धरातलो

| पतप्र चावली

जस्य स्थापित वर झाज मे जनवाद वी विकसित मानववाद का स्वर्प दे सवेगा, भविष्य में मनुष्य वे झ्राध्यात्मिए (इस यथूग वी दृष्टि से बौद्धिक, नतिव) तथा राजनीतिक सचरण--प्रचलित शब्दों मे धम, भ्रथ, काम--भ्रधिक सर्मावत हो जायेंगे और उनके बीच वा व्यवघान मिट जायेगा--भ्रथवा राजनीतिक प्रान्दोलन सास्द्ृतिव झादोलनो में बदल जायेंगे जिसका पूर्वामास हमे, इस युग की सीमाग्रो वे' भीतर, महात्माजी के व्यवितत्व में मिलता है। इस दृष्टि से मैं युग की प्रगति वी घाराओ का क्षेत्र, वर्ग-युद्ध में भी मानते हुए (यद्यपि भपने देदा ये” लिए उसे क्‍प्रनावश्यक तथा हानिकारक समभता हूं ), उससे यही भ्रधिष विस्तृत तथा ऊष्व मानता हूँ और सुघार-जागरण बे प्रयत्तो वो भी अपने-पग्रपमे स्थान पर श्रावश्यक समभता हूँ, क्योकि जिस सचरण वा बाहरी रूप क्रान्ति है उसी का भीतरी रूप विकास | प्रतएवं युगपुरुष को रत सन्नेप्ट बरन॑ वे! लिए मंदि लोव' समठतम के साथ गाधीवाद वो पीठिका बनाकर मत संगठन (सस्कार) वा भी प्रनुप्ठान उठाया जाये प्रौर मनुष्य वी सामाजिक चेतना (सस्द्ृति) फा विकसित विश्व-परिस्थितियों (वाप्प विद्युत) आदि के पक्‍्नुरूप नवीन रूप से स्रिय समवश विया जाये तो वतमान के विक्षोभ के भ्रात्तनाद तथा क्रान्ति वी क्रुद्ध लखयकषार को लोक-जीवन के समीत तथा भनुष्यता वी पुकार बदला जा सबता है, एवं त्रीति के भीतरी पक्ष को भी सचेप्ट कर उसे परिपूर्ण यनाया जा सकता है। इस युग दे क्रातति विकास, सुघार जागरण के श्रादोलनों वी परिणति एवं नवीन सास्कृतिव' चेतना के रूप मे होना अ्रवश्यम्भावी है, जो मनुष्य के पदायथ, जीवन, मन के सम्पूण स्तरो का रूपातर कर देगी तथा विदव जीवन वे प्रति उसको धारणा वो बदलकर सामाजिक सम्बधा को नवीन श्रथ-गौरव प्रदान वर देगी इसी सास्कतिक चेतना की मैं श्रतरचेतना या नवीन सम्रुण कहता हूँ। मैं जनवाद को राजनीतिक सस्था या ताब्र के बाह्य रूप मे ही देखकर भीतरी, प्रज्ञात्म# मानव चेतना के रूप में भी देखता है, और जनत नवाद वी झान्तरिक (आराध्यात्मिक) परि- णति को ही '्रतश्चेतनावाद' पभ्रथवा “नव मानववाद' बहता हूँ,--जिस श्रथ में मेने श्रपती इधर की रचनाग्रो में इनका प्रयोग किया है। दूसरे शब्दा में, जिस विकासक्गमी चेतना को हम सधप के समतल घरा- तल पर प्रजातायवाद वे नाम से पुवारते हैं उसी वो ऊध्व सास्ट्ृतिक घरातल पर में अतदचतना एवं श्र-तर्जीवन वहता हूँ | इस युग के जड़ (परिस्थितियाँ, यात्र तथा तत्सम्ब॒धी राजनीतिक झाथिक श्रादोलन) तथा चेतन (नवीन आदश नंतिक दष्टिकोण तथा तंत्सम्ब॒धी मायताएँ आदि) वा सधप इसी प्रतचेश्तना या भावी मनुप्यत्व के पदाथ के रूप में सामजस्य ग्रहण कर उनयनत को प्राप्त ही सकेगा। श्रत मैं वगहीन सामाजिक विधान के साथ ही मानव ग्रहता के विधाय की भी नवीन चेतना के रूप में परिणति सम्भव समभता हू और युग-सघप में जन- सधप वे भ्रतिरिक्‍त श्र/तर्मानव का सघप भी देखता हूँ इस प्रकार में युग सघपय का एवं सास्वृतिक पक्ष भी मानता हूँ जो जन युग की धरती से ऊपर उठकर उसकी उच्च मानवता की चोटी को

श्न्द्श्क्त 4

भी झपने फटकत हुए पल से स्पण मरता है, फ्योपि जो मुग विप्लेय मानव-जीवा ये ध्राधिव-राजनीतिषः परातला मे महात्‌ त्रातिशरी वरिवतन ला रहा है, वहु उतवी भावर्तिया धाष्याहिष भ्रास्पाप्ता मे भी प्रान्तरिक विवाद तथा रपातर उपम्यित मरा जा रटा है, भौर जैसाकि में 'युगवाणी' पी भूपिया में लिए घुषा हैँ, "नविष्य में जब मातेव जीवन विद्युत तपा प्रणु रवित वी प्रदल 2 का पर प्रतय-येग से भागे बढ़ने लगेगा तब प्राज थे मनुष्य थी टिमटिमाती हुई चेताा उसका सयचालन वरने में समध पही हो गवेगी बाह्य जीवा मे साथ ही उसकी भतश्चेतता भे भी युगातर होना प्रवश्यस्भावी है ! “-इसी नवीन चेतना की मर फ्रीडा उसवे प्रातद भौर सौदय, उसकी भा विदवासप्रद प्रेरणाओ वे उददोधन गान मरी इधर की रघनापा ये विपय हैं, जो जन-युग थे सघप से मानव युग वे! उद्भव वो स्वप्म सूचााएँ भर हैं। ऐसा वहवर मैं विसी प्रपार थो ध्रात्मप्जाथा यो प्रश्षय नहीं दे रहा हूँ उत्तरा' ये! मिसी गीत में मैंने--

परे बेबल उमन मथुपर भरता शोभा स्वत्तिल गुजा,

भागे भरायेंगे तरण भुग स्वणिंगम मधुय्ण गरन घितरण ।॥ “- आदि पक्तियाँ पिसी विन श्रतावश नहों, भपनी तथा श्रपने युग थी सी मामा के कटु प्रनुभव तथा नवीन चेतवा वी लोगोत्तरता पर विश्यास वे वाएण हो लिखी हैं

मेरा मत यह नही स्वीकार वरता दि मैंने प्रपती रचनाभा में जिस सास्दृतिक चेतना वो दाणी दी है एव जिम मन संगठन कौ झोर ध्यान- आ्राइृष्ट क्या है उसे किसी भी दृष्टि प्रतिगामी बहा जा सपता है। मैंने संदेव ही उन झादशों, नीतियों तथा दष्टिवोगों बा विरोध दिया है, जो पिछले मुगो वी सकीण परिस्थितिमा के प्रतीर हैं, जिनमे मनुष्य विभिन जातियो, सम्प्रदायों तथा वर्गों मे विकीण हो गया है उन सभी विश्लिष्ट साहकतिक मायताओो के विद्द्ध मैंन युग वी फोविल से वाबव कण बरसान को कहा है जिनकी ऐतिहासिव पष्ठभूमि भय सिसव' शमी है भौर जो भावव चेतना को अपनी सोखली भित्तियों मं विभक्त किये हुए हैं। भेरा विवश्न विदवास है कि लोक सगठत तथा मत सगठाय एव दूसरे वे कह करयोंकि वे एक ही युग (लाक) चेतना के बाहरी और भीतरी

पहँ।

मुझे भात है वि सभी प्रगार के सुघार जागरण के प्रमत्व धान्ति के प्रतिरोधी माने जाते है पर ये इस युग के वादों तथा तकों वी सीमाएँ हैं, जिनका दांशनिक विवचन भथवा विश्लेषण करना इस छोटी-सी भूमिका के छषेत्र से बाहर ही का विपय नहीं चह व्यध का प्रयास भी होगा। जिनका मस्तिष्क वादा आकात नही हो गया है थे सहज ही अनुभव ऋर सकेंगे कि जन-सघप (राजनीतिक धरातल) भें जो युग-जीवन वा सत्य द्वद्े के उत्थान पतन झ्रभिव्यक्ति पावर झागे बढ़ता रहा है वह मनुष्य को चेतना (मानसिक-सास्कतिक धरातलो) एक दिवसित

मनुष्यत्व वे रूप मे सतुलन ग्रहण करने की भी प्रतीक्षा तथा चेप्टा कर रहा है। जो विवेचक सभी प्रकार के' मत सगठन तथा सारकृतिक प्रयत्ना यो प्रतिक्रियात्मक तथा पलायनवादी कटकर उनवा विरोध करते हैं,

# | पत प्रथावली

उनकी भावना युग प्रबुद्ध होने पर भी उनकी विचारघारा बादो से पीडित 'तथा बुद्धि श्रम से ग्रस्त है अपने लोकप्रेमी मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी युवकी को ध्यान मे रखते हुए, जो उच्च भ्रादर्शो से भ्रनुप्नाणित तथा महान त्याग करने में समथ हूं, मैं इसे केवल भ्रपने युग-मन वी कमी अथवा सीमा कहूगा। हमारा युग-मन परिस्थितियों के प्रति जाग्रत्‌ तथा पर्याप्त लब्ध-बोध होने पर भी अनु श्षृत्ति फी दृष्टि से अभी अपरिपव्व है, भर इसके अनेक कारण हैं हम अ्रभी च्रका मानवीकरण नही कर सके हैं, उसे मानवीय श्रथवा मानव या वाहन नही बना से हैं, वल्कि वही श्रभी हम पर झाधिपत्य किये हुए है।यत्र युग ने हमे जो शक्ति तथा वैभव प्रदान किया है, वह हमारे लोभ तथा स्पर्धा की वस्तु बनवर रह गया है, उसने जहाँ मानव श्रम के मूल्य को अतिरिक्त लाभ में परिणत कर शोपक शोपितो के बीच बढती हुई खाई वो रक्त पक्लि विक्षोभ तथा अस-तोष से भर दिया है, वहा हमारे भोग-विलास तथा अभ्रधिकार-लालसा के स्तरो को उकसाकर हमे झ्विनीत भी वना दिया है, क्तु वह हमारे ऊपरी घरातला तथा सास्कृतिक देतना को छूकर मानवीय गोरव से मण्डित नही हो सका है,--दूसरे शब्दो मे, यान युग का, मनुष्य की चेतना में अभी सास्कतिक परिपाक नही हआ है। जिस प्रकार हमारे मध्ययुगीन विचारको ने झ्रात्मवाद से प्रकाश-भ्र होकर मानव चेतना के भौतिक (वास्तविक ) घरातल को माया, मिथ्या बहकर भुला देना चाहा (जिसका कारण मैं 'युगवाणी' की भूमिका में दे चुका हूँ) उसी प्रकार श्राधुनिक विज्ञान दक्षनवादी--यद्यपि आधुनिक- तम भूतविज्ञान पदाथ के स्तर को अ्रतिकमण कर चुका है तथा आधु- निकक्‍्तम मवोविज्ञान, जिसे विद्वान अभ्रभी शैशवावस्था ही में मानते है, चेतन मन तथा हेतुवाद (रेशनलिज्म) से श्रधिक प्रधानता उपचेतन- अवधेतन के सिद्धांतों को देने लगा है--ओऔर विज्येपकर माक्मबादी भौतिकता के भ्रधवार में भौर वुछ भी सूभने के कारण मन (गुण) तथा सस्कृति (सामूहिक प्रतश्चेतना) श्रादि को पदार्थ का विम्ब रूप, भौण स्तर या ऊपरी झति विधान कहकर उडा देना चाहते है, जो मायताझों की दष्टि से, ऊध्व तथा समतल दृष्टिकोणों में सामजस्य स्थापित कर सबने के कारण उत्पन भ्रातति है, कितु मात श्रधिदक्षन (मेटाफिजिक्स) के सिद्धा ता द्वारा जड चेतन (मेंटर स्पिरिट) थी गुत्थी को सुलभाना इतना दुरूह है कि युग मन के अनुभव के अ्रतिरिक्त' इसका समाधान सामराय बुद्धिजीवी वे लिए सम्भव नहीं। भ्रतएवं साहित्य के क्षेत्र भे मायताग्रो की दृष्टि से हम मावसवाद या अध्यात्मवाद वी दुद्ठाई देकर आज जिन हास्यप्रद तकों में उलभ रहे है उससे अच्छा यह होगा कि हम एक दूसरे के दृष्टिकोणों का भ्रादर करते हुए दोनो की सच्चाई स्वीकार कर लें। वास्तव चाहे चेतना को पदाथ (झ्ान )का सर्वोच्च या "भीतरी स्तर माना जाय, चाहे पदाथ को चेतना वा निम्नतम या वाटरी धरातल, दोनों ही मानव-जीवन मे भ्रविच्छिन्त रूप से, वाग्थाविव जुड़े हुए हैं जिस प्रकार पदाथ का सचरण परिस्थितियों के सत्य या गुणा मे अभिव्यक्त होता है उसी प्रकार चेतवा का सचरण मन के गुणों में, तोब- जीवन के विकास के लिए दोनो ही मे सामजस्य स्थापित करना नितान्त

उत्तरा / ६...«..

ही मानव जीवन का नवीन दशन वन सबती है झौर झाध्यात्मिक्ता वा मोह बेवल हमारा भ्रतीत का गौरव गान है कितु इसम तथ्य इतना ही हैं वि पदाथ विज्ञान द्वारा हमने वेवल चेतना वे निम्नतम भौतिक घरातल पर ही प्रकाश डाला है भौर उसके फतस्यरूप भपनी भौतिक परिस्थि तियो को वाष्प विधुत्‌ झादि का सजीवन पिलाकर भ्रधिक सक्तिय बना दिया है, जिनमें नवीन रूप से सामजरय स्थापित 4रने के' लिए इस युग के राजनीतिक भ्राथिक श्रादोलनो का प्रादुर्भाव हुगा है, दितु परिस्थि- तिया वी सक्ियता के भ्रनुपात में हमारे मन तथा चेतना बे' सापक्ष स्तर प्रचुद्ध तथा अत सगठित हो सकने के कारण युग के राजनींतिक- आाधथिव सधप मानव सम्यता को श्रम्युदय वी शोर ले जाने के बदले, विश्व युद्धो का रूप धारण बर, भूव्यापी रक्‍तपात तथा विनाश ही की धोर अग्रतर बरने मे सफ्न हो सवे हैं, और सहार बे बाद निर्माण के श्राताप्रद सिद्धान्त को भी झ्रव एटम बम के भयानक आविर्भाव ने जैसे एव वार ही धराशायी वर दिया है।

प्राधुनिव मनोविज्ञान मनुष्य के विचारों वे मन को नहीं छू सका है। उसन केवल हमारे भावनागो वे मन में हलचल भर पैदा की है। पिछली दुनिया की नतिकता अ्रभी मनुप्य के मोहग्रस्त चरणों मे उसी प्रधार चौाँदी के भारी भद्दे सवीण कडें की तरह पडी हुई है, जिससे भानव चेतना का सौदयबोध तथा उसकी राग भावना की गति पम-प्रग पर बुण्ठिस होकर, स्त्रियो के श्रधिकवार श्राग्दोलनो के रूप में, आगे बढ़ने का निष्फत प्रयत्न वर रही है। क्तु मानय चेतना की नैतिक लेंग- डाहटठ को दूर करना धायद कल का काम है, उससे पहिले मानव जाति के दृष्टिकोण का व्यापक भ्राध्यात्मिक रूपा तर हो जाना अत्यन्त श्राव- दइयब' है| प्रत अध्यात्मवाद वा स्थान मानव के अतरतम शुत्र शिक्षरा पर सरदव वे लिए वैसा ही प्रक्षुण्ण बना हुमा है भौर रहेगा जैसा कि वह शायद पहले भी नहीं था।

भारतीय दशन भी भ्राधुनिकतम भौतिक दशन [मावसवाद) वी तरह सत्य के प्रति एक उपनयन (एप्रोच) मात्र है, कितु श्रधिक परिपुण, वयाकि वह पदाथ (जड), प्राण (जीवन), मन तथा चेतना (स्पिरिट) रूपी मानव-सत्य के समस्त धरातलो का विश्लेषण तथा सइलेपण कर सबने वे कारण उपनिपद्‌ (पूण एप्रोच) बन गया है। दुर्भाग्यवश हमारे तरुण बुद्धिजीवी अध्यात्मवाद यो बादलों बे ऊपर का कोई सत्याभास मानते हैं भ्रौर उसे हमारे प्रतिदिन वे जीवन ये एवं सूधम कितु सक्रिय सत्य के' रूप में नही देखते। जिस प्रकार पदाथ का एक भौतिव' तथा मानसिव' स्तर है उसी प्रकार उसका एक शप्राध्यात्मिक स्तरभी॥

पदाथ तथा चेतना वे धरातलो पर व्यथ बिलम (शक) कर हमारे युग पो--भौर ऐसे युण सभ्यता थे। इतिहास भें सहम्नो वर्षों बाद भाते है--वेयबितक सामूहिक भ्रावश्यकताप्रा के भ्रनुरूष इन दोनों मौलिक सचरणों में नवीन सामजस्य स्थापित बर, एवं जीवन बे चतदल वो मानस-जल के ऊपर नवीए सौदयदबोध मे प्रतिष्ठित बर, उसमें पदाय वी पसडियो वा सतुलित प्रसार तथा चेतना थी किरणा था सतरग

ऐश्वय (विकास) भरता ही होगा। जीवन निर्माण के अश्रवेश् में बह जाने के कारण तथा भोतिब' दशन के अ्रपर्याप्त दष्टिकोण के बारण, इूम युग के साहित्य मे श्र भी अनेक प्रबार की भ्राशतिया का प्रचार हो रहा है। यदि थुरानी दुनिया (स्रध्य युग) भ्रति-बैयक्विक्ता दे पश्- पात से पीडित थी तो नयी दुनिया भति सामाजिक्ता के दलदल में फेसने जा रही है, जिसका दुष्परिणाम यह होगा कि कालातर में मनुष्य वी सुख शा ति एक क्मिकार यात्रिक तन के दुसह बहिमूत भार से दव जायगी और वैयवितक श्र सचरण था दम धुटने लगेगा। हमे व्यावहारिक दप्टि से भी व्यवित तथा समाज को दो स्वतत्र अयोयोशित सिद्धांतों की तरह स्वीकार करना ही होगा त्तथा मनुष्य की वहिरममुखी प्रवत्तियों वे विदास और साभजस्य दे श्राधार पर ही विश्वतान को प्रतिष्ठित करना होगा दोना सचरणो की मायताओो दो स्वीकार मे करना अदा को जम देता होगा | इसमे स'देह नही कि सभ्यता के विवास त्रम मे जब हमारा मनुण्यत्य निखर उठेगा एवं जठर का सधप उत्पादन विदरण के संतुलन में नि शेप था समाप्तप्राय हो जायेगा मनुष्य का बहहिजॉविलत उसके श्र तर्जीवन के श्रधीन हो जायेगा, वयोवि भनुष्य वे भातजीयन तथा चहिर्जीवन के सौदय मर इतना प्रकारातर है जितना सुदर मास वी देह तथा मिट्टी दी मिर्जीव प्रतिमा में --फितु यह कल या स्वप्न है तथोयत गहन मर्रीविनान-सम्ब'घी म्रिद्ध भावना, काम ग्रीय आदि के परितान ने हमारी उदाच भावना ग्यात्म-निग्नह आदि थी धारपाओो के प्रथ का अनथ वर दिया हैं | उनयन का अथ दसन या स्तम्भन सयस का भ्रात्मपीडन भा निषेध तथा आदण का अथ पत्रायन हो गया हैं। उपचेतन झवचेतन के निम्न स्तरा को इतनी प्रधानत्ता मिल गयी है कि अव्यवतत या प्रच्ठधन (सबलिमिनलेल) मत के उच्च स्वरों के तान से हमारा तरण बुद्धिजीदी अपरिचित ही रह गया है भारतीय मनोविश्लेषक डड, लिविडों तथा प्राण चेतना सता (पॉयडियन साइवी) के चित्र- आवरण को चीरकर गहन शुश्र जिभासा करता है -- फेनेपित प्तित प्रेषित मत केस प्राण प्रथम प्रति युबत ?! वितु हमार विप्याण, प्रेरणाएूय साहित्य भे उपचेतन वी मध्यवर्गाय रुण्ण प्रवत्तियो वा चित्रण ही प्राज सजन-कोशन थी कसौटी बन गया है और वे परस्पर बे' अहषार प्रददन लाछन तथा घात प्रतिघात का क्षत्र बने गयी हैं, जिससे हम दुष्ठित बुद्धि बे साथ सवीण हुदय भी होते जा रह हैं इस प्रवार वी शनक प्रान्तियों तथा मिथ्या धारणाग्रों से आज हमाटी संजन चेतना पीडित है और प्रमतिश्ील साहित्य का स्तर सदुचित होरर प्रतिदिन नीचे गिरता जा रहा है। हम पश्चिम वी विचारधारा से इतने प्रधिक प्रभावित हैं कि श्रपतती थीर मुडबर अपने देष का प्रणात गम्भीर प्रसन भुछ देखना ही वही चाहते। हमसे अपनी अभि बे विशिष्ट मानवीय पदार्थ को समभने की क्षमता ही नहीं रह गयी है थम इस सत्यों के सेंडशर का बाहरी दमनीय रूप देखवर धक्षव्ध तथा बिखन हो जात हैं भोर दूसरा वा बाहर से संवार हुआ मुझ देख पर उनवा प्रनुक्रण फरने समत हैं। मैं जानता हूँ वि यह हमारी दोघ

१२ | दत प्रपादलो

पराधीनता का दुष्परिणाम है, किन्तु एक बार सयुवत प्रयत्व कर हमे इससे ऊपर उठना होगा और प्रपने देश की युग-युग के अनुभव से गम्भीर परिपक्व आत्मा को, उसके अत सौ दये से तपोज्वल शान्त-सु दर मुख को पहचानकर अपने भ्रन्त करण को उसकी गरिमा का उपयुक्त दपण बनाना होगा तभी हम श्रय देशों से भी आदान-प्रदान करने योग्य हो सबंये उनके अमावों तथा जीवन-ग्रनुभूतियों को यथीचित रूप से ग्रहण करने एवं अपने सचय को उहें देने वे अधिकारी बन सकेंगे, और इस प्रकार विश्व मिर्माण में जाग्रत सक्रिय भाग ले सकेंगे रु मुझे ज्ञात है कि मध्य युगो से हमारे देश के मत में अनेक अ्रकार की विकृृतिया, सकीणताएँ तथा दुबलताएँ धर कर गयी हैं, जिनके कुछ तो राजनीतिक कारण है वुछ हमारी सामन्ती सस्क्ृति के बाहरी ढाचे की भ्रवश्यम्भावी सीमाएँ और कुछ उत्थान के बाद पतनवाला, जीवन वी विकासशील परिस्थितियों पर प्रयुक्त सिद्धा त। प्राय उन सभी मम- व्याधिया एवं स्थलों पर इस युग के हमारे बडे-बडे विचारक, प्षाहित्यिक तथा सर्वाधिक महात्माजी, प्रपने महान्‌ व्यक्षित्व का प्रकाश डाल चुके हैं। किंतु बाहुर की इस काई को हटा लेने के बाद भारत के श्रन्तरचेतन मानस में जो कुछ शेय रहता है, उसके जोड का आज के ससार में कुछ भी देसने को नहीं मिलता, और यह मेरा झतीत का गौरव-गान नहीं, भारत वे झपराजित व्यक्तित्व के प्रति विनम्न श्रद्धाजलि मात्र है हम ञ्ाज विश्व-तत, विश्व जीवन, विश्व मन्न के रूप में सोचते हैं [ पर इसका यह ग्रभिभ्राय नहीं कि विश्व योजना में विभिल देशो का झपना मौलिक व्यक्तित्व नही रहेगा एकता का सिद्धान्त अन्तमन का सिद्धान्त है, विविधता का सिद्धान्त बहिमन तथा जीवन के स्तर का, दूसरे शब्दा मे एकता का दुष्टिकोण ऊध्व दृष्टिकोण है और विभिनता का समदिक्‌ विविध तथा अविभकत होना जीवन-सत्य का सहज झन्त- जात गुण है, इस दृष्टि से भी ऐसे किसी विश्व जीवन की कल्पना नही की जा सकती जिसमे ऐक्य झौर वेचिश््य सयोजित हो इसलिए देश प्रेम अन्वर्राष्टीयता या विश्व प्रेम का विरोधी होकर उसका पूरक ही है। इही बातो को ध्यान में रखते हुए मैं सोचता हूँ कि भारत पर भावी विश्व निर्माण का कितना बडा उत्तरदायित्व है। और झाज की विनाश वी ओर अग्रसर विश्व-सम्यता को अन्त स्पर्शी मनुष्यत्व का झमरत्व प्रदात बरने के लिए हमारे मनीदियो, बुद्धिजीवियों तथा लोकनायकों को कितना अभ्रधिक श्रवुद्ध, उदार चेता तथा आत्म सयुक्त बनने की भावश्यकता है हमारी गौतम और गाघी की ऐतिहासिक भूमि है। भारत वा दान विश्व को राजनीतिक तन या बनानिक यत्र का दान नहीं हो सकता, बह सस्कृति तथा विकसित मनोयात्र की ही भेंट होगी इस युग ने महापुरुप ग्राघीजी भी अहिसा को एक व्यापक सास्कृतिक प्रतीक के ही रूप मे दे गये हैं जिसे हम मानव चेतना का नवनीत झथवा विश्व-मानवता का एक्मान्र सार कह सकते हैं महात्माजी भपने व्यक्तित्व से राज- नीति वे सघप-फटक-पुलक्ति कलेवर को सस्कृति वा लिबास पहनाकर भारतीय बना गये हैं। उनवा दान हम भुला भी दें, किन्तु ससार नहीं

उत्तरा [ १६४

मुला सकेगा, वयोकि भणु मुत मानव जाति वे पास भ्रह्िसा ही एक्माम्र जीवन घ्दलम्ब तथा सजीयन है। संत्य-भरहिसा के छिद्धान्ता वो मैं झ्रत्त संगठन [सस्क्ृति) मे दो अनिवाय उपादान मानता हूँ श्रहिसा मानवीय सत्य वा ही सक्रिय गुण है। भहिसात्मन हाता ब्यापन भ्रथ मे सस्वृतत होता, मानव बनना है। सत्य वा दच्टिकोण मा यत्ाग्रो वा दष्टिकोण है, और ये मायताएं दी प्रवार वी हैं एक ऊध्च प्रथवर झाध्यात्मिक और दूमरी समदिक, जो हमारे गैतिक, सामाजिक ग्रादर्शों के रूप मे विवाम कम मे उपलध होती हैं। मध्य मायताए' उस भन्तस्थ सूक्ष गी तरह है जो हमारे बहिगत ग्रादर्शों यो सामजस्प ये हार में पिसेवर दृदय से घारण बरन योग्य बना देती है। दि में जानता हूँ कि स्वाघीनता मिलने के बाद हम बुद्धिजीवियों को जित सुजनात्मव' तथा सास्कृतिव श्तिया के प्रादुमातर होने तथा उनके विकास के लिए प्रतस्त देन मिलते वी आशा थी बसा नहीं हो सका है | गाधीवाद का मास्कृतिक चरण प्रभ्ती पगु तथा निष्किय ही पडा हुआा है कितु हम सदिया वी अव्यवस्था, दुरवस्था तथा परवशता से भ्रभी- अभी मुक्त हुए हैं।हमे अपने को नवीन रूप में पहचानने, नवीन परिस्यितियों भें भ्रपता उत्तरदायित्व समभने, और विश्व त्रात की गम्मीरता को ठीव ठीव आँवने भे प्री समय लगेगा मैं चाहता हूं कि पदिचम के देश अपने राष्ट्रीय स्वार्थों तथा आधथिव सपर्धान्वा के कारण, जिस प्रदार भरी तक विश्वन्सहार वे यत्रालय बने हुए हैं, भारत एव नवीन भनुप्यत्व वे आदश मे बंधवर, तथा अपने बहिरातर जीवन को नदीन चेतना वे सौदय में समठित वर, महामुंजन एवं विश्व निर्माण चा एक विराट कार्यालय बन जाय, और हमारे साहित्यिक तथा पुद्धि- जीवी, झभिजातवस की सकीण॑ नतिकता तथा लिम्त बस को दय-पीजा की गांधा गाने भे एवं मध्यदग के पाठकों थे लिए उसवा कृजिभ चित्रण बरतने भें हो अपनी कना वी इतिश्रीन समझ लें, प्रत्युत घुग सधप के भीतर से ज'म ले रही नदीन सानवसा तथा सास्कृतिक चेवमा के संस्पर्शों एव सौदय बोध को भी झ्पनी कुतिया में भ्रभिव्यक्ति देवर नव युग के ज्योति-वाहंद' वन सकें में जनता के राग-दप, क्रोध तथा झ्सतोद वी भी प्ादर की दृष्टि से देखता हूँ क्योंकि उसके पीछे मनुष्य का हुदय है, वितु युग सचरण को बग-सचरण मे सीमित नर देना उचित नही समभझता। इस धरती के' जीवन वी मैं सत्य वा क्षेत्र मानता है, जी हमारे लिए मानवीम सत्य है। गम्भीर दृष्टि से देखने पर ऐसा नहीं जान पृदत कि वह जीवन श्रविद्या वा ही क्ष त्र हैं जहाँ मन तथा झात्मा के सचरण गौण तथा झचान के अधघीएः हैं| यह वेदल तुननामक तथा बाह्य दुष्ग्कोण है जो हमारे 'हाम युग का सचक तथा विश्व अग्रगठन का आवक है) मामाजिद चब्टि से में प्रसगठन को माया तथा सगदा (जिसमे बहिरतर दोनो मम्मित्रित हैं) को प्रकाश या सत्य कहता हूँ शतएव इस राजनीति तथा प्रथशास्त्र के झुग में मुझे एक स्वस्थ सॉस्वतिक जागरण वी भावश्यक्ता भौर भी ध्रधिक दियाई देती है

३४ | पत॑ प्रयावरी

को मात्र वेगवाद बी दृष्टि से देखना एवं बाद परिस्थितियों पर झव्‌- लम्बित आतिर्विधान माननों केर्वर्स बाद ग्रस्त बुद्धि का दुराग्रह है क्यो

क्ू उसके गले मनसे कही गहरे, बाहरी परिम्थितियों के अतिर्यिवीे औतरी सूँपर पर्रिस्थितियो में भी है। इस सम्बंध में झपने 'कली तथा स्टुति नीर्मके झमिभापण का एव अंश यह! उद्धत बरी हैं हट

सत्य+

घ्‌ श्र से है. वर्षार्कि दें. सत्य, शिव, से 4: को धक्षुघां, की (जीवन आञकी- छाती) दी दे भीतर खोजते हैँ. (जनसे हमे वाद्य परिस्थितियों के जगत सम्बद्ध दें? और इस देंष्टि से क्षुधा काम हमारी कीतठरी स्थृत परि- शिव में हम ग्रपनी बहिर परिस्थितियों में सछुलन स्थापित करते है। भादश ओर बस्तुवादी आपस में

पर चुधावसी

< है प्रभावित फेर सकेगे। जिस पल, अकूल सत्य के

अवाह के चर्चा मैंने अभी की है, उसे आप कलाकार तथा पक्म-जीकी

के स्‍्प भे देखिए। 5 राजनीति के क्षेत्र का

सिपाही भले ही उसे है द्व तक से पचालित, आधथिक से प्रभावित

उत्पादन वित्तरण के सघप के. रुप जे देखें ग्राप आओ मार के

भवाह के रूप मे देखिए उसमे मानव हृदय का का

स्प मे आयी है। « चने ७७ मेप्र कात्िित हैई थी | उससे-

बाद का का है सन्‌ रह अआन्येतन . पेमय, जबकि

विश्व युद्ध चक्र चल रहा या, केसे भन स्थिति लिए सत्यन्त कहा

पोेह का युग था। मेरी

दिया गया है भ्पनी अस्वस्थता ये बाद मुझे 'बल्पता' चित्रपट के सम्बंध मे भद्रास जाना पडा भ्रौर मुर्क पाण्डिचेरी मे थ्री प्ररविद के दशन करने तथा श्री भ्ररविद श्राक्षण के निकट सम्पक में आने वा सौभाग्य भी प्राप्त हो सका इसमे सन्देह नही कि श्री श्ररविद वे! दिव्य जीवम दशन से मैं स्वभावत प्रभावित हुआ हूँ। श्री श्ररविद आश्रम के योग युवव (थ्रात संगठित) वातावरण बे प्रभाव से, ऊध्व मा यताओं सम्ब' वी, भेरी अनेक शकाएँ दूर हुई हैं। 'स्वणकिरण ' श्रौर उसके वाद की रचनाओं में यह प्रभाव, मेरी सीमाआ के भीतर, विसी-न किसी रूप में प्रत्यक्ष ही दुष्टिमोचर होता है जैसा वि मैं 'आधुनिक कवि की भूमिका में निवेदन बर चुका हें, मैं झपने युग, विशेषत देश की, प्राय सभी महात विभूतियों से विसी-स- किसी रूप में प्रभावित हुआ हूँ वीणा-पत्लव' काल में मुझ पर कवीद्र रदीद तथा स्वामी विवेकान का प्रभाव रहा है, 'गुया त' और बाद की रचनाओं में महात्माजी के व्यक्तित्द तथा मावतस के दर्शन का, महात्मा जी के देह निधन के बाद थी रचनाएँ, जो “युगपर्थ! में सगृहीत हैं, उनके प्रति मेरे हृदय वी क्षद्धा थी परिचायक ह। कवीद्ध रवीद्र के प्रति भी मेरी दो रचनाएँ 'युगपथ' मे प्रकाशित हो रही है। वि*तु इन सब मे जो एवं परिपूर्ण एव सातुलित अतदष्टि का प्रभाव खटकता था, उसकी पूर्ति मुर्के थी अरविद वे जीवन दशन से मिली, और इस झात- दष्टि को मैं इस विश्व सन्ताति-वाल के लिए शअ्रत्यन्त महत्वपूण तथा अमुल्य समझता हूँ। मैंने अपने समकालीन जेखको तथा विशिष्ट व्यक्तियों पर समय समय पर स्तुति-गाल जिखने में सुख अनुभव किया है। श्री प्ररविद के भ्रति मेरी कुछ विनम्र रचनाएं, भेंट रूप भे स्वणकिरण', सस्वर्णधलि' तथा 'युगपथ' में पाठयों को मिलेंगी क्री अ्रविद को मैं इम युग वी प्रत्यत महान तथा अतुंलनीय विभूति मानता हैँ उनके जीवन दशन से मुझे पुण सातोद प्राप्त हुआ उनसे भप्रधिक ब्यापतः ऊध्व त्तथा अतलस्पर्शी व्यक्तित्व, जिनके जीवन- दशन मे अध्यात्म का सृध्म, बुद्धि अग्राह्म-सत्य नचीव ऐश्वय तथा महिमा से मण्डित हो उठा है भुर्रे दूसरा कही देखने को नहीं मिला। विश्व-बत्याण के लिए मैं श्री श्ररविद की देन को इतिहास की सबसे बडी देन मारता हें उसके सामने इस युग के वैज्ञनिका की भ्रणु शवित की देन भी श्रत्यत तुच्छ है। उनके दान वे बिना शायद भूत विज्ञान का बड़े स॑ बडा दान भी जीवन मुत मानव जाति के भविष्य के लिए भ्रात्म पराजय तया भर्वाति ही का बाहए घन जाता) मैं नहीं कह सकता कि ससार के मतीपी तथा लोक नायक श्री भ्ररविद की इस विशाल झाध्यात्मिव' जीवन दृष्टि का उपयोग क्सि प्रवार करेंगे भ्रथवा भगवान्‌ उमके लिए कय क्षेत्र बमायेंगे गह सरे वदि हृदय थी विनीत ग्रपयाप्त श्रद्धाजलि मात्र है। ये थौडे रो शब्ल मैं इसलिए लिप रहा हूँ कि हमारे तरुण बुद्धिजीवी श्री श्ररवि"द के जीवन-दरन से भारत वी आत्मा का परिचय तथा मानव और पिश्व ये प्रन्तर विधान का अ्रधिक परिपृण ज्ञान पाप्त कर, लाभाचित ह्दो सर्षो झ्ाज हम छोटी-छोटी बाता वे लिए पृरद्चिचम के विचारका भर

१८ | पत प्रयायली

मुह जोहते हैं, उनवे वाक्य हमारे लिए ब्रह्म घावय बन जाते है श्रौर हम अपनी इतनी महान्‌ विमृत्ति को पहचान भी नहीं सके हैं, जिनके हेमालय तुल्य मन शिसर के सामने इस युग के अ्रय विचार॒क विध्य की चोटियो के बराबर भी नही ठहरते। इसवा वारण यही हो सकता है कि हमारी राजनीतिक पराधीनता की वेडियाँ तो विसी प्रकार कटठ गयी, कितु मानतिव दासता वी शइसलाएं झ्भी नहीं टूटी हैं! सहस्ना वर्षों से भ्रध्यात्म-दशन की सूक्ष्म-सू#_््मतम रकारा से रहस- मोन निनादित भारत के एकान्त मनोगगन में माक्स तथा ऐंम्रिल्स वे विचार-दशन की गूजें वोदिक्ता के शुश्र अधवार के भीतर से रेंगने वाले भीगुरो वी रुघी हुई कतकारा से भ्रधिव स्पदन नहीं पैदा करती एंगिल्स वे शाश्वत सत्य की व्यायया जिसके उदाहरणस्वरूप, 'लैपोलियन मई का मरा है', सथा हीगल का “विचार कर नियपक्ष', जो कण-कण जोडकर विकसित होता है, अथवा एसे इतर सिद्धांतों की दुहाई देवर दृद्दन्तरा तथा भौतिकवाद वा महत्व दिखाना भारतीय दशन के विद्यार्थियों वे लिए हास्यास्पद दाशनिक तुतताहट से अधिक भ्य-गौरव नही रखता जिस भाकस तथा ऐंगिल्स के उद्धरणा को दुहराते हुए हमारा तरण बुद्धिजीवी नही थवाता, उसे अभय दशनों के साथ अपन देश के दशन वा भी सागोपाग तुलनात्मक अध्ययन अवश्य करना चाहिए और देखना चाहिए कि ऊ्ट तथा हिमालय के शिखर में क्तिना अतर झौर क्‍या भेद है। माव्सवाद का आक्पण उसके खोखले दशन पत्त म॑ नहीं उसके यज्ञानिक (लोकत-न के रूप मृत्त) आादचवाद मे है, जो जत टित का अथवा सवटारा वा पक्ष है, क्तु उसे वंग-कातिति का रुप देना अ्निवाय नही है। वगयुद्ध का पहलू फासिज्म वी तरह ही निकट भविष्य में पूजीवादी तथा साम्राज्यवादी भुग वी दूसरी प्रतिक्रिया के रूप मे विद्वत एवं विकीण हो जायेगा हीगल के द्वद्व-तक में विम्वित पद्िचम के मनोजग्रतू का श्रत- ट्वद्व माक्‍्स के द्वद्वात्मक भौतिक्वाद में वहिद्वद्व का रूप धारण कर लेता है। इस दृष्टि से इन युगप्रवतको का मानस चितन, ऐगिल्स वे अनुसार अपनी युग सीमाग्मा से थाहर' अवश्य नही जा सका है। माक्‍स ने, समस्त पश्चिम के ज्ञात को झ्रात्मससात्‌ कर, सिर के बल ख़डे हीगल को पैरा के बल खडा नही क्या, यूरोप का मनोद्वद्व ही तब अपने आथिक- राजनीतिक चरणो पर खडा होकर “युद्ध दहि' कहने को सनद्ध हो उठा था, जिसका पूर्वाभास पाकर युग प्रयुद्ध माक्स ने उस पर अपने वगयुद्ध के सिद्धान्त की रक्त छाप लगा दी डारवित ने जहाँ पूजीवाद के भ्रम्युदय-काल में, झपने 'सरवाइवल ऑफ फिटेस्ट के सिद्धात को (जिसकी तुलना में ईसा की साह्कृतिक चेतना की धोतक 'ब्लसेड आर मीक फॉर दे शैल इनहेरिट भ्रथ' झ्रादि सूक्तियाँ रखा जा सकती हैं) जीव विकास ऋम पर प्रतिपादित एंव प्रतिष्ठित किया वहा माक्से मे, यत्रयुग के आर्थिक चक्रा से जजर, सवहारा का पश्ठ लेकर वर्गय्रुद् के सिद्धांत को द्वद्द-तक से परिचालित ऐतिहासिक विकास-क्रम मं, (युग सकट के समाधान के रूप मे) हीगल और माक्स दोना ही अपने

उत्तरा / रथ

ध्झट

ब'र सवेगा भौर धीर धीरे हम भाज मे मुप सधप मे व्यापन' स्वस्प को समझे सारगे। प्राज पं वध्युद्ध मं हम जिस ग्रुगन्ययरण था पूवाभास मिलता है, उसमे भीतर विहित मनुष्य यी ग्'तश्वतना वा प्रयोगप हमारे युगन्मत मे भ्रधिय स्पष्ट हो जाएगा झौर इसमे संदेह नहीं हि यह मात्र बाहर या रोटी था युद्ध प्ीघर ही मा ये रणक्त्र मे उरीय सायताप्रा के देवासुर-सघार वा रुप धारण वर, एवं मापव चतना तया प्रशित्त थे प्रस्तरतम स्तर वो झा टोलित बर, मानप्र हुदय मी स्वग शणित से स्मानपूत तथा नवीन देतता के! सौदय भौर मानवता पी गरिगा से मण्डित वर देगा भ्रस्तु -- स्वणमिरण में मै। झाजीविन प्रन्तदताना आदियो इततया प्रधिव महत्व इसलिए भी दिया है कि इस मुग से भौतिया हटाने ये प्रभाव से हम उह विजवुल ही भूत गये हैं। बैंस रामायत उसमे बहिरतर जीवनवे ममवय वो ही धपित प्र धानता दी गयी है। जसा वि'--- भोतिव वैभव थी ग्रात्मिव एश्यय नदी सभोजित !” बहिश॥र थे सत्या मी जगजीवन में कर परिणय , 'बधश्निया पितान हो महत ग्रातदुध्टि भान से योजित'--प्रदि अ्र्गा पततित्रा में मनेवा रूप से मिलेगा युरम चेताा मंम्ब'धी मायताओ पर भी मे स्वणविरण' ये ग्रन्तगत 'स्वर्भोदिय में आतिम भाग मे तथा 'स्वणघृलि वी मानसी' में वितलेष रूप से प्रवाष्ट डाला है जिससे पाठरों पर मेरा दप्टिवोण स्पप्ण हो जायेगा।

स्वणविरण 'स्वणघूलि' में मैंने यत्-तत्र छदो की सम विषम गति वी एफ्स्वरता को बदलन वी दिशा मे भी बूछ प्रयोग किये हैं। जिससे हे दीघ मात्रिक छदा वी गति में भधिक चूचिज्य तथा भक्ति भरा जाती

यथा--

'सुबंण विरणी का ऋरता निभर' 'सुवण्ण' के स्थान पर 'स्वणिम' वर देने से गति में तो सगति झा जाती है, पर सुवण विरणा वा प्रवा मद पड जाता है। इसी प्रकार 'जत से भी ब्ठौर घरती मे 'क्रठोर' के स्थान पर मिप्ठुरा हो सकता था, मेरे ही श्रसदय लोवन' वे' बदन ग्रगणित लोचन, मानव भविष्य हो शासित के बदते भावी हो शासित, देयो में घिदीण सानव' वे स्थान पर विक्षत' श्रथवा 'खण्डित मानव हो सकता था --और ऐसे हो अ्तेक उदाहरण दुहराये जा सकते हैं, कितु मैंन सम विधम गति से द्वब्द दाक्ति की ही झधिय महत्व देना उचित समभा है। इस युग मे जब हम हस्त दीप मात्रिक के पाश से मुक्त होकर अक्षरमात्रिक तथा गद्यवत मुक्त छ'द लिखते मे अधिक सौदय अनुभव करते हैं, मरी दष्टि में, हुस्व दीघ मात्रिक मे यति को मानते हुए समत्रिषम वी गति में इधर उधर परिवतन कर देवा कविता पर किसी प्रदार का अत्याचार नही होगा, बल्वि उससे हस्त दीध माभिफ में स्वर पात का सोदय झा जाता है। इन रचनाग्रा म॑ मैंने हुस्व भ्रत्यानुभासो का अधिक प्रयोग क्या है--यथा कोमल, जोचन, सुरभित इत्यादि छस्व मात्रिक तुद अधिक सूद्षप हीने से एक प्रकार छद प्रवाह से घुल मिलकर सी जाते हैँ गीती को छोडवर विब एवं इतर काव्य मे मैसे इस ग्रकार के सूद्म या नम्ज अ्रत्यानुप्राम से हो अधिक काम लिया है,--गीतो में स्व दीध दोना प्रकार के तुको से

२२ | पत्त प्रधघ्दली

उत्तरा' मे मेरी इधर की कुठ प्रतीकात्मक, बुछ धरती तथा युग जीवन-सम्ब'धी, कुछ प्रकृति तथा वियोग-प्टूगार विपयक वविताएँ भर बुछ प्राथता गीत समूहीत हैं। “उत्त रा' की भाषा 'स्वरणेबिरण' वी भाषा से अधिक सरल है, उसके छदो मे मैंने उपर्युकत विचारो तथा प्रेरणाओ्री की बएणी देने प्रयत्न किया है, जो मेरी भावना के भी श्ग है 'धनिक श्रमिव मुत---प्रादि प्रयोग मैने व्यक्तियों या समरठनों के लिए नहीं, युग-प्रतीको भ्रथवा परिस्थितियों बे' विभाजना के लिए ही किये हैं, जो सास्दुतिक, सामाजिक तथा राजनीतिक सभी दृष्टियों से वाछनीय

दे आंत मे मैं अपने स्नेही पाठवों से निवेदन कछँगा कि वे मेरी रचनाग्रो की इसी साध्ह्तिक चेतना वी पअ्रस्पप्ट भभर के छूप में प्रहण करें और “युग विषाद वा भार बहन कर तुम्हें पुकार प्रतिक्षण' जैसी भावनाओं वो 'आंग्रो प्रभु के द्वार | की तरह, जन-विरोधी समझ ने ऐसी पुकार में व्यक्ति के तिजत्व का समावेश अवह्य रहता है, पर ऐसी कसी भी सामाणिक्ता की कल्पना मैं नही कर सकता, जिसमें व्यक्षित वे हृदय का स्पदन $क जाये श्रौर श्ञाथद दूसरे ही करते हांगे

मैं बाहर के साथ भीतर (हृदय) वी क्रातति का भी पक्षपाती हूं, जैसा कि मैं ऊपर सकेत कर चुका हू। झ्राज हम वाल्मीकि तथा व्यास फी तरह एक ऐसे युग शिखर पर खडे है, जिसके निचले स्तरों भे घरती ने उद्देलित मन वा गजन ठकरा रहा है और ऊपर स्वग वा प्रकाश, पग्रमरा का समीत तथा भावी का सौदय बरस रहा है। ऐसे विश्व- सघप के युग से साम्कतिब' संतुलन स्थापित करने के प्रयत्न की मैं जायत चेतय मानव क्य कत्तव्य समसता हूँ। और यदि वह सम्भव हो सका ती ऋात वा परिस्थितियों द्वारा संगठित सत्य ती भूकम्प, हा तथा महामारी की तरह है ही, उरेके श्रदिग्य बैग वी के रोके सेकती!९

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शह्मशा ८१)4 5? 8। कौन रोक सकता [उद्वेषा।॥ भ्यकर, | !। .) ,, मत्यों की परवशता, मिद्ते,छट॒ फ्रर।!0.... ,:0,/५ 7, ७८.

“22. प्रतए्व मेरी इन रचना! में पाक हे “धर्शीडियर के | वी भ्रथवा नवीन चेताया वे झाविर्भाव सम्बधी झनुसव दी क्षीण प्रति- ध्यनियाँ मिलेंगी | श्रपती इतदण क्ल्पना-बाणी द्वारा जन युग दे इस हा हा रव में मैंने मनीपियों तथा साहित्य प्रेमियों का ध्यान मानव-चेतना के भीतर सुजन शक्तियों वी इन सूक्ष्म भ्ीडाम की झोर श्रावष्ट करने वी चेपष्टा वी है जिससे हम श्राज की जाति-पाँति वर्गों में विकीण तथा आशिक राजनीतिक श्रा.दीलनों से कम्पित धरती को उनत मनुष्यत्व मे वॉधवर विंश्व माँ दर या भू स्वग के प्रागण मे समवेत कर सर्वे मेरे गीता का इसके झतिरिक्त और वोई भ्रय नही हैं। वे मनुष्य वे _मतज़गत तथा-भविष्य को अस्पप्ट भाँक्या भर हैं और नवीन मानव «० चेतना,के सिद्ुर मेरी वाणी के स्वप्न अवगाहन अथवा स्वप्न तिमज्जन

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रे / (८ ४२५६ (७४

इस भूमिया मे है मे गन अपने दिपएरों कोर! भद्दत्व वे भ्रतिं प्रवार ये मो वे घारण हही दिया कैनाओं पाठवा मी सुविधा ने लए झपाी भी स्थनापो गी प्वमूमि पा शत लिच्र भर सीच (दया है। धपनी अऋटिया पूबक दमा घाचना परता हूँ दूति बेली रोड, भगाए सुमिप्रानदन प्त १५ जनवरी, ४४

ये

पूण हुए सब स्वग रंधिर से प्रभिषेवित अ्रव युग सझुणाई ' नाखगा चोणित॑ चेतन, बदलेगा युग लिसद गन बढ मर. जायेंगे युग दीन नर हिगि भाई '

झुग संघर्ष

भीत क्रात दे इस युग के बदि की मत नृत्य मत्त उसवे छदी की बह हंस हँस कए चीर रहा तर्म बे घत मुरली का मऊ रव वर भणस्ता रे

२६ | पत ग्रषावली

विद्युत्‌ प्रणु उसमे सम्मुग प्रव यत पतन, वसुधा पर स्वग सुजन में साधन, ग्राज चेतना गा गत दत्त समापन नूतन या प्रभियात्म बरता मधि मन |

सच सानव

ओो प्रग्नि चक्षु, भभिनय मागव ! सपवज रे तेरा पायब चेतना दशिस्ा में उठा पधपषा, इसयो मन नहीं सकेगा ढठंवा '

यह ज्वाला जग जीवन दायव,--- स्वप्तों थी शोभा से प्रपलव मानस भू सुलग रही धय धव झो नवल य्रुगागम ये प्रनुभव ! तय उपधानसा स्वर्णामना वरण वह शक्ति उतरती ज्योति चरण उर वा प्रवाश नवयर वितरण

नब॒ शोणित से उवर भू मन,

शोभा से विस्मित ववि लोचन,

अग्रव॒ धरा चेतना नव चेतन क्रो प्रतर्शान नयन वैभव !

भू तम या सागर रहा सिहर

जन मन पुतिनों पर बिखर बिखर

उठ रश्मि शिखर नाचती लहर

तिरते स्वप्नों के पौत पझ्रमर

देवी वा स्वणिम वंभव हर

नव मानदीय द्र॒व्यो से भर! लो, गूज रहा अम्बर में रव,---

में लोक पुरुष, मैं युग नव

मैं ही सोया भू पर नीरव

मेरे ही भू रज के अवयव !

अपने. प्रकाश से कर उदभव

में ही घारण क्रता हूँ भव,

नव स्वप्नो का रच मनोविभव ! जय त्रिनयन, युग सम्भव मानव

गोत घिहग

में नव मानवता का सददेश सुनाता, स्वाधीन लोव की गौरव गाथा गाता,

र८ | पत प्रयावली

में मत लितिज वे पार मौन शादवत की प्रज्वलित भ्रुध्ति वा ज्योतिवाह बन झाता ! थ्रुग के सेंडहुर पर डाल सुवहली छाथा में नव प्रमात के नभ में खठ,; मुसकाता, जीवन पतभर भे॑ जन मन की डॉल्ले पर मैं नव मधु वे ज्वाला पल्लव सुलगाता ! झावशा से इउद्देंलित जन सागमर में नव स्वप्सी के शिखरा का ज्वार उठाता, जब शिक्षिर क्रात्त वव-रोदत बरता भू मत, युग पिक बन प्राणों का प्रावव बरसात | मिट्टी के पैरा से भव-क्‍लात जता को स्वप्ना के चरणों पर चनना समिखगाता, तापा को छाया से वलुपित ग्रत्तर की उ'मुकत प्रवृति का चाभा वक्ष दिदाता | जीवन मन के भेदा मं सौयी मति को में झ्रात्म एकता मे अनिभेप जगतता तम पयु, बहिर्पूछ जग में बिखेरे मन को में अतर सोपाना पर कऋष्य चहाता आदर्शी के मर जल से दम्म मृत्रो की में स्वर्गंयाय स्मितत अतंपथ बतलाता, जन जन का नंद भाववता से जाग्रत कर मैं मुक्त कप्ठ जीचन रण शंस बजाना मं गीत विहंग, निज मत्य नीड से उड़ कर चेतना गंयधन मे मत के पर फैलाता, मैं अपने प्रनच्तर वा प्रवाश वरसा वार जीवन के तम को स्वीणिम कर नहंताता ! में स्वदूतां वां दाधघ मनोभावों मे जन जीवन था नितर उनको अंग बनाता में मानव प्रेमी, नव भू स्वयं बसा कर जन धरणी पर देवों दा विभव् लुटदा ! में जाम-मरण के! दासे से बाहर वर मानव को उसका अमरासन दे जाता, से दिव्य चेतना का सदेश सुनाता, स्वाधीन भूमि बा तथ्य जागरण गएता

जागरण गान

ग्रहण करो किर अपि धारा दनत, भारत के नव यौवन,

घरा चेतना भव फि्रि से

छिडा. तुमुल आ्राटोतन !

उत्तरा /

रण छत प्रुणात ३६

यहा विरट पा गषणण, युग गुण क्ूग दी घर. मांग भू 628] टूट रहे घादत तारपानो, संगत

दीर परा पिर ६५ पू मनादधि मई

गातय वी ये वरीशा वा दी

विय सवाविम बयां परे गगठा भू मानवीय गयी नदी. बनापाग जन भू ही जीवन उठ जू िष्य समर में दुघधर छोत मे गु्ग लिरर अयवर, बदव मम्यता पार हृदय मं व्यापा हलाहल भीषण, झमत मं बपा छिंटवेगा दीवन ?

साथव दो मु मग ने जप तप साधन, बाघों पी बाँदी भर कऊीवन मनुज चेतना गठे मूर्स भता के नव पन

एव सात नी महू विनाश परियायव,

गतन भण्ता उर में बलाहकी।

उतर लत ज्वलित तडित्‌

क्लमार सी गुग परिवतन,

आज उपचेतन

उद्दोधन

मानव भारत हो नव भारत।+ जन मत धरणी सुदर,

3० | पत प्रयावली

नवल विश्व हो वह आभा-रत,

सकल भानवां का घर ! जाति पाँति देशों में खण्डित मू जन, धर्म नीति के मेंदों में बिसरे मन, नव मनुष्यता में हो मज्जित जीण युगो के अन्तर, विचरें मुक्त हृदय, अन्त स्मित, प्रीति युक्त नारी नर!

लोक चेतना ज्वार बढ रहा प्रतिक्षण

स्वप्नो के शिखरों पर कर युग नतन,

तडक रही हथकंडिया भनभन

मन के पाश भयक्‍र,

अग्नि गर्भ युग-चिखर विकट

फ्टने को है, छोडो डर ! आज समापन युग का वृत्त पुरातन, भू पर सस्कृति चरण घर रही नूतन, रंग. रंग. की आभा परखडियाँ वरसाता भुष अम्वर, खोलो उर के रुद्ध द्वार, जन, हँसता स्वण युगान्तर !

विश्व मन सगठन हो रहा विकसित,

जन जीवन सचरण ऊध्व, विस्तृत,

नव्य चेतना केतु फहरता,

सत्त रंग द्रवित दिगन्तर,

आदर्शा के पोत बढ़ रहे,

पार अतल भव सागर ।! स्वग भूमि हो भू पर भारत, जन मन घरणी खुदर, अन्तर ऐश्वर्या से मण्डित मानव हो देवोत्तर 7

स्वप्न क़ान्त

स्वप्न भार से भेरे क्घधे

ऋुक भुंक पड़ते भू पर,

क्लान्त भावना के पग डंगमरस

कॉपते उर में निस्‍्वर।! ज्वाला गर्भित झोणित बादल सलिपटा धरा शिखर पर उज्ज्वल, नीचे छाम्रा की घाटी भे जगता ऋदन ममर

उत्तरा / ३१

भ्रन्तव्यंथा

ज्योति द्रावत हो, है घन ! छाया सशय का तम, तृष्षा भरती गर्जन, ममता विद्युत. नतन करती उर में प्रतिक्षण | करुणा धारा में भर स्नेह पभ्रश्नु॒ बरसाकर, व्यथा भार उर का हर शात करो आकुल मन तुम गसातर के क्र दन, अक्थनीय चिर गीपन, भंद्र सस्‍ततित भर चेतन करो ग्रनिष्ट निवारण घट घट |, वासी जलधर, तुमको ज्ञात निरतर श्रतर का दुख निस्‍्वर करता जो नव. सजन | मन से ऊपर उठकर विचर ऊध्व शिखरो पर स्वगिक आभा से भर उत्रोी बन नव जीवन खोलो घर वातायन आये स्वग किरण _ छन, भू स्वप्नो का नूतन रें इंद्र धनु मोहन |

उन्सेष

उमड़ रही लहरा पर लहरें घिरते घन पर घधिर घन, स्वण रजत बालुका पुलिन -से टूट रहे मन के प्रण। टकराते शत स्वप्न निरतर, रहस ध्वनित बर पझावुल झतर, सशय भय वे कूलों पर भर नव प्रतीति का प्लावन ! यहू प्राणों की बेला दुधद स्वप्न हिखर लहरों में उठकर करती मानस गीत तरमित भर निःस्वर॒ जय गजन

उत्तरा / ३३.

आगमन भौद गूजण्ण झुगता में तन. शमर पंप प्ले बने मे झाज भर गया समीरण स्‍्वग मर्पुरिमा ६” के) गत दिएलाता जीवा. परभते भु छोत प्ितिज उर गा घातावनते/< लौत जागएण थे एम दाण मन अऋन मे एप मन गाता, क्न॑ नहीं समाता, ऋझादेश छ्वार उठ

स्वग स्वप्नो को शी णज्वार विश्व सत्य मे पुलिन डवाताई लहराता (ताइवत के जीवन मे लहर पर. लहर

झा रही पढे ड्घ रहे मुग थे भन्‍तर, गह इगन्तमर्न भा झा दोलन दे लर्न॑ झसुर जूभते। जीतते भेमर, घरा के कल! घहौँ बढति चरण ? हुआ समापन बाहर की रा के शोणित स्ते लथपथ झाज मेंस जूता मन: मरते में नव वेतन भे ओऔरन सुजन मौन आज बंयो वीणा क्ले स्वर) इस. नीख्वता मे तुम गोपन

कौन राय रहे नूतन स्तब्ध देव कूम्पत मे जगते ऋझाशा भय; संशय जय थर घर

बेड [ पत ग्रयावली

स्वप्नों से मुँद जाते लोचन, ग्रावुल रहस प्रभावों से मन, प्राणो से कैसा पाकपण बहता जाने सुस्त नें माथर | तुम शाश्वत शोभा के मधुवन शिशिर वसंत णहाँ रहते क्षेण, आ्राज हृदय के चिर योवत्त बन भरते प्रिय, भ्रतमुख ममर ! रमो में गाता हुसुमाकर, सौरभ में मलयानिल निस्वर, मील मौन में गाता श्रम्बर घ्याव लीन सुख स्पश्न था श्रमर ! शोभा भें गाते लोचन लय, प्राण प्रीति के मधु में त॑ भय, रस के बस, उल्लास में श्रभय चाता उर भीतर ही भीतर मौन झाज वया वीणा ये स्वर ?

युग विराग

भूकी ममता मिटती जाती मेधो थी छापा -सी चचल, सुख सपने सौरभ से उडते, भरत धर ये रगो में दल ! पुछती स्मृति पट थी रेखाएँ धुलते जाते सुश्ष दुख के क्षण, चेतना समीरण - सी बहती पिखरा झोसो के! सजित बण ! वह रही रांग मे नही जलन वुछ बदल गया उर के भीतर, खो गया कामना वा घनत्व, रीते घटसा शभ्रत्न जग बाहर ! यह्‌ रे विराग थी विजन भूमि मन प्राणों थे साधन के स्वर, तुम खोल स्वप्म वा रहस द्वार जी भ्राते भीतर भ्राज उतर,“ हँस उठता उर का भ्राधकार नव जीवन शीभा में दीपित, भू पुलित डुबाता स्वग ज्यार, रहता कुछ भी भ्रचिर सीमित ! फिर प्रीति विचरती घरती पर करती पं पग पर सुदरता, बन्धन बन जाते प्रेम मुक्ति देव प्रिय होती नश्वरता !

मेघो के पर्वत

यह मेघो थी चल भूमि घोर

बह रहे जहाँ उनचास पवन,

तुम बसा सवोगे यहाँ कभी

क्या मानव या गृह मनोभवन ? जप - जन का मात्र ॥रतां गे बरसाती चिंतदा भिंधुए्‌ १४,

घत्तर। / १४

टवराते दुदम फेन शिएर रागर - सा उपयाता मूं मन !

यहू बिदव छशावितयां मी त्रीड़ा

गत छायाएँ बाती चेतन,

जने “मन विमुद् शिनया बाहुब,

बढ़ता जाता युग॑ राधपण ! पर्वत पर पवत राडे भीम, झदते तृप्णा, प्रभान, भह, उमथित धरा - चेतना सिघु प्रादोलिन धवर्चेततव वा तम |

भन स्वग - शिप्र पर मंडराता

उर में गहराता नव जीवन,

वह भ्रतर भाभा से स्वणिम

ऋरता भू पर, स्वप्ना पा पन !

प्रगति

तुम बाधा बाधन में बढते प्रतिक्षण हो, कॉटो भें भूल सखिलाते ज्वाल सुमन हो - जब हृदय दाह से फेपती धरती थर - थर जब प्रलय ज्वार में पुलिन डुबाता सागर, लहरों के शिप्रा पर घरते नतन हो! जग जीवन आज बना स्वार्यों का प्रागण, जीवन वी सार्घे क्र उठती बन - रोदन, प्रत्तर कराहता,-- अव युग परिवतन हो है ज्ञात, गढ गहे हो तुम मानव नूतन, सोदय प्रेम आनद क्षेम कर वषण, प्रभार में सुलगाते नव मधु यौवन हो! वह ज्योति मेघ श्रव उत्तरा हृदय शिखर पर

३६ | पत ग्रधादलो

ध्र। मे शुएपपु

इैदप्लों हो पावर भर ! तम भा में मात्र को कदम ने ऑदनण है), गुप भाषा मापत मे इइते प्रतिधाय हो!

प्रतिक्रिया

स्य धोतोी. होश दापन बेब « मत... दापन शोध परी धर गशा खुगतो रन भा सधयार दाररा भा रे लिपे था ग्दादी पु पाए मुंद हप. सानपरा री०+-- हैं; एड प्रव घर पाए मेक ह# प्रांधय ! आशय प्रारा गाा भोशर भेधि हीति दे पुतिन शुदापर इुमड पाध्ये मे ए९ प्रम्शर शाएए को ब२ 39०९, हुए रहरा भर युग गजल, भरे प्रा शव! धूदा, पूृष्ा हए बरी मार से मनन, धृष्या, पूछा ही घाजग पर प्राण, हुम मपुज प्रीति मे उप शरो परियवव,+- प्र रो पता भा प्राशान, भू शी पतन !

भनोभग

तुम हेंतने - हैंगव पुण्रा था गये भन मे, जन मंगत हित है! हद पदों जग भा प्राधवार, भू ये पापा वा विषम वार, मेट्रो भावद्र थ्र अहगार, विर सबित सुम्हू मममादर है, पु परियतन मे ! तुम तपतलपंद ट्प बने गये मंत्र में जन भगत हित ₹! बशे जीर्द से सपर्यत, फिर हरे घरा मन या कम्पा,

ब्ड्श्लरा इ3

तुम मुसकाग्रो है, दीपित कर जीवन रण की *

भू वीणा

झ्ाज करो फिर भू जीवन की

वीणा को नव भकछृत,

उसकी ग्रोपन आकाक्षाएँ

नाच उठें स्वर मुखरित! मम कथा मूछित जो निस्‍्वर भाव गीत विस्मृत जो सुदर, स्वप्न ध्वनित कर प्रमर स्पश्म से उहू करो नव जागृत

युग - युग के स्मृति तार साधकर हृदय - हृदय के मिला मौन स्वर दोभा शक्ति मघुरिमा में नव

करो विश्व उर स्पादित।

जन - जन की झाझा अभिलापा जिसे नहीं कह प्राती भाषा, जय जीवन के मूत्र राग में

हो समवेत्त प्रवाहित बरसे नव सं स्वप्नो की भर, प्रीति तरगित हो उर श्रम्बर, एक गीत हो जन भू जीवन

तुम जिसमे हो वादित !

परिणय

फिर स्‍्वग बजाये धरती बी वीणा निरचय, जो कम - भग्न उर तुम पर नहीं करे संशय नभ के स्वप्ना से जगत जलधि हो रहस ज्वलित जो अमर प्रीति से हृदय रहे नित पग्रादोलित ! ऊपा पावक से भू के वबण हो नव चेतन, तम का क्पाट सोत सके तांद्रित भू मन !

उत्तरा /३६

डॉ

फिर ऊध्व त्तरमिन हो जन घरणी था जीवन, शाश्वत के मु था मानव मन जो हो दपण!

मर्यों पर सुरगण कर अभशमरता योछावर, जो व्यक्ति विश्व में मृत बने मानव ईश्वर ! फिर स्वग बजाये भू की छुत्ततत्री निश्चय, जो ज्ञान भावना, बुद्धि हद वा हो परिणय !

भू प्रागण

आज बरो धरणी का प्रांगण ! नव॑ प्रभात के स्वण हास्य से रध्मि गम हो धरा रेणु कण !

छोडी निज स्वणिम रहस्य शर धरा वक्ष इच्छा विदीण कर, स्वग रुधिर मुृण्मास से बहे उर में हो चेतना गहन ब्रण!

शोभा से सिचित हो भू तन, सनुज प्रीति सब्यधित लोक मन, स्वप्ना वे वेभव से व्यादुल हँसे श्रश्ुओं में वसुधानन !

लिपटे भू के जघता

से घन

प्राणोा की ज्वाला जन मादन॑, नाभि गत में घूम मंँवर -सी

करे. मं प्मावाक्षा अग्ति ग्भा उर वे शिसरा पर उतरे सुर - आनद रस निखर,

अन्तर्जीवन के धभव से मुकुलित हो जगती के दिदि क्षण जीवन उत्सव

असरणोंदय नव, लोकोदय नव !

मगल ध्वनि हर्पित जन मादर

गूज रहा श्रम्बर मे मघुरव स्वर्णोदय नव, सर्वोदय नव

रजत भॉभसे वजते तरदल

स्वर्णिम निझर भरत कल -क्ल,

४० /पत प्रथधावलो

नतन !

भू योवन

फूला की चोली म॑ कस दो

ग्राज घरा उर यौवन '

उमर्डे सौरभ उच्छवासो के अम्बवर मे सत्तरेंग घन

प्राणो में जागे मधु गुजन,

ग्रत्ननभ में पचस कूजन,

स्वप्न मजरित हो शोभा से युग स्वर्णिम जन प्रागण !

ज्वाल प्ररोह दिशा हा पुलक्ति

रंग रंग की इच्छाएँ कुसुमित्त,

भुके सफल जग जीवन डालें रश्मि ज्वलित पा चुम्बन !

मनुज स्पश से हो भू चेतन,

दव हप से अ्रतलॉचिन,

सीमाआ मं, भगुरता में असीम चिरन्तन !

बाँहा मे हो प्रीति पल्‍ललचित,

प्रन्तर मे रस जलधि तरगशित,

स्मित उरोज शिखरो पर बरसे स्वग॑ विभा सुर मोहन

भ्‌ जीवन

ना, तुमको भी क्‍या डक लेगी घरतो की वेणी अ्रधियाली ? तुम भू के जीवन के तम मे दो गूव उपा मुख की लाली वहू हरी मसमली चोली मर बाँचे मुकुला के स्वप्त शिखर, तुम उन पर निज चतना रध्मि वरसाझ्नो, वे नव उठे निखर ! फूला की दब्या पर लेटा मधु से गुृझित उसका योवन, तुम उसके कम्पित अ्धरा पर घर दो प्रकाश का चिर चुम्बन ! फामता लता उसकी बाँह कंपती पललव पुलकित धथर- थर, तुम भू रण थे परिरमभ्भभ मे दो निखिल स्वंग का वेभव भर! उत्योी पथु श्ोणी मे सोम शत्त ज्वाल गभ निश्चल भूधर, जीवन वा छायातप झभोढे लंठे जितने पर मू-जन सिर धर! मधुरर कोॉरिल से दल भरत मजरित स्वण काँची कटि पर जने -मन के गुजन कूजन से रखती रज के तम को उबर!

उसके जघना के पुलछिना सम सोयी शत बरतां की ममर, उनम प्राणा वी वला का लहरा दो चंद्र ज्वलित सामर !

वहू चतती, जझपा उडती मम पर, जीवन ये धर शत चरण मुखर, सहरयोे - सो, समीरण - सी, पा - पग पर शावा पडती कर!

४२ | पत परपायलोी

चेतना चाँदनी-सी उसकी, तम ग्रो' प्रकाश जिसमे गुम्फित, तुम उसका निजन शयन कक्ष नव स्वप्ना से कर दो दीपित ! बहू कहती, तुम उसके प्रकाश बहू जिसकी जीवन-प्रिय छाया, श्री सुपमा, प्रीति भधुरिमामय हो, देव, तुम्हारी रज काया ! वह प्रणत - यौवना चरणों पर बेठी, उर में प्रिय स्मति ददान, तुम प्राप्नों, उसके सेंगे बैठो, संगीत बने भू का क्रदन |

मौन गुजन

प्रा्मो ह, इस मस विभोा मे स्वप्न चरण घर नूतन, ग्रब रहस्य रह अभतर का बहिजेगत से गोपन * झग्राज मिल गया आभा से तम चेतन ज्योत्तना में हँस निरुपम, ग्राझ्मे, निज॑ शशि मुख से सतरंग उठा मोह भझ्वगुण्ठन !

स्वप्नो दी कलियां - सा कोमल

खोल वक्ष शोभा का उज्ज्वल,

मेरे उर कृम्पन मे अपना

अमर मिलाओ स्प दन

मौन हुम्ना प्राणो का गुजन,

डूब गये मधु विस्मृति में क्षण,

भन में ममस्पह सौरभ का

खुला रहम वातायन यह उर की नीरवता का क्षण, निष्क्रिय शुय ने जीवन बजन, नंबर जीवन का स्वप्त हुदयय मे करता जो भ्रव धारण ! कर दो नव स्वर-लय मे परिणत प्राणों का ऋन्‍दन मर्माहत, आग्रो हे, मन्त की द्वाभा में स्वप्न चरण धर नूतन !

काव्य चेतना

तुम रजत वाप्प के अम्बर से बरसाती थुशञ्र सुनहली भर, शोभा की लपटो में लिपल मेघा का माया कल्पित घर ! सुर प्रेरित ज्वालाएँ कॉपतो फहरा श्ाभाएं श्राना पर,

उत्तरा | ४३

शत रोहितप्रभ छायात्रो से

भर जाता तडित' चकित प्रन्तर सुपमा की पखंडिया खुलती फेजा रहस्य स्पज्ञों के दल, भावा के मोहित पुलिनो पर छाया प्रकाश बहता प्रतिपल '

सतरगे शिख्रा पर उठ गिर

उडता हाशि सूरज सा उज्ज्वल,

चेतना ज्वाल सी च॒द्र विश्ा

चू पडती प्राणा भे शीतल जलते तारा-सी टूट रही अब अ्रमर प्रेरणाएँ भास्वर, स्वप्पो की ग्रुजित कलिकाएँ खिल पडती मानस में नि स्वर !

तुम रहस द्वार से मुझे कहा

गीते ले जाती हो गोपन,

शोभा में जाता डूव हृदय

पा स्पश तुम्हारा सुर चेतन

सम्मोहन

स्वप्ना की शोभा बरस रही रिम किम किम प्रम्बर से गोपन, चुत धृपछाह सुरधनु के रंग जमते भ्रतर-पट पर प्रतिक्षण |

तुम स्वग चादनी-सी नीरब

चेतनामयी श्राती भू पर,

प्राणो का सागर चद्) ज्वाल

लहराता इच्छा मे॑ नूतन ! जीवन की हरियाली हेँसती, कंपती छाया पर जायाएँ, रंग रंग की श्राभाएँ बखेर सजती झ्ाशा नव सम्मोहन !

सुछ दुख मं भर नव स्वर सगति

कल्पना सप्टि रचती ग्रभिनव,

दवि - उर शस्वप्नों के वभव से

करता जन सू का अभिवादन !

हृदय चेतना

तुम चाद्र ज्वाल-सी सुलग रही नीवन वी लहरों मे चचल

४४ | पत प्रथारतपों

स्वगिक स्पर्शा से अन्त स्मित कॉप-कप' उठता चल मानस जल

तुम स्वप्त द्वार पट हटा रहस

लिपटाती शोभा मे दिति पल

निज स्वण मास का वक्ष खोल

सुपमा के भुकुला का कीमल तुम मौन शिखर वरसाती लावण्य प्रीति उल्लास नबल मिट्टी के तवाद्रल रोग्रा में प्राणा का पावक भर विह्नल !

प्रथ. मा थत विश्व विरीघों म॑

जन जीवन वारिधि क्षव्व विकत

तुम चूम धणा - झ्रधरो का बविप

तम का मुख करती स्वर्णोज्वल

निर्माण काल

लो, श्राज करोखा से उड़कक्‍र फिर देवदूत झात भीतर, सुरपनुग्। के स्मित पे खोल नव स्वप्न उत्तरत जन पर ! रंग - रग के छाया जलदां-सी आाभा प्रखडिया पड़ती कर फिर मनोलहरियी पर तिरती विम्बित सुर अप्सरिया नि स्वर ! यह रे भू का निर्माण काल हँसता नव जीवन ग्ररुणोदय, ले रही जम नव मानवता भव खब मनुजता होती क्षय ' ध-घू कर जलता जीण जम्रत्त लिपठा ज्वाला जन श्र तर, तम के पवत पर टूट रही विद्युत्‌-प्रपात सी ज्योत्ति प्रखर सव्रपण पर कद सघपण यह देविक भौतिक भू कम्पन, उद्वेलित जन मन का समुद्र, युग रक्त - जिल् करता मतन * ढह रहे श्र विश्वास श्वूग युग बदल रहा, यह ब्रह्म श्रहन्‌ फिर झिखर चिरतन रहे निखर यह विश्व - सचरण रे नूतन बज रहे घटियो-से तरुदल छवि - ज्वाल - पललवित जग जीवन, नव ज्योति-चरण धर रहा सूजन फिर पुष्प वष्टि करते सुरगण! भ्रव॒स्वण द्रवित रे आतनभ भरते नीरब तोभा सिभर, भ्रवतरित हो रही सूक्ष्म शक्ति फिर भीन गुजरित उर अम्पर | बेंबता प्रकाश तम-वाहां मं सुर मानव - तन करत बारण, फिर लोक चेतना रग भूमि, सू-स्वय कर रह परिरम्भण !

अनुभूति तुम आती हो,

नव अगो का शाइवत मधु विभव बुटठाती हो !

उत्तरा / ४५

स्वर्ग बिभा

ऊंसी दी स्वग विभा उंडेल तुमने भू मानस में मोहन, मैं देख रहा, मिट॒टी का तम ज्याला वन धपक रहा प्रतिक्षण ! नव स्वप्नों की लपरदे उठती शोभा की प्राभाएँ बखेर, अत रंग की छागपाएँ कंपती उपचंतन मन का गहने पेर।

ज्या उपा प्रज्वलित सागर मे ड्बता प्रस्तमित शशि मण्डल चेतना छ्ितिज पर भाभा स्मित भूगोल उठ रहा स्वर्णोज्वल ! लिपटी फूला से रग ज्वाल, गूजते भधघुष, गाती फोयल, हरिताभ हर्ष से भरी धरा, लहरा के रदिम ज्वलित भ्रचल * भौतिदा द्रब्यों बी घनता से चेतना भार लगता दुबह, भू जीवन का झालोक ज्वार युग मन के पुलिना को दुसह ! चेतना पिण्ड रे मूं गोलक युग -युग वे मानव आवुत, फिर तप्त स्वग-सा निखर रहा वह मानवीय बन, सुर दीपित

नंद पावक्त

घव नब ऊंपा के पावक का पलल्‍लवित हो रहा भ्‌ जीवन शोभा की कलियो या वैभव विस्मित करता मन दे जोचन ! में रे केवल उमन मधुबर भरता शोभा स्वप्निले गुजन, कल आयेंगे उर तरुण मुग स्वोणिम मंधुक्ण करने वितरण |!

यह स्वण चेतना की ज्वाला मानत्र झात पुर की गापन जो कूद - कूद नव सत्तति में बढती जायेगी नव चेतन वह पूण मानवोी का मानव जो जन में घरता क्रम्िक चरण, बह मत्य भूमि को स्व॒ग बना जन म्‌ को बर लेगा धारण ! भव घरा हृदय-शोणित से रंग नव युग प्रभात श्री मे मणज्जित, झय देव नरा की छाया में भू पर विचरेंगे अत स्मित

गीत विभव

मं गाते +|८0 मं प्रा का,

स्वर्णिम पावक हर है (। कव टूटेंगे मन के वदाधन

रज कौ तन्द्रा होगी चेतन, 74 बब, प्रेय ! कामना की दाद ४४ - खुल, तुम्हे करेंगी आलिगनोत £ि- 3 «का मैं गाता हैं, में जन - मन को ज्वाला का पथ बतलाता हूँ! कथ हलीपित होगा जीवन तम कद विस्तुत होगा मनुज भह,

टूटत ॥शखर पर मान्तस्न के रंग - रेंग के छाया रत निर्मेर, नव सुपमा, प्रीति मघुरिमा से भर जाता ज्योति द्रवित अन्तर

मैं उतर, देखता चकित नयन

रवि आभा में डूबी घरतीं,

हरियाली के चल श्रचल मे

किरणें स्वप्ता के रंग भरती। भू की अतप्त अतर ज्वाला फूलो में विहेंस रही सुन्दर, आकाक्षा का श्राकुल क्रादन मधुकर में ग्रूज रहा मनहर !

वह मिट्टी की डबय्या में जग

भरती प्रकाश में अ्रगडाई,

मुकुलित भ्रगा से फूट रही

उमत स्वग को तरुणाई | वह देवा के उपभोग हेतु मिथ खोल रही निज वक्ष स्थल, उसके प्राणों का हरित तिमिर जीवन में निखर रहा उज्ज्वल

बहू मानवीय वन उभर रही

पा स्पश तिजरा का चेतन

वह्‌ू वनी शिला से मातु मूत्ति

उर म॑ करुणा का सवेदन आकाश सुके रहा धरती पर बरसा प्रकाश के उबर कण, घरती उसके उर मे घुनती छाया का सत्तरेंग सम्मोहन

हो रहा स्‍स्वग से घरणी का

जड़ से चेतन की रहंस भिलनत

भू सवग एक हो रहे शर्नें

सुरगण नर तन करते धारण !

शोभा क्षण

फूलों से लद॒ गये दिशा क्षण भरता भ्रम्बर गुजन पुलका में हँस उठा सहुज - मत निजर करते गायन झवचेततव में लीन पुरातन, स्वप्न वृष्ठि श्रब करता नूतन,

उत्तरा [ ४६

प्रा की ममर म॑ ऋकद्त भ्रव सुर वोणाग्रा के प्रिय स्वर,

शोभा वी प्ररुण शिसाप्नो से प्रज्वलित घरा दिक्‌ प्रान्तर ! यह विश्व क्रान्ति ! मानव उर में सौदर्य ज्यार उठता नूतन, मन प्राण देह वी इच्छाएँ बरतों वपिसरा पर झारोहण !

तुम बया रटत थे, जाति, धर्म, हाँ दंग युद्ध, जने झ्ादोलन !

वंया जपत थे, धादश, नीति, वे तक याद प्र क्सि स्मरण ! गोपन॑-न्सा उुछ हो रहा झ्लाज जन मन भीतर परिवतन, प्रन्तश्चेतव ताघ्ण्य फू८ गंढता झंव नव जग का जीवन

यह मानवीय रे सत्य प्रख्लिल, आधार चतता, पला वुशल,

यह सुजन प्राण होती विकसित जड़ से जीवन मत में मविकल ! बह विस्मृत कडी जगत कम की जिससे समृद्धि यरिणाति सम्भव, फिर झात थो ऐश्दय ज्वार पभ्रव लोग चेतना मे प्भिनव !

जीवन दान

मैं मुटठी भर भर बाँद सक्‌ जीवन के स्वरणिम पावक बण, यह जीवन जिसमे जाला हो मासल आकाक्षा हो मादन वह जीवन जिसमे शोभा हो, शोभा सजीव, चदल, दीपित, हू जीवन जिसको मम प्रीति सुस-दुख से रपती हो मुखरित ! जिमम ग्रततर का हो प्रकाश, जिसमे समवंत हुंदय स्पादन, में उस जीवन यो वाणी दू जो तव आदर्शा का दपण ! जीवन रतस्पमप, भर देता जो स्वप्नो से तारापय मन, . जीवन रफ्तोज्वयल, बरता जो पित रुधिर शिराप्री में गाया ! इसमें तनिक सशय मुकरो यहू जन व्‌ जीवन का प्रागण, जिसम प्रवाश वी छायाएँ विचरण वरती क्षण घ्वनित चरण मैं स्वगिक शिक्तरा का वेभव हूँ लुदा 'रहा जन धरणी पर, जिसमे जग जीवन के प्ररोह नव सानेवता मे उठें निखर ! दवा को पहना रहा पुत्र में स्वप्न मास के मत्य बेसन, मानद ग्लानन से उठा रहा प्रमरव ढेंके जो पझ्वमुण्ठन !

स्वप्न चेभव

में ही केवल इस धरती पर घर रहा नही स्वप्ना ये पग, मैं देप रहा, छायाप्रा के पद चिह्ता से कम्पित भूमग।! ये मत्याँ के पद कभी रहे देवो के चरण, नदी सशय, नव स्वप्मा के ज्वाला-पग घर जन कभी चलेंगे हो निमय मन के बाप्पो का सूध्म जगत वन रहा स्थूल जीवन वा घन, उसम घनत्व रहा सजल बह तडित गम भरता गजन ! लो, झच स्वप्ना का रजत व्योम हो रहा द्रवित्त, जीवन कर बन, यह किरणा या रोहित प्रकाश वितरण करता उर चेतन ! मानव के अतनभ में घिरे उड़त नव झाभा प्ध जलद, हो रही मन मगठित श्राज फिर विदव चेतना लोक वरद

उत्तरा | ५१

प्तत्य

तुम शदवा पमस ढक क्षेत्र

प्राद्) कप प्रधय अवकाश 2?

याजजिय- पु बल रोकोगे

मावव का देव) त्तर विश्ात्ध तुम पनत्व + बापोग वे की बत्ि श्रियता, पनतता, निमम ब्त्व भम प्र/कोगे जीवन भी चेतन कोमलता

ह्‌ पुपार की चिता ध्वय,

पत्र मे जल जाप्रोगे गत्त,

भीतल मकाय ही नहा क्त्प पह के पक्का & पुम कध का के कुत्ता मे जागो, मगत्त, बे के रोडो & व्फ्य पढ़ते जाप्री, क्षण शा उयगल

सीमा पुत्तिन) पे उठफर

जो उठत हे र्भ ज्दर,

प्क्ष्म वाष्य क्या पकडोके

णो केरते धितसे पर ?ै उनके प्रन्तन मे सुलगी हार गत रत्ता को ऐश्क्य ज्वाल लिपटे उनसे स्मित ज्वतित पिष्ड, रवि पति करण। श्द्धजाक़त

वर भत्ता चेतना का उनको,

जड़

युग सन

भब॑ मेघ मुक्त होता थुग मन ! अ्रदपट पड़ते कवि छद॒ चरण, बहता भावां में शब्द चयन !

जिन आझ्रादर्शों में उर सीमित,

जिन भ्रम्यासों से जन पीडित,

जिन स्थितिया से इच्छा कुण्ठित उनमे बढ, लिखरे रहा सूतते

जगते मन में सव सबेदत

नव हुप कर रहे प्राण वहन,

श्रज्ञात नव्य का झाकपण मज्जित करता जन - मन प्रतिक्षण |

अत स्वप्त सत्य. बनते निश्चय,

अब तथ्य स्वप्न - सा होता लय,

जत हुंदय-कान्ति का रे यह क्षण प्रतिबिम्ब वहिंजग संघपण !

भू होगी उर शोणित रजित असुणीदय होने को. निधिवत, रजनी का काोदन डूब रहा

बन युग प्रभात मभ॑ जय कीतन |

पह रे तम्रिस्नत का शोप छोर,

देखो, वह हँसता स्वण भोर,

ग्रत्तनभ नव चेतना. द्रवित, मानव युग घरता भूति चरण!

छाया सरिता

क्या भाकछुल अंतर ? गाती रहती जो प्रतिक्षण क्या दाइण सुदर ? बनती रहती जो मोहन * छाया सरिता - सी बहती रहती हो मि स्वर, नीरव लहरा मे जगा झतल. के सवेदन ! सोया निचले तल में प्रकाश,---जों केवल. तम, श्रोणि देश प्राणा के जीवन का मादन !

उत्तरा | ५४३

जन इसे कला मादर में नित करते पग्रन्तमन के स्थापित, शिव सुदर सत्य चयन कर चिर प्रिय चरणा पर करते भ्रपित |

शत इंगित बनते मुखर नृत्य, पलकें दक, छवि करती प्रकित, जीवन के सुस - दुख इस देस स्वर भीतो में होते भकृत |

प्रीति

भेघा के उडत स्तम्भ पड़े लिपटी जिनसे विदय्युत्‌ ज्वाला, बाहर को प्रध खुला विराट जीवभ बकपाट तमर का काला !

भीतर वाष्पां के कौश मसुण नव इंद्र जलद लटके कम्पित, जिन १२ प्राणा की रग॑ छठा करती मन के लोचन विस्मित !

चल जलदो के पद के भीतर दिखते उडते तारक प्रगणित, निज ज्वलित द्रवो के पख खोल क्षण प्रभ उर भूुगो से गुजित !

भ्राग भवुल चेतना तीय नव शरद चाँदनी -सा प्रहसित, नीरव रहस्य सुख से सुरक्ित स्वप्ना की कलियों का मोहित |

जाज्वल्यमान रबि लोक बहा बहु दिव्य रश्मियो से मण्डित, ग्रतर तुपार के शिखरों पर मीहार ज्ञान का चिर पुजित |

ग्रानद घाम शोभित भोतर

ऋरते भ्रनत रम के निभर,

शोभा के स्वणिम फेनो पर

कंपते सुर वीणाग्ना के स्वर | उर कम्पो, पुलको से बल्पित शरगि रेख प्रीति प्रसाद सुघर, फकॉकते भरोखा से बाहर अनिभेष सत्य शिव सुदर

रहती अत पुर जझाइवत

तुम अ्वचनीय सुपम्मा मे लय,

होते इताथ, छू चरण परम

जीवन के सुख दुख, भय सशय !

उत्तरा [| ५४

शरद चेतना

तुम फिर स्वप्ना का पट बुनती ले जीवन से छाया प्रकाश, फिर गीत स्वरो का जाल गूथ उलभाती सुख-दुख प्श्नु हास |

झद घिखर गया पावस का घन, ठण्ठा निदाघ का स्तर भ्रेंगार,

प्रवब दँतती उज्ज्वल घूली | उजियाली में आया र!

ऋतु प्रान्‍्त जलद के वस्थ फेंक ग्रलसायी धगा में कोमल,

फिर गढ़ प्रकृति का मौन स्पश इन्तर को छू करता शीतल!

फूलों के रगा की ज्वाला, तद वन का छाबातप कम्पित, तुमसे भू कलरब कजन सौरभ गुजन ममर गुम्फित [

तुम स्वेप्तोी का नीरव पावक सुलगाती प्राणा में पुलक्षित, तुमम रहस्थमय मौन भरा तुम स्निग्ध शान्ति-सी विरह द्रवित |

ज्यां बादल के अचल से छन स्राभां रह जाती क्षण छाया,

तुम मन के गुण्ठव में जगती लिपटा इच्छा, ममता, माया !

तुम मुझे ड्वा लो अ्रपने या मुभमे जाप्नों स्वय डूब, जन्म फटो मेरा मोह चीर ज्यो कढंती भू को चीर दूब

जंगता लो, तरुण प्ररोह एक शव फाड धरित्री का झचल,

कंपता अ्रगा में हरित रुधिर,-- उड़ने को पे खोल विह्नल

तुम खोल देह मन के बाधन चेतना बन गयी किर उज्ज्वल, उमगा प्राणा का मेघ, लिपट, निखरी तुम,--अब वादल झोभल !

उत्तरा | ५७

श्द्ग प्भ घन मवगुण्ठ पञ्मुसती ऋतु, पारिज लोपा: _ बलिन रिक्र्ती विचरण स्वप्न नज्पत्तित तारापथ 55 त्वग ज्वार सम मुकु् स्मिति, पन्ित पट रण सोम्प , निरि

हे डे प्यतिफ

बन बे कप,

प्वप्ण चरण धरती बह हम

निशा छवि _ उर भरे छायः ममर कह कक का पेमीरण अधिक रंग भपत् बंध भव भी भोभा

पौम्य चरद भी का बे जीवन आतप नेयता 63 रत के जेचत पेध परती ++ तम जलता हे

मनिद्वर ज्ठा भाषणों कक यो

फूत भास के खिल्ले चपल अ्रग

नीले पीले बथ् कं

आकाक्षाओं का

मिरसी की सोधी सुयध

रूप स्पश रस दाब्द गंध की हरित धरा पर भुका नील नम

क्या समीर ने लिपट, विठ॒प को

किया पलल्‍लवो में रोमाचित ?

झंगडाई ले वाह खोलना

प्िखलाया डालो को कम्पित क्या किरणो ने चूम, सिलाये रंग भरे फूलों के आनन ? सृजन प्राण रे स्पद्य प्रेम का सच हैं, जीवन करता घारण !

मूल भूत - कामना एक ज्यों

प्रो मं कप उठती भमर,

प्रिय निसर्य ने अपने जग में

खोल दिया फिर मेरा अभतर |! एक शान्ति - सीं, पावनता - सी विचर रही धरती पर निस्‍्वर, छायातप में, तणश्रचल मं ज्वाल-वसन कुसुमा के तन पर !

रग प्राण रे प्रकृति लोक यह

यहा नहीं दुख देय अ्रमगल,

यहा खुला श्री शोभा का उर,

यहा कामना का मुख उज्ज्वल !

मम्तता

अब शरद मेघ - सा भेरा मन हो गया ग्रश्च॒ भर से निमल, तुम केपती दाभिनि-सी भीतर, शोभातप म॑ लुक - छिप प्रतिपल !

विद्यत दीपित करती घन को

वह नही ज्वाल में उठता जल,

वह उसके अन्तर की झ्राभा

तुम मेरी हृदय शिखा उज्ज्वल ! यह॒ प्रीति द्रबित हलका बादल मेरे ममत्व की छाया भर, तुम चघडिल्लता -सी खिल पड़ती जिसमे जीवत की रत्य प्रमर !

इस विरल जलद पट छनकर

तुम बरसाती ऐद्वय ज्वार,

छाया प्रकाश के पटल खोल

भावा वी गहराई निखार

उत्तरा |

ज्योत्सा रूका से बम्पित

हलकी फुदार-सी पड़ती भार

वह भीगी स्मृति, मानस तट पर

छापा लहरी-सी बिखर बिखर ! सुख-दुत की लपटो में लिपटी, भू के अगारो पर प्र धर, वह बढ़ती स्वप्ला के पथ पर शत प्रिन परीक्षाएँ देकर '

झद प्रेमी मन वह नहीं रहा

ध्व प्रेम रह गया है केवल

प्रेयसि स्मृति भी वह नहीं रही

भावना रह गयी विरहोज्वल ! वाहर जो कुछ भी हो बदला मन का पट बदल गया भीतर, विकसित होती चेतना, उधर परिणत जग जीवन को सगर *

सम

तमन तुम्ह करता मन ! है जग के जीवन के जीवन, प्रीत्ति-मौद प्रति उर स्पदन में

स्मरण तुम्ह करता मन [ अश्चु सजल भअब मेरा आनन तुहिन तरल वारिज के तलोचन, यह मानस स्थिति, स्मृति से पावल

करता तुम्द समपण ! तुम अन्तर के पथ से आप्नो, चिर श्रद्धा के रथ से आझो, जीवन अ्ररणीदय संग लाग्रो

नव प्रभात, युग नूतन बहे झधिर में स्वगिक पावक, स्वप्न पक्ष लोचन हो झपलक, रंग दे श्री शोभा का जावक

जीवन के पत्र प्रतिक्षण ! ग्राज व्यक्ति के उतरो भीतर, निखिल विश्व में विचरों बाहर, कम वचन मेने जने के उठकर

बनें युक्‍त झ्ाराघन झसफल हो जव श्रान्त मनोबल, आवेशों से अन्तर विह्धल,

उच्तरा। ६१

श्रद्धा पावन हो उठता मन हप प्रथत। चरणों पर! सो जाता ममता वा मभमर खुलता झअतरतम का श्रम्बर, दिव्य टूत - से पस॑ खोल स्मित

स्वप्न उतरत निस्वर ! बग्रवचनीय ग्राकाक्षा के स्वर तमय बरत मुझे तिरतर, ज्योति दावित के नीरव निश्षर

मानत मे पडत कर! जगती मानव म॑ द॑वोत्तर मिदुटदी की प्रतिमाएँ नश्वर युग प्रभाव छवि स्नात मिसरत

भू जनपद पुर प्रातर

स्तवन

तुहिन शिखर पर स्परण रश्मि प्रभ ज्योति मुकुट जाज्वह्य शीक्ष पर, शत्त सूर्योज्विल कुबलय कोमल स्फुरित्‌ किरण मण्दित मुख सुदर! नेयत अकूल क्षमा गरिमामय ज्योति प्रीति के ब्रतेल॑ सरोवर, प्रधर प्रवाला पर चिर गुजित मौन मधूर स्मिति के मुरली स्वर ! सहृदय वक्ष विश्वाल सिचुवत्‌ विश्व भार मत गप्रस॒ धुराधर, करुणा|लम्बित बाहु, बरद कर, मृत्यु कलुप हर चादे धनुप्‌ बार बढत युग - युग चरण, छोड निज श्रक्षयः चिल्ल समय के पथ पर, घिएव हृदय शतदल पर स्थित तुम हुदयशव र, जगदीश परात्पर ! सजन नृत्य. उल्लास निरत नित चिर धिभगमय, रहस रतीदवर, प्रभभय इगितो से जीवन पी शाशत शोभा पडती ऊऋर मार ! जय पुरुषीत्तम, प्रणत प्राण मन नयतो. में भर रूप मनोहर, चिर श्रद्धा विश्वास नवित पा सगलमय, निज जन को दो घबर !

उत्तरा | ६१

मैं मंत्य वेणु का शूय बाँस तुम दिव्य सास, मैं छिद् भरा निस्‍्वर निराश तुम ग्रीति लास

मैं शुष्क, सरस कर दो विकास,

मैं रिक्‍त, पूर्ण कर भर दो

सव श्राश्माइभिलाप,

स्वर समति दी ! जब मुर्दे कुमुद भअन्तर्लोचन, जब जंगे पद्म वन स्वप्त-नयन, तब गीत मुक्त मधुकर - सा मन या “गा जीवन मधु करे चयन, घचिर परिणति दो! मुझे प्रणति दो।

भ्राद्दान

तुम भ्ाश्नो हे, मैं घर घ्यान बत्त निरभिमान तुम बसों प्राण में, गाऊं में ! तुम झाप्मो हे अव्णोदय-से हृदय शिखर पर उततरो नव स्वप्नो के जलघर, वरसाप्रों चेतना मौन स्वर जीवन पुलिन डुबाऊ मैं तुम झाआझो हे! स्वण प्रवित अब जीवन का तम, चमक रहा मन का घन थम - थम, समिटता जाता धरा स्वग भ्रम यह छवि कहा छिपाऊे मैं ! तुम भ्राप्नो है ' रुधिर मदिर हो कपता थर - थर स्मृति किस सुख मे जाती मर मर ! अमर स्पश् पा कहता अन्दर फिर ज्वाला में 'हाऊं में ! तुम आ्लाश्री हे

आमा स्पर्श

तुम जीवन के सपने मन को लगते आज घिदवमय, अपने !

उत्तरा | ६५

[रे शोभा से 5 श्र अपने नम पर्मि लेखा ने स्वप्न बत्प कतार

लगने गय उतर सके |(२। वुम्हासा पाया

मोह सा

घगा हैप थे हक परिणत्ति

छुम बसे

बाहर भीतर ऊपर नीचे पान तुम्हीं अभिनय मे |

जीवन प्रभात पद रेणु. कणो से घरा ग्रयी' भर,

स्वण मरद रहा 'कर - भर जीवन प्रभात नव आया | डूवा शोभा में हृदय शिखर, ग्रव ज्योति तरग्रित जीवन सर, नव स्वप्न दंधिर से सिहर सिहर प्राणों का साथर लहराया बह स्वग श्वास सा पवन सासो मं, पुलकित करता मन, जड घरा हो गयी मव चेतन फूलों में रज तम मुसकाया घुल गया कामना का हो मुख हिम कण-सा अश्नु-द्रवित श्रव दुख, तुम खड़े श्राज मन के सम्मुख आखो में ऐसा मंद छाया ! छम्त छम छम नाच रही आशा, डिमडिमडिम जगती झ्रभिलाया, मन सृजन गीत से नत्य चपल खिसकी भू के मन की छाया |

विजय

मैं चिर श्रद्धा लेकर आयी

वह साध बनी प्रिय परिचय में

मैं भक्ति हृदय मे धर लायी,

बह प्रीति वती उर परिणय ! जियाया से थां श्लाकुल मन वह मिटी, हुई कब तमय मैं, विश्वांस माँगती थी प्रतिक्षण आवार पा गयी निश्चय में !

प्राणी की तपष्णा हुई लीन

स्वृप्ना के भोपन सचय मं,

सशय भग मोह विपांद हीन

उतरी करुणा में निभय में ' लज्जा जाने कव वनी मान, झंधिकार मिला कब झनुनय भ,

बरसायेंगे ही करुणा कण कंध्णा घन,

भू पर श्रद्धा विश्वास सुरो कटे भूषण, मेँ कृतज्ञता मे स्नान कर सक प्रतिक्षण !

व्याकुल रहता मेरा कवि उर का यौवन तुम सभा सको मुझमें उर की प्रिय उर बन,

वह व्या श्रद्धा विश्वास जो जीवन ? में नव जीवन मे स्नान कर सक्‌ प्रतिक्षण |

प्रीति समर्पण

ऊपा राज लजागी ! झोसोे के रेशमी जलद से प्रधघधध रेख मुसकायी !

कलियो के वक्षा म॑ कोमल डुवा रहा मुफ्त मारुत विह्ध॒ल, प्राणां भ॑ सहसा उमादन सौरभ रहस समायी |

तुहिन श्रश्नु स्मित अ्पलक लीचन

क्ते नीरबव प्रणय मिवेदन,

मधुकर ने गुजित पा में स्वणिम रज लिपटठायी !

कपता छायातप का भूतल, कृपता द्रवित हृदय सरिता जल, सरसी के शभ्रन्तरर मे कॉपती ज्वाला - सी बहरायी !

यह स्वप्नां वी बेला मोहन

देती मोपत मौन निमनरण,

निभूत विरह वी - सी पविष्ता नव विभात मे छायगी।

यह कामना रहित रहस्प-क्षण,

केवल निएछल प्रात्म समपण,

तुम्हें हृदय माीदर मे पावर

प्रिय, केवल तुम्ही हुए झओभल, भ्रह, हुमा विश्व व्यथित पल-भर !

सूनी लगती यदि भूक नाल

हसती वंसी ही मुखर डाल,

दिखते वैसे ही दिशा काल, न्रम होता, तुम थे मत्य, अमर ? तुम भाये गये, जगत का छल्त, तुम हो, तुम होगे, सत्य झटल, रीता हो भरे धरा शभ्रचल

तुम परे भ्रचिर चिर से,--सुदर

मुक्त क्षरा

हरसिंगार की बेला हेंसती तुम पर कर श्ुगार मिछावर

कप - कप उठता फूलों का तन, उड - उड बहता सौरभ का मन, शोभा से भर, प्रपलक लोचन

पृथ में बिछ जाने को तत्पर !

एक साथ लद पुतको से बन,

भर जाता सुख स्वप्नी से घन,

करता तुमसे प्रणय निवेदन, कौन समीर कंपाती झन्तर |

एक रात, ज्योत्स्ता में मोपन

श्रन्तर शोभा में खिल मोहत,

तारो से कर नीरबव भाषण हँसता वह यौवन इंताथ कर

आ्राता प्रात मधुर मुक्ति क्षण,

जग को कर उर सौरभ वितरण,

हँस हँस वन थ्री श्रात्म समपण करती प्रिय चरणों पर भर भर |

वन-भो

ममर करते तरुदल ममर,

कल कल भरते मिमल निभर!

कुह - कु उठती कोयल ध्वनि, गुजन रह रह भरते मधुकर |

निभत प्रकृति का यहू छाया वन,

फूलो की शय्या रच मोहन

जीवन सोथा जहा चिरन्तन, स्वप्न गीत गाते सचराचर

उत्तरा /

फिर वसत की शभ्ात्मा श्रायी, देव, हुआ फिर नवल युगांगम, स्वग घरा का सफल समागम !

रग सगल

आज रंगो फिर जन-जन का मन ! मनवल होलिके, नव शोभा से रंगी पुन भारत का यौवन ! नव पल्‍लव से रंगों दिगचल, रेंग ज्वाला से फूलों के पल, रंग भरे लोचन प्रानन से रंगी सकल गह के वातायन गूजे रंग घ्वनित भू गायन, उमड़े रंग रंग के सौरभ घन, नव स्वप्नो की रंग वृष्टि से रंग. जाये धरणी का जीवन! रंगो प्रीति से घृणा द्वेप रण, नव प्रतीति से कदुता के क्षण, जीवन सुदरता के रंग से श्वरी पकिल हो भू का प्रागण !

उत्तरा /'

रजत शिखर

दिनकर को

रजत शिखर

स्त्री पुरुष स्वर युवक सा वक युवती मनोविश्लेपक राजनीतिज्ञ विस्थापित

(प्राणो मादन बाद्य सगीत ) पुसुष स्वर

वन ममर की हरी - भरी घादी यह सुदर, कल-कल बहती जहाँ मुखर प्राणो वी सरिता झावेशों के फेनिल मानस पुलिन डुवांकर ! यहा प्रसारा म॑ हँसता जीवन स्वर्णातप शोभा के ताने -बाने में सतरंग भ्ुम्फित, मगजल - सी शत छाया-इच्छाएं लहराती निस्‍्वर मूपुर बजा वीथियो मे ममता की |

यहा बनले फूलों की मासल सुगाव परी मार्त उम्द लोटा करता हरीतिमा के घने उभारो में, गतों में, ड्ॉद्रयथ मादन ! मुग्ध स्वण प्रभ भूग गूजत वीरुघध जग की कुसुम योनियाँ चुम गघ रज, गभ दान दे ! यहा तितलिया रग अंग भगिमा दिखाती वंस - ग्रप्सरियो-्सी फिरती शोभा इंगित कर, मौन ज्योतिरिंगण निशीथ के आझाधकार मे चमक मपक उठते प्रकाश के सकेतो-से !

स्त्री स्वर

नाम - हीतई आजश्ञाउकाक्षाएँ यहाँ अताद्वित इंद्रजाल वबुनती अपलक स्वप्नो वे मोह भधमिट लालसा तप्णाग्रा की चर गेंपुलियाँ रेंगा करती गरल मदिर क्षण फा पीताय ! यहा प्रीति ज्वाला सुदरता हरा चित लिपटी रहती सघन मोहुत/म मं (जा

रहस प्र भें भव जावन भोर सुनहले रहस पका भें श्रान्ति में ' मन के मुग्घ चरण मेँप जाते ध्रलस

एव शिलूर

स्फुरित शीप चेतनोमि, जयति, शक्ति पुरुष स्ववश् ! (तानपूरे के स्वर) पुदक

वरस रहा आात्मस्य स्वरा का निस्‍स्वर निभर प्रधिमानस के नभ से, सुधा स्नवित कर अ्रन्त र,-- कितु हाय, मैं सौरभ मृग - सा गध भअ्रध हो भटक रहा ब्राणा वी इस मोहित घादी जिसकी छलना के दि मायावी प्रसार मे सो सो जाती मन वी गति, चल झद्रय सुपर के पख्ता में छटपटा, श्रान्त श्लथ हो अरतृप्ति से !

हेस हंस यौवन की सतरंग आाश्ाउकाक्षाएँ इद्रधनुप दीपित वाष्पो की भाव भूमि में विवश मोह लेती मानस को, मिज रोमाचित रग पाश्य में बाँध, लिपट कटक्ति लता सी चारा और विछे हैं मोह जाल पभ्रमीचर प्रवेशों वी रलच्छायाप्रो के ग्रुम्फिति, फोमल मुसर स्वरा से ममाहत करती उर, फूल मौन छव्रि से मोहित कर लेत पभ्रातर, रूप हीन सौरभ अदश्य मुदु रजत सून से खींच चेतना को कर देती व्याप्त बहिमुख | --

हास पग्रश्नु की घाटी यह हँसमुस फूला की पलका से भरते रहते मोती के आसू धरती वा चातक प्रेमी प्राकाश कुसुम का, प्रध चकोर झ्रेगारे चुग निज तृपा ध्ुभाता, गध भमधुप गाता काटा में फूल के लिए

(मनोमोहक वा समीत)

च्छायों की मम गुजरित इस द्वोणी मे जय प्रवृत्ति पथ, रलखचित आकाश सेतु - सा, अपनी शत रगा की छागाएँ बखेरवर ग्रपलक ब्र देता लोचन भुग्धा चपलाएँ स्मित कटाक्ष से पुलकित कर देती तन, चंचल उवालामो के स्प्शों से प्राणो वी उकसा

शरद चादनी दुग्ध फेन -सा कम्पित उर ले स्वप्ना की गुलित चापो से निशा कक्ष को मुखरित कर देती सहसा जब नव बसत श्री फलो के मृदु अवयव झणोभा में लपेटकर गगडाई भरती, वन सौरभ की साँसों से समुच्छवसित कर हृदय और उमद स्वप्ना को मीहकता से भरी नवल यौवन की अगणित

रजत शिखर | परे

युदती

भावी की लेखा-सी !

युवक कितनी बार शरद के रेखा शशि की मैंने एक भौर मु की रेसाग्रा से तुलना कर उसे सदोप बताया है, तुमको कूँई के प्रपलक नयना का विस्मय प्रपित कर सादर! प्रौर तुम्हारी वेणी फे चिर कोमल तम में गूथ कभी जब मधु के मुझुला की सद्य समिति में मन ही मन तुम्ह हृदय स्वप्ना के मुकुलित प्रीति पाश् मे वर सेता था, तब प्रतन मन, तुम॑ प्रनिमेप दुगो से मेरी भोर देखकर मद हास्म से तिज गोपन स्वीकृति देती थी ! -- कह दो दब क्या वह केवल सात्वना मात्र थी, या कोमल उर का सुमधुर उपचार मान था ?

युवती जो भी समको वह केवल क्शोर प्रणय था | प्रभी नहीं छूटी क्‍या मुग्ध तुम्हारे मन से मेह्दी थी लाली -सी वह कैशोर भावना जिसने निज यौवन उमुस्त प्रछछन राग से था भ्रजान रेंग दिया कपोलो की ब्रीडा को ? उस अवोधता को प्रमाण मानोगे क्या तुम ? स्पण नहीं कर सकी तुम्हारे भावुक उर को हाय, वास्तविकता जीवन की नित्य बदलती

युवक

स्पश नहीं कर सका तुम्हारे चचल मन को

हाय, हृदय का सत्य, कभी जो नहीं बदलता !।

युवती

झ्राज प्रेम विषयक इन मध्य युगी, शुक जल्पित उदमभारा की कौति तुम्हारे भुख सं सुनकर मेरा मन अ्वसनन्‍्न, हृदय उद्विग्न हो उठा युवक तब क्यो तुम मुकको फिर से विस्मत वसन्‍्त की याद दिलाने आयी, ऋतु ख्गार सजा नव ? वह क्या केवल ऋर व्यग्य, उपहास मात्र था ? या नारी उर की स्वाभाविक निदयता थी? जिस निगूढ निममता की पापाण शिला से मायावी विधि न॑ निर्मित की नारी प्रतिमा उसमे मगजल द्ोभा, छाया कोमलता भर?

रजत शिखर / ८७

है खीच लाया पहिले ही मन का आग्रह युवती पुनती दीप तले रह भ्रेधियात्ा पेह तक मि ला तुमने अपने वाल्य सखा को श्र धकार मे रखा, काश उनको वचित ”“क्या यह परचय नही है? सुखब्रत

तत्व भध्य भावना पर मारते निष्फल मेरे कात्य सेखा भी पक्ष है सम्भव है, प्रेमी इनकी उत्तेजन - (| शिराएँ पा ज्वार आर पर: उतराती रहती शरीर जगत के ये अनासकक्‍्त है भौर, अपरिक्षित भी शायद ++- युवती क्या रिड्म्ब्ना है में इन पर वचपन हे ही ममता रखती &, नर ये मुझको पेही' सम चुल्रब्नत

मुझे चात्त है, अ्णय दा तुम हे नही सकी, क्त्पप्रित द्दय प्मपथ्‌ फेरना] पुमको इच्ट नहीं था... रैसम इनबप दोप गही है अवचेतन कहे

रजत शिवर / ८९

अपन कर, उच्छव प्रागों के प्रवाह को आवतों से गण्ड शून्य...

युवतों

इसमे क्या सश्यय !

से डे द्वार, कुष्छित आक्ष नीचे निस्तल हे उठते जात दुग्ध मलिन उच्छवास विपंले, जिनसे रहता स्िघु- जुब्ध मानव का ऋतर !

हैमे मुक्त करनी है पहिले काम चेतना

उग युग की क्मि जटिल ग्रीयियों से जो पी ड्त्ति,

रागद्वप, उत्ता, कलक के टेपण दृष्टि से

उस बचाना है, गत नतिक कोण बदलकर ! युवती

घोर क्रान्ति मच रही आज मानव के भीत्तर !

६5 चेतना का ख् कर देगा जो। और युगा हे समन तयत पत्मायव उड जायेंगे बाण के फेमेप प्रवग मे! अवचेतन अतल से उठ जीवन का

रंग ज्वार मज्जित कर देगा अने भू के तट ! शत सहस्त फ्म जाल पुत्र निद्वित निरचेतन मनोराय को वशी के सकेता पर पांच उठगा-...कर विराम के प्रति विरक्त मन उह भावात्मक देन भनोषी है इस युग की, मसनेस विश्लेपण विज्ञान जिस द्त

बहुत सुन पका भ्रथ८ प्राण से दशा तुम्हारा, निश्चय ही प्रव नरक दार बुतनवाला है निश्चेतन

उदार, विद्वर्द पकाय मानव पीमाओं करे स्वीशत कर भैषय के ड्र्त इविकाश्र] की, पट रकौयाप्रा की पछष्ठ भत्रि हु बदल, पेल्कार भरोषि में, वीक हपित

आाण। के रेय स्करणा को मधुर स्थान दे

निम्न आपचेतना एक दिन ऊेध्व गम्रक कर रग्ात्मक प्त्व्य रचेग्री सकल आस स्मित, #व उपेक्षित रही रुक तिक्त गे

गव गाते पट, क्िभा रश्मि प्त स्मित

विषरेगे / कैपाथ कर भू पथ ! चुतब्रत

पयवाद ण्य कैल्पनाएँ हैं. केक्‍ल युवती

हाय कुषय * से ग्रश्व भी छत) युवक

परणाथी, पेव जीवन के. धरणायी हैँ उफ, जिन काल 2 के अंधियाल से हम किसी तरह बाहर निकले वे अकथनीय हैँ भर काट, हल निदयता केटु नद्यचता, पंशाचिक >द्गाम कामना का सर पाण्डक पारकीय प्रतिहिसा, घोर घणा के। उत्सव परत वासना पैत्प, प्रेत ज्पो वेतन हा भर, वाहर पकल निकल ग्राय॑ हू घजा की रज योनि कर, बलात्कार कर पतात्कार, व्प्निचार, रत के मुख का कदु सुख!

शुछ स्वरः उफ, कोमल क्द्ली स्तेम्भा | स्व्ण के दुको तूटा, ऊैलो की कम्पित

/ को धर निदयता से तोड़ गरांञ पायलपन था पायल्यन पिर पर सकार तब कहा मर गयी थी तेज्जा पेज्जा #? मग्रता ? ही उड़ गय थे श्राक्ो पे फूला के रंग ? विद्वरः थी उर कौ भरी पबडिया, ग्रतर के थीः पापाण' बन गयी | गील द्या भधुरता, श्री श्स्ता

ने पर दल 4 ग्रिरत सही: के! रही दस का की छा के

ट्पकः रहे हर है जी की जा पीनता रुपिर 3 चौक रही हैं, भा बे का का ; शा है उस की कर. पे कान या सड ने फल हि

युवक यही भ्रम है, में कैतन्न हू

सुत्रश्नत हर अवचना है, प्रवचना जैब भनोहर लेना निकली है मायामाय, अनचेतन की महक तष्णा युवती जे स्‍्वय अपने मन को उत्नता रहता है, ही गया मेरा प्न अरब उस छलना के पुसतव्रत मुक्ति नही >त्मि पलायन, “बुर मृत्यु है ! जाता हूं में, घोर पलायन हे असाद के वात अन्र को पद्य मुक्त करने का व्रत ले (पस्थान) युवक आज भयी मानवता चि गा प््न पर क्षासे का हृदय बंध नेक कमर हित मिलन शान्ति स्मित, विरह धरकावर, पति समर्पित कया जप सद्भाव से

फूलो के देश

स्‍्जो पुरप स्वर कलाकार वबनानिक विद्रोही जन

(नव वसात सूचक वाद्य सगीत ) पुरप स्वर

यहू फूलो का दंश, ज्योति मानस का रूपक जहाँ विचरते श्रतद्रष्टा कलाकार, कवि निभत कल्पना पथ से निते, भावोमेषित हो! यहा प्रेरणाश्रो की स्मित अ्रप्सरिया उडकर बरसाती झाभा पसडिया शत रंगो की, स्वप्नो से गुजरित यहा स्वणिम भगा की रजत घण्टिया बज उठती हर्पातिरेक से-- देवो का सगीत अमर वाहित कर भू पर | यहा कापती छायाएँ शोभा वसनो सी, गोपन समर ध्वनि भरती मानस श्रवरणों में,-- भावी की अ्रश्ुत चापा सी झाकृति घस्ती !

स्त्री स्वर

यहा प्राण पुलिनो को भावों से स्पीदित कर जीवन की श्राकाक्षा बहती कल कल घ्वनि में, प्रीतिश्वास सी समुच्छवर्सित रहती मलयानिल नाम हीन सोरभ से आऊुल कर झतर को यह मोहित अभिसार भूमि है गषर्षों की, जहाँ दूर वास्तविक जगत के कोलाहल से स्वणिम द्वाभा में रचती है सजन कल्पना सूक्ष्म विश्व मानव भावी का सतरंग कल्पित ! यहा गूजता रहता है सगीव अहनिशि, भाव प्रवण मानस द्वव्या से प्रवहमान हो!

(वाद्य संगीत समवेत गान) यह फूलो का देहा ! यहाँ निरन्तर जीवन शोमा

सजती नव-्नव ददश्च

यहाँ लोटत इद्बचाप छत

रजत खिखर / १०७

बडी - बडी चट्टान यहाँ घरती की प्रादिम चुप्पी-ली दम साथे नीरव चिन्ता करती

प्रधरात्रि भिल्‍ली तश कोटर मे कने - भन स्वर धर, सूनापन विदीण करती वतन भू का, घोर गुहय प्रावाक्षा-सं। जय निश्चेतन की ! यहाँ भयानकता सुदरता प्रीति पाश मे बेंधकर करती क्षण उपहांस निमति का निमम |

(गम्भीर प्र तन्‍न याद्य संगीत) फयि

शान्त, सौम्य, सोयी वन श्री झ्रव जाग रही हें नव प्रभात के स्पर्शों स्वणिम चेतन हो, बरम रहा नीड़ा पलरव सप्टि गान-सा, सिहर रहे पत्ते यर-यर, सुस्त विभोर हो गधपवन म॑ घरती नीनी साँप ले रही, जाग रही वन छायाएँ श्रेंगडाई भरती! तरुण मधुप, पटपद से हटा पंसखुरिया के पट पपस्मित कलियो के मदु मुत्त चुम्बन करत ?

यह प्रभात भी ससूृति का झाइचय है महत, मोन्र प्राथना सा, पवित्र झाशीर्वादसा ! विस्मित बर देता जो मू मानस पलकों को दिव्य स्वप्न-सा, प्रमर स्थग देश सा उतर | धरती का जीवन सहसा निज ज्योति वेद्ध से पुत्र युक्त होकर, हो उठता पूण काम है!

यह फूला का देश शझ्राज फिर घय हो उठा, वाहित करता जो धरती वी झ्लोर निरन्तर देवा का ऐशय गअतुल,--शोभा सुदरता, ज्योति प्रीति श्रानद अलोकिक स्वग लोक का |

जाग रही हू सुप्त प्रेरणाएँ मानस मे,

यह गन्तनम का प्रभात है जन मगलकर

तझू पन्ना के अन्तराल से छत नव किरणों

लोट रही भू रज पर ज्योति प्ररोहा सी हँस ! (हंप वाद्य सगीत)

युग प्रभात यह एक वत्त हो रहा समापन धरा चेतना में सस्क्ृति का आज पुरातन नव युग की प्राणो की झ्ाशा अभिलापाएँ मम मधुर संगीत लहरियो भे झुखरित ही गूज रही हैं, छाया वन के नत्र भुकुलो को घर चतु्दिक ! सद्य स्फूट कुसुमी के मुख पर विहेंस रहे हैं स्वणिम झोसो के मुकता कण,

रजत शिखर / १०६

पा

ताराग्रो के छायातप से रंग- रंगकर मैं जन - भू का उपचेनन, रज को परखडियो को अन्त सुरभित कर जाऊंगा, नादन बन के फलो की शाइवत स्मिति भर मण्मय झ्धरा मे

मैं नव मानवता की प्रतिमा यहाँ गढ़ रहा अ्रतमन के सूक्ष्म द्रव्य से !

जनगण

हह फवि में विराट जीवन का प्रतिनिधि हूँ ! मैं चन के ममर से, युग के जनरव से चिर परिचित्त हूँ ! भोंरा का मधु गुजत़, कोयल का कल कूजन मेरे ही स्वर है! स्वणातप मेरी स्मिति हें ! मेरे उर के स्वप्न तितलियो की फुहार-्से रंग-रंग की शोभा बखेरते जन मानस में ऊपा, ज्योत्स्ना, ओस और तारे मेरा ही चिर सदेश वहन करते ! पवत निभनझसे मेरे गायन फूट, दग्घ युग मन के मर में प्राणो का कलरव, जीवन हरियाली भरते ' धरा सस्‍्वग को स्वप्न सेतु में वाँध सुनहते मैं सोपान बना जाऊँगा सुर नर मोहन! प्रथम स्वर खूब अहता का ऐश्वय मिला है तुमको ! द्वितोष स्वर झात्म वचना का उम्ाद पियें हो मादक प्रथम स्वर

कलाकार हो, तभी हवा में महल बनाते ! रिक्त स्वग रहते ग्रात्म पत्रायन के हो!

फवि

तुम जो भस्त्रा - शस्त्रा से सज्जित सेना ले, विजय ध्वजा ऊँची कर, चलते सख्यात्रा म, तुम भी मेरा काय कर रहे ! घरा घूलि भे जो जीवन तुप्णा भुजगं, सी शत फन फला लोट रही हैं नीचे, मैं ऊपर से उमदकी शोभा रेखाएँ प्रवित करता तटस्थ हो, व्यापक युग पट मे संवारकर उसकी घातव विप की फुकारा वो पीकर मर्माहत्त हो हृदय दाह में जलता प्रतिपल, में उस स्‍। बरसाता चेतना प्ममुत निज, तिकत धृणा

रजत चिएर | १११

स्त्री स्वर देसो, तुम दसो इन हुडुडी के ढाचा को-- एक स्वर वजत्ध॒ बन चुके हैँ दधीचियों के ये पजर स्त्री स्थर दसा, नग्न क्षधित मनुप्यता की छलना को, रत क्षीण, निष्दुर विषण्णता को जीवन की ! | बतमान का भीषण उत्वीडन है इनको निममता कुचल रह | यदि एक वार तुम प्रांत खोलकर इहू दस लोगे जो सचमुच, करुणा विमलित उर हो, मर्माहंत ही तुम सहम उठोगे, हू फूलों के जग के बारी एक स्वर

मर फोध से पायल हो जाग्रोगे शायद आदर्शों के मूर्ति - पूजा के इन कुत्सित दुष्पर्मो यो दख, घणा से आस फेरकर | मृत प्रतिमाप्नरों के पुजक जीवित जनता के पुजक कभी नही हो सकते,--जीव मृत जो | कवि देख रहा हूँ, में लज्जा से गडा जा रहा क्व स॑ मेरे मन की अझ्रसतो के सम्मुख उठ नाच रही हैं छायाएँ सकाति काल की भुवो के ककाल खडे चीत्कार कर रहे, ग्रवचेतन के प्रेत भर रहे अट्टहास हैं * कर, छासयुग के लोभी श्रसुरा से पीडित मानदता कातर वन रीदन छोड, एक हो, आज क्ुद्ध ललकार रही, हुकार भर रही ! (तुमुल वाद्य समीत समवेत गान)

भूत के ककाल हैं हम, क्रद्ध रुद्ध कराल है हम कण्ठ लिपटे तनिशुली के ममकरः व्याल है हम ' मसुजता के प्रेत है हम ग्राज सब समवेत है हम, वीज है हम, खेत हैं हम, शत्ति ग्रमिट विशाल है हम |

खद्भ है हम, ढाल हैं हम, ज्वार से उत्ताल' हैं हम,

रजत शिखर / ११३

मानव की निदयता उनके भीतर घुसकर बोल रही तोपा के मुख से विकठ नाद कर ! | भले बुरे, काले सफेद झ्रो सत्य भूठ के सभी मान इस सतत बढ़ रही अ्रधियाली के अलय ज्वार में डूब रहे है क्रिमाकार हो ! (विप्लवसूचक वाद्य संगीत) एकाकार हुए जाते है पाप पुण्य सव,-- मानव के अ्रन्तरध्यापी धन श्रावकार से घृणा द्वेप, बाण क्‍पट, छल स्पर्धा हिंसा प्राज पुकार रहे चिल्लाकर--वाह्य संगठन मान सत्य है! बाह्य सगठन चरम लक्ष्य है | वाह्म आसुरी एका हीं सब कुछ है जम मे, झ्तजगत, हृदय का एका,--क्बल भ्रम हैँ! अतम्‌ूस सगठन पलायन, बहलावा है ' संस्कृति ? वर्गों के हित माधन की दासी है! युग झपनी मुठठी में श्रणु सहार लिय है |

विज्ञापन बरता विनायत भीयण डशझब्दां मे हिंल हित उठते झ्ाज चेतना भुवन मनुज की भावों को आशका से ! श्रह आज भनुज का आत्म प्रतारक देप वन गया विद्व विनाशक | फुछ स्वर कायर हो तुम कायर जो उपदंश दे रहे नंगे - भूख लोगो को अ्रध्यत्मवाद का ! कलाकार तुम नही, तुम्हार दुबल उर मे बच्चन घोष विद्रोह नहीं युग की प्रतिभा का

खोल उठता रक्‍त तुम्हारा घृणा जोध से दोपित पीडित मानवत्ता को नग्त व्यथा पर ! दया द्रवित भी नही दिसायी देते हो तुम !। जग जीवन परे बिरत, निरत फूलो क॑ वन मं, स्वप्न लोग रहते हो तुम आत्मतोप क॑ !

साथ नहीं दोगे तुम जन का युग सकट में रिवत कला, सुदरता के थोथ आराधक १! धिक तुमको ! यह व्यक्ति झरह जन पथ कण्टक है। कंधि किन्तु हाय, यह साध ग्रह दुगम पवत है! भीतर भी हं जनगण, भीतर ही जन का मन, भीतर भी है सूक्ष्म परिस्थितियाँ जीवन की, भीतर ही रे मानव भीतर ही सच्चा जग्र जाति वय श्रेणी म॑ नहीं विभाजित है जो,

रज़्त शिघ्र / ११५

कवि झौर साथ ही अभ्रगर ऊध्व चेता बन जाता समदिक मानव, भ्रतिकम कर मन की सीमाएऐं, मिट जाते खण्डित भू जीवन के विरोध सब, भौतिक नतिक मान नियोजित होते युमपत्‌ मानवीय सन्तुलत ग्रहण कर लेता जन युग, यन्‍ना की जलती सासें ठण्ढी पड जाती ! मनुज चेतना के पारसमणि स्निग्ध स्पश से लोहे की निममता स्वण द्रवित हो उठती।

नेयी चेतना के प्रकाद में केर्द्रित मानव पुन सत्य का मुख विलोकता नये रूप से, नयी दृष्टि मिल जाती उसको जीवन के प्रति, मिट जाती सब विमत्त युगो की घणित क्षुद्रता बाह्य रुद्ध बोनेषन से निज ऊपर उठकर उध्व मुक्त, ग्रन्तशर्चतन बन जाता जन मन, श्रत स्थित, अन्त स्मित हो, अत कृताथ हो '

वेज्ञानिक यही सोचता हूँ मैं भी अब! आज मु है

महंत प्रेरणा मिली मनुज अन्तर्जीवी है। स्पष्ट देखता हूं में अतर का विधान ही मानव हैं ! अन्त सयोजित, ऊष्व समावित झाज मनुज मर गया | पराजित हो भीतर से दोड रहा है वह बाहर, व्यक्तित्व हीनहो | व्यक्तिहीन सामाजिकता निर्जीव ढेर है! ढेर हो मया मानव का मन, यात्रिकता से चूण हो गया मनुज हृदय ! वह श्रव समूह है यत्रो से चालित इच्छाप्रो का समूह हैं, घणा, द्वेप, स्पधा तष्णाओ का समूह है! नाटकीय कटुता निममता का समूह हैं, झवचेतन की भ्रध वासना का समूह है।!। महत व्यक्ति चाहिए झ्लाज सामूहिक युग में,-- दुनिवार कामना कितु है मुक्त हो उठी, रोद रही जो मानव के भिश्याभिमान को भ्राज निखिल विज्ञान अआर्वित मानव हाथो मं विश्व प्रलय कारिणी बन गयी लोक विनाशक कापालिक बन भया मनुज है, जीवन बलि प्रिय, मानव चाव का पूजक, साधक भू इमशान का | ! कवि

यद्यपि भव भी लसरो की स्पहली दिक वजती छम खेता म॑ हसमुस हरियाली

रजत जिखर / ११६

जब णीवन विश्व सचाति बने ध्यय, लोक ऐक्य ही. ५, ' कक ग्राम जात विश्व गयन, गा रत सि धु गहन यात नगर पवत बन, * ही बाकि धाम

जित मिश्र / १२१

उत्तर शत्ती

विगत विश्ेदा, पृणित निवेधा पे विभुवत मने,-.... पीच परा के पा ते नव युग का यौवन निर्मित करती पहे नव भू जीवन, जग सस्क्षति, प्रभिनय गायाभाक्षाओं, ध्येय! के भ्रेरित्त श्य रक्त मे

उस पाठना है इस युग को प्रात्म त्याय से सहिष्णुता, शिक्षा समत्त से,--और नही तो, सत्याग्रह से, शत शत निमय बलिदानों से ! जिससे भू का रक्त क्षीण शोपित वियण्ण मुख फिर प्र सन्‍न, जीवन मासल हो, युग शोभन हो !

उत्तर शत्ती अ्रवश्य यनन्‍्म युग के विप्लतक मं सामजस्म नम्रा लायेगी जन - मन वांछित, जिसस शिक्षा, सस्कृति, सामूहिक विकास का पथ प्रशस्त ही जायगा युग मानव के हित (घण्टी ग्रौर वाद्यों की करुण ध्वनि) स्त्री स्वर पझधञती भ्रव बीत रही है, धनन्‌ पनन्‌ धन, घह़ियातों का ऋदन उसको विदा दे रहा ! अ्रधरात्रि की नीरवता को चीर भनत झन निल्‍ली का कातर स्वन उससे बिदा ले रहा ! धत शत झाहत इच्छाएँ, असफल तृप्णाएँ उप्के चिर कुण्टित भ्रन्तर म॑ मौन सो रही, शत मुकुलित आगाएँ, अभिनव अभिलापाएँ भादी के स्वष्तित पत्को मे जम से रही (मर्द्र वाद्य ध्वनि) स्‍त्री पृष्ष स्वर विदा, बिदा, है पृूवशर्ती, गत समरा की स्मति मिटे तुम्दारे संग मन से, नीषण छाथाहइृति ! मुक्त पहले पक्ष खोल, बरसात स्वणिम समिति बिचर भू पर थान्ति, धरान्तिप्रिय हो जन ससृति ! (दुत वाद्य ध्वनि) लोक क्रात्ति की अ्रग्रदृतिके, तुम ऋमषा पर चढ़कर थायी, मा थत करने जीवन गागर ! पृमिकम्प - सी, ध्यक्त भश्रश, गजन-तजन भर घूलिसात्‌ कर गयी घुगो के सौध स्मृति शिखर ! स्वस्ति, स्वस्ति ! अब नव निर्माण करें भू के जन ले जाभ्रो अपने सेंगर जग का दारुण रोदन ? (गरभीर वाद्य ध्वनि ) पुस्ष स्वर इन प्रवास वर्षीं के निधिड कुहासे से कढ़ सन्‌ इक्यावन मौन बढ रहा घीर सामुल्थ | मधपकक्‍्द बेशी के उसके श्रौद भाल पर चिन्तन की रेखा है भ्क्तित, नवल क्षितिज-्सी रजत घण्टियों की कल ध्वनि स्वॉणिम भाशा के पा में उड़ अभिनादन करती है उसका !

रजत शिखर / १२६

मिटा युगो का देय नास त्म कटा निखिल मन का मोहक भ्रम जग जीवन गौरव जन का श्रम नव॑ प्रकाश दिखलाये !

ग्राज बरा श्रम सकल एक हो मात्र दासता के थब धन खो, झग्नि बीज नव जीवन के दो स्वण दास्य बन उठाये, लहुरायें

( तानपूरे के स्वर ) स्त्री स्वर

भौगोलिक ही नही सास्द्तिक धम बघु भी भारत का जो रहा पुरातन, अक्षय कझुणा ममता के स्वणिम सूतो मे बँधा चिरतन भारत के झ्रत॒ प्रकाश से ज्योतिमज्जित जिसके शिखर गहन पथ विपणि हुए चिर पाचन, भहजोदि की प्रीति द्रवित संस्कृत वाणी से जिसवे पुर गुंह द्वार रहे नित श्र तमुखरित, ऐस निज गझात्मीय सखा का पुन हृदय से श्रभिवादन करत भारत जन, उससे नृतन युग मत्री, सदभाव, सा स्थापित करने को समुल्लसित मन,---सुद्ृद्‌ अम्युदय के गौरव से उनते मस्तक | ---

बधन मुक्त, स्वतम,--आ्राज वे लोक जात के लिए स्वत भी जाग्रत्‌, उद्यत ! ग्रोतम से गाधी तक सत्य अदिसा का जो रहे अमर संदेश सुनाते छ्ुधित जगत को, मानव जीवन मन सग्रात्त कान्ति के लिए मौन प्रयासी, विश्व शाति के चिर अभितवापी भारत के सुत, नव्य चेतना से श्रन्त स्मित, नव मानवता के स्वप्नो से क्‍्रपलक लोचन जाग रह, विम्भुत्त युग के' स्वणिम खेण्डहर से, मू जीवन की नवल वत्पना स॑ उमपित स्वगिक पावक को लपटा से, लोक यज्ञ हित

(जागरण वाद्य समीत) पुरुष स्वर

यह सच है जिस झथ भित्ति पर विश्व सम्यता झ्ाज सडी हे, थाधव' हैं वह जन विवास कौ, उसम दीघ पश्रपेष्ठचित है व्यापक परिवतन भू मंगल हि0त | घनिक श्रमिक के बीच भयकर जो झोणित पल पायी है वग भेद को

१२८ | पत प्रयायतती

(घण्टियो की हपध्वनि)

स्त्री-पुरष सदर

स्वागत नूतन वष, शिखर तुम विश शती के, लाझो नूतन हर्ष, नवायतुक जगती के कब से अपलक नयन प्रतीक्षा करते भू जन, विश्व शत में लोक कवि हो परिणत नूतन ! भर जाओ्रो स्व्षिम समत्व जग जीवन रण में, सव जीवन के सजन स्वप्न जनगण के मत से | लहरो के शिवरों भें उठती जीवन आशा, गिरि शुगो पर चढती जन भू की झभिलापा ! खोज रही गत प्रतिध्वनिया नव मन की भाषा, जन मानवता जीवन की नूतन परिभाषा ! आगो, जन सारथि वन, कदम स्तम्भित युग रथ, पथ बाघाएँ लाघ, करो है पूण्ण मनोरथ

(भ्राशाप्रद वाद्य सगीत )

पुरुष स्वर

रवि के चारों ओर घरा के पुण पचदश सक्रमणा के बाद वष नव उदित हो रहा विश्व मच पर, पार कण्टकित कर आधा पथ, पनुभव गहन हृदय मन ले सागर सा मिस्तल नव आशा की किरणां से सह्मित झानन श्री ले, सोच रहा वह उच्च स्वरा मे जल प्रपात सा--

(गरभीर वाद्य ध्वनि)

सन इ्पादत

भाग्यवान्‌ हूँ मैँं। विराट इस विश झाती के चिर महान युग मे जी नूतन जम भ्रहण कर पुन झा सका हूँ झब सन्‌ इकयावन बनकर ! विश्व सम्यता श्राज नवल इतिहास रच रही, जन सस्कृति का आज घवल अध्याय खुल रहा ! कितमे ही परिवतत आये भू जीवन मे, कितने ही सघप और सग्राम छिड चुके, वबर युग से झ्लाज यात्र युग मे मानवता लडती निडती ग्रघकार मे राहु खोजती, सागर - सी गर्जेन -तजन उद्बलन भरती पहुँच रही भव एस व्यापक समम स्थल पर जहाँ उसे निय पिछने जीवन का में थन कर पिछले प्रादर्शां भृल्या बा विश्लेषण कर लोक मम्पता निर्मित बस्‍नी है थ्र्‌ विस्तृत्त, विधिध विगत सस्कृतिया बा कर महत्‌ सम-वय!

१३० | पत प्रधावतो

(प्रगति सूचकवाद्य सगीत)

महाभाग हुँमै! महान्‌ है विश शती यह ! धय घरा जीवी युग के जिनके कधो पर भावी मानवता का स्वाणिम भार धरा है| वृहृद ज्ञान विज्ञान किया सचय इस युग ने, वाष्प तडित, बहु रश्मि शक्ति इसके इमित पर नाच रही है,--भ्राज महत्‌ अणु सिद्धि प्राप्त कर उसने मौलिक भूत शक्ति का स्लोत पा लिया

विजयी हुआ मनुज का मन जड भूत प्रकृति पर, आज अनुचरी बनी स्वामिनी मनुज नियति की !

(विजय सगीत )

भू रचना का स्वणिम युग हो रहा अवतरित पुन॑ विश्व प्रागण में कव से लोक अपेक्षित | झ्ाज मनुज को खण्ड युगो से ऊपर उठकर रूढि रीति गत आदर्शों के ककालो को 'पद लुण्ठित कर, युग वेभव की सुदढ भित्ति पर मनुष्यत्व॒ के व्यापक तत्वों से नव जीवन नव सस्क्ृति निर्मित करनी है भू जन के हित ! युग युग से कलूपित भू का तन भाव स्नात कर वेष्ठित करना है उसको नव श्री शोभा में जीवन के मन के गौरव मे प्रात्म द्रवित कर | नष्य चेतना के आलिगन में बंघ जनगण जिससे फिर संगठित हो सर्क बाहर भीतर

गूज उठे सहार सृजन का गीत मुक्त स्वर---

(समवैत गान)

भरे, भरें जीण ज्ीण विश्व पण चिर धिदीण चिर विवण नव युग के प्रागण मे मरें, मरें

ग्रधधती . रही बीत

भावी में लय अतीत,

देय ताप, रक्‍त पात हरें, हरे

हंसता जीवन वसत

कुसुमित जग के दिगरन्त,

जन हित वैभव अनन्त भरे भरें।

रजत शितर | १३१

जीण शीण विश्व प्ण भरें, मरें !

(मेघ घोष झोर रण वाद्य) सन इफ्पावन

कि तु हाय, क्‍या देख रहा मैं, विश्व क्षित्रिण में उमड़ घुमड घिर रहे चतुर्दिक्‌ मेघ भयानक ! अट्ृहास करती शम्पा, रण भीपण गजने भरते घोणित के घन, दिड़_ मण्डल विदीण कर

आज तीसरे विश्व युद्ध की भय भाशकां गरज रही इन भीम घनो में हृदरथ विदारक ! राष्ट्रो के कदु स्वाथ, सत्व घन बल की तृष्णा समर संगठित पुन हो रही भू भागों में !! ग्रभी अभी फासिस्त शक्ति के युग दानव को लुण्ठित, दप दलित करने जो देश घरा के एकत्रित थे हुए प्रमति का व्यूह़ बनाकर, ग्राज परस्पर के भय दुस्वप्नो से पीडित महा प्रलय के हेतु दीसते रण तत्पर वे !।

प्जीवाद उठा हिंसा का धृम्रवेतु ध्वज लिये लोक सहार घोर अ्रणु मुष्टि म॑ विकट फिर ललकार रहा घरती की हरित शातति को, जत समुद्र के उर की नभ चुम्यी लहरो पर दुरभिर्सा से शास्त्र करते | हाय दुराशा | लोक राष्ट्र भी भूल वहुदु जन साम्य योजना आज नवल साम्राज्यवाद की मद लिप्सा से बना रहे हैं सँय शिविर निज जन तनो को, -- घूम रही है धरा समर के घोर भंवर में दम साधे है खंडा भयकर अणु का दानव भूव्यापी सहार, प्रलथ हुकार छेडने !! वया भारत इस भू विभूषिका से हो जागृत बहिरन्तर संगठित नहीं होगा इस युग में रे आत्म क्षक्ति का, विद्व चेतना का प्रतीक बन, सौम्य, शांत, भू कम्रनिष्ठ, जन मगल कासी, मनुष्यत्व का प्रतिनिधि, दढ, निर्भीक, अहिंसक ' रूदि रीवियो की इस मध्य युगीनग घरा को कौत पुनश्चेतन कर सकता झात्म दान से जनगण के भ्रतिरिक्त, भूमि के अधिकारी जो, गौरव गरिमा के वाहक इस भहादेश के ? नव जन जीवन के मूव्यापी प्राणज्वार में मिश्चय हो सकते मिमसन ये अभ्रथ शक्ति रण बस समयय भें नव, शोणित रहित काम्ति से

१३२ | पत प्रयावलो

प्रादोलित जन युग दपण हैं मानव मन मा, शान्त उस बर सबत वेबल उस युग मर में सत्य प्रहिता के प्रादश, प्रमर, युग पूरव सदायार यी रजत रश्मिया चुभ मण्डित, विनय त्याग नये शोवित, तोत बम प्रनुप्राणित, सूय घुश्न ध्यवितत्व एवं दिन प्रात्म पुरुष या भू मानस मे स्वत प्रतिष्ठित होगा निश्चय! जीवन मन पी क्षुधा तृपाप्ता वी चीतारें, प्रथ ग॒क्‍्तियां, ससपृत्ति धर्मों थों सघपण विश्व एक्य मे, लोक! साम्य मे बंध जायेंगे युग मानव मे संयोजित, व्यवितित्ववान्‌ हो!

धरती का विस्तार हुप्रा ही इम प्रयवार है कर सकते सहार नहीं भूं जीवन वा जन

प्रेम मनुज को करना होगा ध्रातृ मनुज स, देशा यो दशा से, तत्रा को तत्री स, ईंइवर वा झ्रावास जगत मादिर है जन तन, रूपान्तर होगा ही अ्रधोमुखी वृष्णा का प्रमुत चेतना मे, प्रन्तमुख्ल ऊध्व ग्रमन प्रिय |

गूज रहे हैं अभी दशा, पुर पथ, गिरि सागर उस युग मानव को महिमा के जय निताद स, गूज रही प्रतिध्वनियाँ कभी मिटनवाली !

(वाद्य समीत जन मौत)

जय विराट युग मानव जय, जय ! सस्‍्वगदूत तुम उतरे भू पर

ग्रात्म तंज म॑ विचरे निभय ! सात्विता के रजत शुक्र तन साधन तप के स्वण शुत्र मन, नव युग जीवन के प्रतीक बन

विहँस तुम, उर के अरुणोदय ! रक्त पक इस मत्य धरा पर प्रथथ वार लाये ठुम निजर, रक्त हीचव रण जन श्रेयस्कर

जिसस हो भू स्वग प्रम्युदय !

(करुण चाद्य समीत्त )

सन्‌ इक्यावन हा दुर्देव, अतीत कथा -सी अधशती अरब हुई व्यतीत, बनी इतिहांस | कितु भू-मन का उद्वेलन रुक सका नहीं ' उच्छवसित सिशु त्ता पीट रहा मुख युग जीवन ५५१ हाहा कर मानव उर की वज्ध दम्भ पापाण शिला पर

श्दृढ | पत प्रथादलो अप

प्रादोलित जन युग दयण है मानव सेन का, दधात उसे कर सकते केबल उस युग नर के सत्य अहिसा के आदश, अमर, युग पूरक ! संदाचार की रजत रश्मिया से शुभ मण्डित, विनय त्याग नये शोमित, लोक कमर प्रनुप्राणित, सूय शुश्र व्यक्तित्व एक दिन ग्रात्म पुरुष का भू मानस में स्वत प्रतिष्ठित होगा निदचय जीवन मन की क्षुधा तृपात्रा की चीत्कारें, अय शर्क्तियो, सस्कृति धर्मों वें सघपण विहव ऐवय मे, लोक साम्य में बँध जायेंगे युग मातव मे सयोजित, व्यक्तित्ववान्‌ हो!

धरती का विस्तार हुप्रा ही इस प्रकार है कर सकते सहार नहीं भू जीवन का जन !

प्रेम मनुज को करना होगा पञ्रातू मनुज से, देशो को देशों से, तनो को त्ञानो से, ईश्वर का आवास जगत मां दर हैं जन तन, रूपातर होगा ही अधोमुखी तृष्णा का अमृत चेतना में, अतर्मुख ऊव गमन प्रिय *

गूज रहे है अ्रभी देश, पुर पथ, गिरि सागर उस युग मानव की महिमा के जय निनाद से, मूज रही प्रतिध्वतिया कभी ने मिटनवाली !

(वाद्य संगीत जन गीत)

जय विराद युग मानव जय, जय ! स्वगंदूत तुम उतरे भू. पर

आत्म तेज से विचरे निभय ! सात्विकता के रजत शुक्र तन सावन तप के स्वण टुश्र सन, तव युग जीवन के भतीक _ बन

विहँस तुम, उर के पअ्ररंणोदय ! रत पक्कत इस मत्य धरा पर प्रथ. वार लाये छुम _निजर, रक्त हीन रण जन श्रेपस्कर

जिससे दो भू स्वग प्रम्युदप

(करुण वाद्य समीत )

सन इक्याचन हा दुर्देक, अतीत कथा -सी अ्धशती अब हुई व्यतीत, बनी इतिहास ! क्तु भू मन का उद्देलन ढक सका नही ' उच्छवसित सिधुतसा पीट रहा मुख युग जीवन दारण हाहा कर मानव उर की वञ्ञ दम्भ पापाण छझिल्ा पर !

१३४ / पंत ग्रयादलों

का यं मिखर रहा निज भौतिक प्रध्यात्मिक वैभव # पीरे .. धीरे ग्रथ व्यवस्था जे धरपी के उंग वाछित भपतुलन भा रहा, भौतिक सत्ता भानवीय घने, नव प्रेत्न आकार धर रही !

रजत विधर / ११५

पूजीवादी लोक साम्यवादी दंशां के वातायन खुल रहे भाव विनिमय के व्यापक, हृदय द्वार खुल रह, विचारो से नव मुनुलित, भू जीवन के प्रावागमन हेतु दिगू विस्तृत ! नव युग के श्राथिक नतिक विधान के युगपत्‌ नव निर्मित हो जाने पर, नव मानवता की स्वण चेतना ध्वजा उड रही गिरि शिखरा पर, सागर के उल्लसित वक्ष, प्रहसित प्रम्बर में !

(विजय याद्य सगीत)

दंयदुख मिद गये, भर गये घरणी के प्रण, झनन की धुल गयी कलुप कालिमा युगा की, मानस वैभव से मुबुलित हो उठे दिगरन्तर, संस्कृति के सोपाना पर थारोहण करता जनगण का मन, देवो का एंड्यय बेंटोने | -- समुल्लप्तित गाते नर-नारी भू जीवन के विश्व धीति के गीत, भाव स्वप्ना ऋकृत !

(वाद्य संगीत तथा जन गीत )

निखर रहा मनुज नवल, निखर रहा मनस्‌ नवल्र ! जीवन के वारि चपल, विहेंस उठा हृदय कमल ! खुले रुद्ध लोक द्वार, मुक्त वचन जन विचार, बरत रही आर पार ज्योति प्रीति घार तरल ! श्री हृत गत सौध धाम, कुसुमित जन वास ग्राम, मानवता पूण काम युक्त धरणि हुई सकल ! नवल चेतना अप्रकाश, जीवन मन का विकास, मानवीय भू निवास! बरस रहा जन संगल !

(वानपुरे के स्वर) सन्‌ इव्पावन

उतर रही झधिसन के नभ से नव्य चेतना स्वण शुक्र ऊपा सी, जन मानस घरणी पर, चीर रहे है रश्मि तीर शत ज्वाल स्पश से भू जीवन के जड़ तम को, स्वणिम चेतन कर!

१३६ | पत ग्रथावली

झात सयोजित व्यक्तित्व बनें मानव दवा, श्री शोभा वा अमर घाम हो मनुज लोव' यहु ! (मंगल संगीत समवेत गान ) मंगल, जन मंगल हो ! मंगल मय या निवास मानव दूत शतदल हो! प्रीत्ति ग्रथित हां जन-जन, ज्योति द्रवित जनगणं मन, बभव नत जन जीवन, शोभा स्मित मूतल हो! नारी नर हां समान कम निरत, तोक प्राण, जग को आत्म दान जन हित जन श्रम फल हो ! दशात हो समर प्रमाद, शात रिक्त तबवाद, जय जीवन हो निनाद, मुसरित दिंड मण्डल हो !

(३१ दिसम्बर, १६५४०)

१३८ |/ पत प्रयावत्री

शुभ्त्र पुरुष

शुत्र पुष्प” महात्माजी के तप॒पूत व्यक्तित्व का शुश्र प्रतोक है महात्माजी बारतीय चेतना के ग्राघुनिकतम रजत सस्करण है। प्रस्तुत रूपक उनकी जमतिधि के प्रवसर पर लिखा गया था। यह जनग्रण मन अधिनायक ग्राधीजी के राजनीतिक, सास्कृतिक तथा आध्यात्मिक व्यक्तित्व के प्रति युग की घिनम्र श्रद्धाजलि है

स्प्री-पुरुष स्वर जनगण (उत्सव वाद्य समीत) पुदप स्वर

राजह्स भरते उडान शुचि शुश्र चतुर्दिक इदेत कमल यी पंसडियाँ बरसा जन पथ पर, स्वणिम पता की शत उज्ज्वल ग्राभाग्रा से नव स्वप्ना की दिव्य सुप्टि कर भ्‌ मानस में! विचरण करती व्योम कक्ष म॑ सुर वालाएँ ज्योत्स्ता का रुपहुला रंशमी अ्रवचंल फहरा, हंसघता शारद चन्द्र घना के श्रतराल से शुत्र चेतना ज्वार उठा जीवन सागर !

रजत घण्टियाँ वजती भ्रम्बर म॑ कलष्वनि भर मभरत॑ अश्रुत स्वर ताराझं को वीणा से हिंम शिखरो पर शशि किरणा की छायाएँ कप फहराती जझ्त रग ग्रथित बदनवारो -सी | आज चिर स्मरणीय दिवस है शुद्र पुरुष वी वर्गाठ का धरती पर गअ्रवतरित हुआ्ना जो नव युग की श्रात्मा ववकर जन मगल क॑ हित ! सदाचार के चुश्न चरण धर जिसने भू को फिर चिर पावन किया अमर पद चिह्रो से मिज। जमोत्सव हैं श्राज मनात हपित सुर नर विश्व प्रकृति के प्रागण म॑ स्मित पुष्प वृष्टि कर! जय नितांद से मुसरित है जन भारत का नभ, फुहरात! है मुक्त तिरगा रुग सरगित,-- मगल गायन वादन से गुजित है भू तल ! (मगल वाद्य ध्वनि समवेत गान)

जय जय है, युग मानव, जय है!

स्वग शिखर से विचर भू पर

आत्मतजमय तुम भिनय हू!

कोटि जनो के कण्ठ ग्रान वन

कोटि मनो के मंत्र प्राण बन

जन जीवन प्रायण मे लाये तुप नव अख्णोदय हू !

रजत शिखर / १४१

संत्य खोजने ओआये जग मे स्वेग लुटानें जन के मभग मे, देवा का वल लाये संग मे जय चिर मगलमय हैं | तप॑ से पावन स्वण शुध्र तन सत्य शुक्र सत्तम बचने मन, स्वग धरा का करने ओआये आुश्र पुरुष, परिणय हें! (हेप वादन) स्त्री स्वर

पराचीन थी सदियो जब स्वण धरा यह दय दासता के श्ूखल जकड थे तन को, घोर अ्रविद्या के तम से पीडित ये जनगण, रूढि रीति के प्रेत युद्ध करते थे मत मे!

घेरे थे विश्वास अध गश्राकाश वेलिस्से, सुण्ड मुण्ड में थी विभवत लघु लोक चेतना

स्वार्यीं में रत वग क्षघित शोषित थी जनता, पद लुण्ठित जीवन गौरव, मृत मानव शझ्मात्मा छायी थी जब विकट निराशा की निष्कियता, वीयहीन थी भारत भू भूपति बिलास रते,-- प्रकट हुए थे लोक पुरुष तुम श्रात्म तेजमय श्राधकार को चीर हुआ हो तव॑ स्वर्णोदिय

देख धरा को तमोग्रस्त, तुम करुणा विगलित, जीवन रण म॑ बने दिव्य सारथि फिर जन के, महा जागरण सन उच्चरित कर श्री मुख से युग युग स॑ निद्रित, जीवमत महाजाति को जागत तुमने किया पुत निज रहस शक्ति से ! स्वाभिमान भर जन क्षण में किया संगठित नव्य राष्ट्र उहू, स्वगवत मातृभमि के प्रीति पाश में बाँध, विरत कर लघु स्वार्थों से ! महापुरुष, निज अभय दान से नव्य प्राण भर क्कालो को दिया मनुज का गौरव तुमने, युग-युत् के घन भ्राषकार से बाहर लाकर मत्युभीत जनगण को दियलाया प्रवाश नव आर एक दिन प्राणोद्देलित जने समुद्र को मुवा तिरग के नीचे समेत कर पुन उहे झहिंसाध्मक अदभुत रण कौशल सिखला छिन कर दिय तुमन युग के पाद्य पुरातन ! एव' रात मे मौन गगन हो उठा निनादित प्रगणिन कण्ठ रटित वदेमातरम्‌ सत्र से!

१४२ | पत प्रयायलों

घप सिद्ध जन नायक, तुम चर गय पराणित घिर प्रजेय साम्राज्यवाद वी लौह शक्ति को क्षण भ, सौम्य प्रदिसा के मगलमय बल स,-- प्रेमामूत से गरल घृणा को प्रपहत बरवे पिन्धु तरगा से, गर्जन भर भारत के जत झाज तुम्हारा गोरव गाते हृप उच्छवसित ! (स्तवन वाद्य समवेत गान)

जय जन भारत वाग्य विधाता,

लोक मुक्ति वर दाता |

प्रजातत्र॒ भारत के जनगण

गाते गौरव गाघा |

जय स्वतन्त्रता बे रण नायक,

महाजाति के नत्र उननायक,

भू गौरव, जन राष्ट्र विधायक

जय युग मन वे गाता !

वीर, प्रहिता रत, ग्रतधारी,

धीर, सत्य के प्रसि पथ चारी,

देय दांसता के भय हारी

जग जीवा तम नाता !

श्रद्धाजलि दत नर - नारी

जय - जय राष्ट्र पिता वर्तिद्ारी,

तप पूत मन, जन हित्तवारी,

नव जीवन मिर्माता !

(प्रभिवादन समीत्त) पुदथ स्वर

धय हुई यह मात धरा युग लक्ष्मी फिर से प्राज इसे भ्रभिपेकित करती जनगण मन के सिहासप पर प्रज्िनन्दित करती नव युग की ऊपा, इसके गौरव दीपित रजत भाल पर स्वण घुश्न किरणाो का जगमग ज्योति मुदुट धर | वृद्ध देश, हिम श्वेत इमश्रु स्मित, शोभित जो नित पुरप पुरातन-सा विकास प्रिय इस पुथ्ची पर, सजीवन पा श्राज जनो का यौवत उसके मूतिमान हो रहा पुन नव लोक तन में ! जय निनाद करता जन सागर उमड़ चतुर्दिक हप तरमित अपने शत - शत शीश उठाये, फहराता विजयी तिरग च्वज इद्रधनुप -सा दिगू दिगंत मे रग छठाएँ बरसा श्रगणित,-- पुण्प वष्टि करते हा ज्यों नभ से फिर सुरगण ! महामूमि यह, जिसके श्री विराट प्रागण में प्रथम सभ्यता विहँसी भू पर भू प्रकाश सी,

रजत शिखर |

जिसकी निमभुत गुहाझों मे पहिले मनुष्य को आत्मोमेष हुआ युग द्रप्ठा ऋषिगण विचरे स्वग शिखा ले जहाँ सत्य की ग्रमर खोज में जिसके ज्योतिमय मानस पलने में पलकर धम ज्ञान सस्कृतियाँ शवश फैली जग मे, जिसके दशन के स्फठिकोज्ज्वल छुभ्न सौध में स्वत अवतरित हो मगलमय पुरुष परात्पर वास कर रह मृत सत्य से जन - मन नंभ में राम क्रृष्ण गौतम लोठ जिसकी शुचि रज पर,-- झ्रभिवादन करते जनगण उस दिव्य भूमि का झाज पुन दिक प्रतिध्वन्ित उल्लसित स्वरो में--- बदे मातरम्‌

सुजला सुफला मलयज झोीतलाम '

तपीमूमि यहू, राजतज के युग मे जिसने राम राज्य का पूर्णगादश दिया जगती को, आज असख्य विमुग्घ लोक नयनों से निर्मित नव युग तोरण से प्रवेश कंर रही पुत्र वह जन मन दीपित घरा चेतना के प्रागण में लोक साम्य के यौ चुम्बी प्रासाद में महत्‌, सवभत मे फिर अपने को अनुनव करने !

स्वग खण्ड यह, हाय, शम्भु सा समाधिस्य हो विचरण करता रहा कहाँ तब मध्य युगो में आत्मा के सोपानों में खो ऊधष्ब ऊधष्वंतर आत्मोल्लास प्रमत्त, जगत के प्रति विरक्‍त हो जीवन मन के सकल कम व्यापार त्यागकर यह नि स्पह् मिश्चेप्ट, शुय, नि सज्ञ बन गया स्थाणु सदृशकयों ? बाह्य श्रचेतन स्थिति में अपनी देय दासता दुख पग्रविद्या के बाघन से चेप्टित, सहता रहा श्रात्मपीडन बंया केवल जन भू का विप धारण करने नीलकण्ठ में? (कालयापन-सूचक संगीत) सजी स्वर

जाय रहा फिर राष्ट्रपिता को मन का भारत, जाग रही फिर ग्रात्ममूमि, भ्रन्त प्रकाश से झपने संग सोयी घरती वो चेतन करने !

जन टहिताय निर्माण कर रही वह नव जीवन लोक तत्र की सुदुद़ नीच रख अन्तर॑क्य पर, स्वय ज्योति चुम्बी घर शिर कलश सत्य का !

घविचरण करे प्रजा युग प्रभिनव जन भारत मे दूर-दूर तक शिक्ष। संस्कृति का प्रकाश भर,

शैढ४ [पत्त प्रपावलो

सुख वेभव की स्वणिम क्रिणा से कर मण्डित झऋाड फंस के भग्तन घरोंदा को, युगन्युग से देय भ्रविया कं तम से जो तस्त प्रस्त हैं! मगे मुखें रुण भ्रस्थि पजर गत युग के जहाँ रंगता भार ढो रहे भू जीवन का वंस सभ्यता के उस निचल नरक मे, जहाँ झन वस्त्र का घोर प्रभाव रहा भ्रनादि से, छोर सम्यता संस्कृति की स्वग-स्मित किरणे पैठन सकी जहाँ, जीवन भाद्धांद कभी भी पहुँच नहीं पाया, जन-मत का नीरबद रोदन मात्र हृदय सगीत रहा उच्छृवसित, भ्रताद्रित !

प्राज तुम्हारा नव भारत निज रक्‍त दान से पुण्य स्नात कर घरती क॑ जन का विषण्ण मुख सवृप्रथम सौदय प्रसन कर॑ मानव को उसकी चिर वसुधव दुदुम्वक मात फ्रोड में एक अऑआहिसक मानवता ले जम ओआत्म स्मित, नयी चेतना की प्रतिनिधि हो जो भू के हित विविध मतो, वर्गों, राष्ट्री में बिदरे जन को मनुष्यत्व भे बाध नवल भू स्वग रे बह ' जावन का ऐश्वय प्रेम झानद उतरकर झन्तर्मानस से, महिमा मूतित हो जिसमे

युद्ध दग्ध जन म्‌ पर व्यापक लोक तन का नव आदश करे स्थापित वहूं सब सर्मावत्त, अधभिनव मानव लोक सृजन कर नर देवो हित !

युग-युग तक गावें भारत जन एक कण्ठ हो

जनगण मन अधिनायक जय है भारत भाग्य विधाता

(स्तवन संगीत भारत वदना)

जयति जयति ज्योति भूमि, जय भारत ज्योति देश '

ज्योति शिखर हिमवत मन, ज्योति द्रवित सुरसारि तन, ज्योत्तित कर घरणि सकल हरे विश्व तमस बलेश ! उठों, उठो, सुव॒ल तुझे तिभिर चीर जगो शभ्ररुण भेद भीति तजो, . बंधों लोक प्रीति में प्रशेष * ज्याति पुर खडे द्वार तुम्ह) फिर रहे पुकार,

रजत शिक्षर | १४५

स्वय हज्य करो दान उत्सुक जंग के प्रदश (तानपूरे के स्वर) पुरुष हत्वर

नान नृत्य करती थी दिसा जब पृथ्वी पर भौतिकता से जजर था जन भू का जीवन, महानाश का परावक वरक्ाता था प्रम्बर, तुमुल रणब्वनि कॉपता था दीण दियन्तर !

राष्ट्रा के कंटु स्वार्थों से, स्पर्धा लिप्सा से दुबहु था जब जन धरणी मे जीवन यापन, घोर पग्रनतिकता छायी थी मनोजग्रत्त मे, बिखर रहे थे शिखर समातन भादशों के,---

सदाचार की रजत शिखा जे, श्राप थे तुम युग प्रतीक बन भारतीय चेतना के पुन, सत्य सामय से माग प्रदशन करने जन का, प्रमृत स्पश से आहत जगती के बध्रण नरने,-- मधुर अहिसे का संदेश सुनान भू को! धायमत्य के अभ्रमर पा य, तुम निपिल धरा को याँध गये नव मनुष्यत्व के स्वणपाश में

(आवाहन सगीत समदेत गान)

शुत्र चरण घरों पाथ, शुअत्र चरण घरों! झकित कर ज्योति चिह्ध जीवन तम हरो

विश्व बारि हैं भध्ानत जन जीवन ध्येय भ्रात, कणधार बनो, धीर,

छुब्ध नीर दरो

शार पार प्र'धकार, रुद्ध पग्राज हृदय द्वार, व्यथा भार हरो देव,

भेद भझमिट भरो!

मगलमय तुम उदार, सुनो भाव जन पुकार, पावक की अजलि भर

वितरण हि करो!

(तानपूरे के स्वर)

३४६ | पत प्रथादली

सन्नी स्वर

धय हुई जन धरणी यह, भ्रवतरित हुए तुम मत्यलोक में फिर देवोपम गरिमा लेकर, विचरे भे८ शिखर से नव किरणों से भूषित शुक्र काय मन, नव्य चेतना की ज्वाला को जन मन में दीपित करने, करुणा प्रेरित हो

बाँध गये नव सस्कृति मं तुम विश्व जनो को मनुपष्यता का मुख नव महिमा से मण्डित कर, भर चरित्र का रूपांतर कर, जन गण मन को श्रद्धा से पावन, धरणी को स्वग स्नात कर !

किन दाब्दा में श्रद्धाजलि दें आज हृदय की, देव, महामानव, हे राष्ट्रपिता हम तुमकी चवाष्पाकुल्त है नयत, हप श्रद्धा गदुगंद स्वर, बभ्रीति प्रणत शत शत प्रणाम हो स्वीकृत जन के !

(स्तव संगीत समवेत ग्रान)

जय नव मानव, जय भव मानव ! स्वयं दूत नव मानवता के, विचरो ज्योति शिक्षा ले अभिनव ! प्रीति पाश में बाँधों जन - मन, क्रद्धां पावन हो जन जीवन, बनो शुक्र विश्वास सेतु तुम, दान्त सकल हो भव के विप्लव ! स्व्ग हक: हो जन में स्पादित स्वण हक से भू मण्डित, प्रमुत स्प॒श से हरो मृत्यु तम, जन मंगल हो, जीवन उत्सव ! शुतञ्न सत्य का हो जन-मत पंथ, दांक्र प्रहिसा का जीवन ब्रत, विदव ग्लानि में नव प्रकाश बने निखरो, "ुश्न पुरुष, युग सम्भव

(२ प्यतूवर, १६५०)

रजत लिसर | १४७

पिद्युत्‌ बसना

विद्युत वसना स्वाघीनता की चेतना का रू१क है, जो स्वाधीनता दिवस के भ्वसर पर लिखा गया था। स्वाघधीनता ध्येय नही, साधन मात्र है ध्येय है अ्तरनिमरता तथा एकता। इस युग मे जन स्वत-न्रता की उपयोगिता लोक एकत्ता तथा विश्व मानवता के निर्माण ही भें चरिताथ हो सकती है यही इस रूपक का सदेश है।

स्प्री-पुरुष स्वर विद्यूत्‌ दसना जनगण

( मेघ घोष के साथ तुमुल वाद्य ध्वनि ) पुरुष स्वर

यह विद्युत वसना का रूपक है साकेतिक, नव युग वा सन्देश भरा जिसमें ज्योत्तिमय, स्वतत्रता की प्रमुत चेतना, जो मेषों के रप्ना से है फूट रही जन ममोगयन मे, भाज उतरन को वह प्लातुर, जन घरणी के जीवन के प्रागण में, विद्युत निकरिणी-सी,--- प्रधकार से भरे गरद्धरोा को पृथ्वी के नव प्रकाय्न रेखाप्मा से झादोलित करने!

प्राज इूटने को है युग की दुधर ज्वाला जन - मन के श्यगों पर पावक के प्रवाह-सी, जाग रह भू-रज मे सोये ग्लनग्ति बीज फिर प्रभिनव इच्छाओ्रो के ज्योति प्ररोहा में हँस ! उद्देज्चिति धरणी का उर, युग की प्राभा का प्भिवादत करने को, जय नादा से मुखरित ! ( जय भिनाद ) झ्पनी शुक्र छटा के भ्रचल में लपेटकर अमर संदेशा लायी हैं स्वाधीन चेतना ज्वलित स्वण शोभा से मण्डित, जनगण के हित,--- सावधान हो चुनें मत्य भू के वासी जन ! (उद्बोधन वाद्य सगीत के साथ दूर से आते हुए करुण समवेत गीत के स्वर) गोत घोर तम्िस्ना छायी, कोन सेंदेशा लायी ?

घुमड घढठाएं घिरती प्रतिक्षण

गंगन कुद्ध हो भरता गजन,

झन्तरिक्ष के उर मे किया रवंते ज्वाल गृश्रगायी |

रजत शिजर / १४९६

भिलल्‍्ली क्या बज उठती भत-भन

जगा मुहाप्ता म॑ युग रोदन,

गूढ़ पादियों मे जीवन की प्रेधियाली गहरायी !

बिजली रह - रह बरती नतन ज्योति अआध कर जन के' लोचन, फिरती उर म॒प्रावज्ञा की

उठ वाली परछाई।

बदल रहू जने, बदले रहा मन,

वदल रहा युग झौ' युग जीवन,

प्रलय सृजन की उभद देला प्रव भकल लहराई

(हामपूरे के ऋशान्त स्वर) स्प्री स्वर हप छुदन करता धरती वा कातर भन्तर, उम्रड रह हैं महा वलाहक सजन छटा स्मित्त,

ककालो की पम ध्वनि कप उठता भू तेल, जीण प्रस्थि पजर बढ़त है विजय ध्वजा ले !

महानाश के खेंडहर पर जन मन उमादिनि माच रही है विदृुत बसमा लोक चेतना अदृहास भर, ?ात स्फुलिंग बरसा श्रम्वर से, जव जीवन के ग्रग्ति प्ररोहों से रोमावित गाती है उमस ग्रीत बहू मंद्ध स्तनित भर !

(मेघ गजन तथा मद्ध गभीर वाद्य ध्वनि) विद्युत बसना जन ग्राकाक्षा के शिखरा पर पत्र धर मैं युग वाण्डव करती, चिर अ्रधकार से ज्योति खीच युग अं घकार का भय हरती !

मैं वाष्प धूम के अ्रणुप्रो को निज स्पश्ञ ज्वाल से चटकाती शत बाघा बंधन के म्पुखल उमस हप से केडकाती !

में प्रलय ज्वार -सी उठती है धरती स्वतजता म॑ हाती, में नाश सजन के पा मे आ्राँधी - सी उड, झाती - जाती *

१५२ [पत प्रथावलो

(कमामूचक ध्वनि प्रभाव) जन स्थ॒र

तुम प्राप्रो, शत बलिदान यहाँ प्रभ्िवादन के हित तत्पर हैं तुम आझाग्नो, शत शत प्राण यहाँ प्रभिलापामोों जजर है!

तुम उतरो, नव आाद्शों के दिसरा प्र फिरणे वरसाप्रो, उतरो उबर तलहटिया में फिर ज्याति डीज नव विखराग्रो '

ग्राग्मो हु तुम जन मसस्कृति दे

पथ को दिगू विस्तृत बर जाप्रो,

युग -युग से पके भरी भूकों

सोदय ज्यार म॑ नहलाओो ' घिद्यत दसना

मदिरा की ज्वाला सी मादक में जाग्रत्‌ विस्मृति लाती हूँ, महला को खेंडहर, खेंडहर को फिर उठते महल घचनाती हूँ!

पतकर के वन का मासल कर नव रूप रंग भर जाती हूं मूका को कर बाचाल, पगरुआ को चढ़ना सिखलाती हूँ !

जन स्व॒र

तुम झाओझो, मन के धनी यहाँ तन के भूखे करत स्वागत तुम देखो, युग - युग सोय रज के सपने होत जाग्रतू ! देखो है तन- मन के शापित अब तोड रह दुख के धन, नव मानवता जाग रह मिटटी के पुतले नव चेतन

(वाद्य स्वर परिवतन) पुरुष स्व॒र

भू धकार बढता जाता है थ्रुग प्रभात है होने को निश्रय ! सहसा मसर हरहर्‌ ध्वनि फूट पडी है नग्न डालिया में जन वन की! मलय पवन तूफान घन रहा ! सर॒मर चर मर्‌

रजत शिखर / १५३

टूट रहे हैं जीण खोखले वृक्ष ठूठ प्ब भूमिसात हो! नाच रहे भर-भर कर पत्ते शुष्क पीत मृत, घूम घूम दात श्रावर्तों में ! धघूलि कणो के भंवर उठ रहे, लोट-लोट कर धूसर भुजगो-से करा कम्पित घरती पर!

(ध्वनि प्रभाव)

ग्रधड शझ्ाया, प्रवड आया, घोर बवण्डर | कोलाहल से वधिर हो रहे विश्व के श्रवण ! भूमि कम्प यह, हिल हिल उठती भू की जडता, काप रहे पवत्, टकराते श्युग अग्नि मुख | सस्‍्फीत तरगा पर चढ़ रही तरणगें उमद, फेनो के क्षण अद्वहास्य मं उबल रहा जल ! ग्राधि व्याधि कटुदय दुख का फटता कदम, टूट कगार रहे, छितरात्ते बालू के कण !

घूल धुघ ! उड रह युगा के द्वद्व पराजम, हानि लाभ, शत जम मभरण ! छा गया चतुर्दिक मिट्टी का बादल! घरती हो नयी बन रही नाच-नाच नव युग परिवतन के इंगित पर मिखर रही है नयी चोटिया, नयी तलहूटियाँ दिग्‌ विस्तत, जीवन किटाणुओ्नों से नव उबर! (पुग परिवत्तन सूचक घोर तुणुल सगीत दूर झाते हुए समदेत स्वर ) दिग हसने, भ्रधि विद्युत वसने ! अटटहास से चकित दिगतर, शत प्रलयकर दशव ! विद्युत वसन | झग्नि वृष्टि करता युग अम्बर, रक्‍त तरगित जन मन सागर, साच रही तुम निमम ताण्डव जन मंद झकृत रसने।! विद्युत्‌ वसते स्वार्यों में छिड रहा तुमुल रण धघ्राज खुल रह युग-युग के ब्रण, उमड उठा भू का भ्रवचेतन झधि जीवन तम गझने विद्युत्‌ वसने ! (तानपूरे के स्वर) विद्युत बसना प्राणां के नीर से भावत जगती का पभ्रम्बर दिशा होन,

१५४ / पत प्रथादतो

मैं मुक्त चेतना है. उसकी सघर्पों परे दीपित नवीन | वह सतरंग शोभा भें हंसता शत ग्राकाक्षात्रों से माथयत, नव जीवन की हरियाली मे अरता रहता करुणा विगलित

में उदकी आभा की प्रप्सरि युग शिखरों पर नतन करती, बजती चल पावक की पायल जन-मन में रण गजन भरती !

में भ्रग्ति बीज बोती भास्वर उपजाती लपटो को खेती में महा प्रलयथ के प्॑नो की छाया में सजन को सेती

(मेघ ग्रजन, कमा का शब्द झौर कोलाहल ) स्त्री स्वर

हहर रही है जन स्वतत्रता की खर भाभा, बीज वो रही जो पतभर में नव वसन्‍्त के

कया है इसका ध्येय २? गरजती हुई घटा यह सतरगी ले विजय घ्वजा किस मनोललास को उमड -घुमड घिर रही जनो के मनोगगन मे ? कौन महंत्‌ उद्देश्य, कौन प्रेरणा हृदय की, जीवन की कल्पना कौन, श्रगणित जनगंण को एक प्राण कर चला रही है आज अर्ताद्वत ? बढते झ्डिय चरण ग्सख्य, निनय अमोघ, दृढ़, पदाघात से कम्पित कर धरणी का प्रागण,--- कैंप केंप उठती युग युग को शका, कायरता, हिल - हिल पड़ते मनोलोक, गत आदक्ों के शिखर बिखरते, धेंसती भू में रूढि रीतियाँ शत कृमि कोटो से जजर, स्वार्थों से स्थापित ”?

(उत्ते जनाद्योतक घ्वनि प्रभाव)

दुनिवार कामना कौन सी महाशक्ति यह जन समुद्र वी है ढकेलती युग तारण से नव प्रभात के सद्य प्रज्वलित नव प्रदेश में २--- जीवन का सौदय, धरा का स्वणिम वैभव जहाँ हँस रहा दिग्‌ दिगनत भें जन-जन के हित

कौन दिशा है वह ? मजिल है कौन वह नयी ? क्या प्राशय है लोक जागरण, लोक मुक्ति का ? गायों युय की वीणे, पावक के तारों से नव ज्योतिमय, शास्त, मधुर, स्वर सगति बरसा?

रजत शिखर / १५५

(मंगलवादत शभाकाद्ववाणी)

इस युग की स्वाधीन चेतना अ्रभय बढ रहीं लोक एकता, विश्व एकता के मांदर को * साधन केवल जन स्वत त्रता,--मनुज एकता लोक साम्य थ्रो' विश्व प्रेम ही प्राप्य ध्यय है! जनता का बल युग सम्बल हैँ ! मनुष्यत्व ही जन बस की महिमा, जन गौरव का किरीट है ! जन स्वतात्रता नही,---लौह सगगठित जनों की अन्तर तिभरता ही युय का परम लक्ष्य हैं! बोलो जता की जय, नव मानचता की जय

(हप वाद्य ध्वन्ति समबेत ग्रीत)

बरसो है जन मंत्र के बादल ! नव जीवन की हरियाली में हरसो है नव स्वणिम उज्ज्वल

उमडो, श्यामल दूग हो अस्बर धुपडो, विद्युत प्रभ हो भतर, गरजों हे, जय हपध्वनि भर नव प्ररोह पुलकित हो भूतल !

सतरंग विजय ध्वजा धर छहरों

भू को बाहों में भर घहरो,

श्री शोभा के शस्य हास्य से

सरसे जन भू जन मंगल !

(तानपूरे के स्वर) पुरुष स्वर

मत्त लास्थ कर रही गगन में विद्युत हासिनि मत्त हास्य भर रही हुंदय मे अ्रन्तर्वासिनि, उतर रही है ज्योति जाह्नवी नव्य चेतना उभर रहा धरती का मन श्रावत शिखर बन,--

स्वागत देने नव्य प्रभा को,

धारण करने दिव्य विभा को *

(अभिवादन वाद्य सगीत जन गीत)

ज्योति शिखावाही (जन) प्रीति शिखावाही * बादकल् दल गय बिखर नवल ल्लितिज रहा निखर, विद्वम उठा द्ृदय शिखर ऊपा मुसकायी !

ज्वाला के बरढते पग हँसता जन जीवन मग,

३२५६ | पत्त ग्रथादलो

जग का प्राण जगंमग देता दिखलायी ! प्रधकार रहा भाग, रहा भाग ज्योतिमय उठे जाग, उछे जाग, मत्योर्माई्मुत_ गरभय जन चिर झनुयायी

( १५ धगस्त, १६४० )

रजत चिखर [| १५७

गत

शरद चेतना

शरद चेतना प्रकृति सोदय की कल्पना प्रधान झूपक है इसमें धरती वी ऋतुएँ, हेम त। शिक्षिर, वेसन्‍्त आदि, प्राकाश- बासिती शरद का अभिवादत करती हैं, जी पथ्वी पर उतरकर चारो और श्रीसुव शाति की संचार के

फूल, मुंकुल आ्रादि धरती के चराचर आरन-द उत्सव मनाते हैं

वबाचक वाचिका वर्षा, हेमात ग्रोष्म, बस त, शिक्षिर प्रक्नत, फूल (वाद्य संगीत ) [प्राकाश गीत ] दइरुद चेतना! प्रीति द्रवित अमुत स्रवित शुति हिंम हसना ! चंद्र वदन, दकुद दशन, उडु स्मित सर उर चेतन, स्वप्ण्त पलक पद्च नयन, नि स्वर चरणा ! सोम्य स्निग्१ बयस कात्ति, मूतिमती खडी शाह, मिटदी विश्व जनित क्लासत, भू तम शअ्रशना ! स्वग स्‍नात भू रज तन, कौश शुद्र कास वसन, निखर उठा यर यौवन, मतवचना घुल निखिल छूप रंग, धुत भधुर प्राण श्रम, मिमल जीवन तरग, केल्मप दमना ! गध भप्रनिल रजत दवास, तण तर पर मुक्त हास, लहरी पर ज्योति ज्ञात, सारस रसना ! घाधफ अब वर्षा का व्योम, मरर रिगभिम भडियो मे, कोमल हरियाली हँस, विछ गया धरा पर, जौ गेहें के तल पभरोहा में रोमौधित॑ कप कप उठती भू छायातप की पहूृर्श |!

रजत पिक्षर / १६६

रंग-रेंग के फूलों की हेसमुख उडती चितवन इंद्रघनुप छायाएं बरसाती दिशिदिशि में, धरती की सौधी सुगघ से जिनकी सौरभ आण शवित से मम भावना-सी धुल मिलकर समुच्छृदसित कर देती मुग्ध हृदय को वरबस् !

स्वण कणों के शालि मझूर रुक नयन लुभाते सहज सुहांते स्वच्छ रुपहले काँसो के वन, मलिन वासना धुल सी गयी सरित धारा की, सरसी जल मे घुल-सी गयी ववल उज्ज्वलता

कुमुदों मे केड्धित हो निशि का झ्रपलक चिस्मय कमलो में खुल सौम्य दिवस के भ्रन्तर्लोचन, फुल्ल चंद्र का, स्निग्ध सूय का स्वागत करते ! चल खजन नयतनों से, कंल चातक पुकार से भू का सथ् स्वात मनोरध प्रकट हो रहा सौन मधुर लग रहा धूप वा सुधर घृतल्य मुख झगो से लावण्य फूट - सा पडता नि३छल, ड्व भावना में नव यौवन की मिममता कोमल-सी पड गयी,--मध्य दय के आग्रह से मादवता ग्रयी मनोरम मात्‌ प्रकृति मे !

वाचिफा

चिर रहस्यमय ताराशा का छाया! प्रथध नभ निज अससूय नयनो के विस्मय से हरता मन, स्वप्ता के स्मित ज्योति प्ररोहो से दिकू पुलक्षित व्योम हँस रहा दीप्त दिवौपधियों के वन-सां

निखर उठी नीलिमा, नथनिमा सी झननन्‍्त की, निश्ऋर उठी नीहार कान्ति निर्वाक दान्ति में, बुष्टि धौँत मीलिमा रहस प्राभा से गुम्फितद महाजागरण - सी सोयी स्मित अभन्तरिक्ष में निविड ग्रकम्पित जल-सी निस्तल मिश्चेतव की महा चेतना के पावक से लगती गर्भित !

दॉचफक्

चुद्धकला का मुकुट घर त्िज ज्योति भाल पर ह्वीरक कृमियो की शत ज्वालाओ से जगमंग तारक लडियाँ गूथ नोल चहूंरी वेभी पे रजत बाप्प जलदो के सतरेंग पछ खोल स्मित, नवल शारदीया, सुदर छुटाता-सी हेत, उतदर रही, स्वर्गगा-सी साकार गगन से!

व्योम दासिनी, सूधम स्वप्न देही भाभा बह, “दिव्य भदिति-सी प्रन्तमन के रजत गंगन मेँ,--+

२६२ | दंत प्रंय (वलो

उतर रही भू पलकों पर पनिमेष स्वप्नन्सी शब्द स्वर रहित ग्न्तरतम की तमय लय में | ज्योति द्रवित बह, जिसमे स्वष्निल गीलेपन से भीग रहे मन प्राण मौन शोभा मे मज्जित, प्रमृत चेतना चहू, जिसके श्रत॒ प्रवाह मं ड्व रहे उर के तठ, भाव तरग ध्वनित हो, नीरव कलरव से गुजित हर्पात्तिरेक के !

(वाद्य सगीत ) पाच्िकफा

फूलो की पंखडियो, कोमल रेग वरसाप्नो, लोल लहरियो, सरसी उर लय हो जाग्रो, तथ मभर, निज अस्फूट कम्पन मे खो जाश्रो, ताराग्रो की पलको, भिलमिल कर सो जाओ ! प्रिय चकोर, तुम पृथ्वी के भ्रगार चुग जाप्रो, शुञ्र हूस पखो, उडान बनकर रह जाओ--

शरद सा दरा उतर रही धीरे धरती पर भारहीन सुबुमार प्रगभगी ग्रोझल, निज अदृश्य पग, धरती पखुरियों, लहरो पर, स्वप्न स्पश सी पलफका पर,स्मिति-सी ग्रधरा पर ! देखो, फूला पर हँसते भ्रव रजत तुहिन कण लहरो, के अ्रधरो को चूम रहे स्मित उडुगण, भलक उठे पत्तो के करतल में मुकताकण, ज्योत्स्ना के पद चिह्नो से झ्ब भ्रकित मूतल !

भौतिक ज्योति नही हैं केवल शरद चांदनी, धात्म लीन वहू झ्रमर चेतना स्वग लोक की, प्रतिकम कर सब दिदा काल, तन मन के वबघन, आत्मोल्लास प्रदोप्त, हुईं परिब्याप्त चततुदिक मधुर प्रणय वा स्वप्न हृदय की पलको में ज्यां प्रथम बार मुसकाया सदयोज्ज्वल विस्मय मे नहीं भूमिजा वह, वेदेही भाव शरीरी, उसके अचल की पावन छाया मे श्राझ्रो, फ्लो की मदू धलको, स्वप्ना से भर जाप्रो, लोल लहूरियो, नव लीला लावण्य दिखाओं। घाचक

स्पात्‌ हृदय की वीणा होती, त्तार प्रणय के, कोमलता का स्पष्ठ, रुपहली गूजा जग सुदरता भझत हो उठती पिस्वर लय मं, स्वगिक स्वर सगति बन उर के श्रवणों के हित, मनोनयन तब कही देख पाते उस छबि को दर्द चाँद्रिका में अरूप साकार हुई जो,

रजत शिखर / १६३:

प्रीद्रि ज्योति-सी, स्वप्नां के श्रगो भे मूर्तित, स्वग घरा के भावों की सुपमा से थूपित !

(वाद्य सगीत) दबाचिका

परिक्रमा करती भू ऋतुएँ शरद विभा को, बारी - बारी से हँमनत शिशिर वसन्त शा, ग्रीपष्प भ्रौर वर्षा, रयों से, धूप - छाँहू से जल दूँदों से, हिम फुहार से करते स्वागत पिक चातक के, बुत्य - भयूरो के कृण्ो से अभि दन गा, शर्त नव लो, कमल देल बरसा |

चीचके

सर्व प्रथम हेमात कर रहा आत्म निवेदन, भरा भूरियों से आनन, सकुचायान्सा सन काॉप रहे मदु भ्धर, वाप्प मे श्राद्र हैं भयन, घने कुहासे म-सा लिपदा उसका जीवन ! ठण्ठा हो पड़ गया सकल उत्साह, वैलाल्त मन,-- ठिठका सा लगता नभ, दिद्वरान्सा भू प्रागण

(हेमंत का गीत)

जीण पतलित पीत वात, कम्पित देमन्त गाते !

हैम घवचल पकक्‍व केश

क्षीणं कॉाय, सौम्य वेश,

थर गति, मद कान्ति, नतदूग भुख वारिजात !

रजत धूम भरे भअग,

फ्लो. के उड़े रग,

उछरसि मन अब तरण, शीत भीत इंवास वात

मौन स्वल्प दिवस मान,

रवि भें ज्यां चद्र भान,

मुक्त अब प्र विहण गान, अश्रु सजले हिम भभात '

घिमठे मन देह पध्राण,

भ्धरो का राग म्लानं,

प्राणों के निकट प्राण दीघ स्वप्न भरी. रात *

(चाय संगीत)

१६४ [पत प्रयादली

वाहिका

छोड एवास फत्कार धजछ्ति के साँप नचाता जरा जीप जमती के पीले पात उडाता, घ्वस अभ्रष्ा करता मा क्रद्ध शिशिर श्रव प्राता भभा पर चढ़, थर थर कॉंपता, ग्रोठ चवाता ! सीसी सीटी बजा, रंदत भरता गायन, संमंदशिनी शरद का वह करता पझभिवादन श्िषिर का गीत - सन्‌ बहता समीर, सहक्तल तोर !

शिविर सीतार भीत गॉपता रज वा घरीर |

भरत मर शोण पत्र,

गिरते बष विष छत,

वियर रहा दुनिवार श्रान्ति दूत सा प्रधीर '

वबोरहा प्रचण्ड बीज जडता पर सीम-पीक, जीवन के नव प्ररोह धिहँसे थू गभ चोर! सिहर रहे तण तर संग, सिहर रहा धूसर जग मिहर उठे भूधर पम्, सिहर रहा लहर नीर!

नंग्गन भगत विश्व डाल,

संजन॒ घ्वस रे कराल,

सुलगें स्वरणिम प्रवाल मिटे निखिल देय पीर ! वाचक

नव वसनन्‍त झाता अब अपरो में भर गृजन, सौरभ से पुतक्ति मन, फूलां से रज़ित तन, नव भू यौवन - सा, स्वप्ना से अपलक लोचन, कुहू वुंह गा, प्राणो का सुख करता वपण ! शरद चेतना म॑ परिणत श्रव रगो के क्षण फूल बने फल, पण कस, परमृत मरालगण !

(वसंत का गीत)

नव वसंत आया! कोयल ने उल्लसित कण्ठ से अभिवादन गाया !

रजत शिखर / १६५

रो से भर पर की डाली

प्रधर पतल्लथो मे रच लाली,

प्खडियो थे पल खोल स्मित गृह बन में छाया ?

सोरभ की चलन ग्रलकें मादन, फूल घूलि म॑ लिपठा मृदु तन, नव किशोर चय, क्रीडां चचल, अ्रगनजग का भागा सधुपो के सेंग कर मधु गुजन मजरियो में पिरो स्वणनंण, दिश्वि-दिश्चि मं नवफूल वाष भर ममथ. मुसकायां धरा पुत्र यह, फूलो के अंग प्राणा मे इच्छाओं के रंग, जीवन के श्री सुया वैभव मे ऋतुपति कहलावा

वबाचक

प्रह, निदाघ बरसाता चितंवन ने पावकत कण, जग के प्राण ठपाता भूलसाता भू जीवन ! भू लुण्ठित छामा, कुम्हताया लतिका-साः तने, प्यासा जल अब, उड़ा भाष बनकर गीलापन, प्रतिक्षण तपकर, जीवन से कर कंदु सघपण समदर्शी बने ग्रीप्प शरद का करता दन

(ग्रीष्म बा गोत) त्स्ण तापस चीर, उग्ररूप, प्रचण्ड तरिनयत सा िदाघ गंभीर !

घूलि से घुसर जटा घन, मौन वचन, सुदे विलांचन रुद्ध श्वास, सुखद तणासन, उस्त्र पिरत शरीर ! तप रहें बयां व्योग भूतल वि लगती दाह शीतल, तप्त काचन देह भमिश्चल ध्यान भें रत धीर दौठता. पागल प्रमजन अग्नि के बेरसा ज्वलित कण, म्लोन फूलो का लता तन शेष तद प्रव नीर

१६६ | पत्त प्रयादली

रुद्न चक्ष्‌ कराल शभ्रम्बर

कृश सारित, पकिल सरोवर,

तडपते खग मृगर, भगोचर चुभ गया हो तीर

वाचक

लो, वर्षा की घनद्यामल वेणी लहूरायी, धरती को रोमाच हुप्ना, हरियाली छायी प्राणों में ग्रव जगा गहन जीवन उद्बेलन, अम्वर में गजा, दिशि-दिशि म॑ विद्युत्‌ नतन ! इद्रधनुप में हँसा गगत का सूना प्रागण

बह भार में खुला रंग चचल भू जीवन! स्निग्ध शरद का आँगन घो, निज दुग का भजन, सोत बलाक स्वरा मे वर्षा करती वदन !

वर्षा का गीत

नीलाजन नयना, उमद सिघु सुता वर्षा यह चातक प्रिय वयता !

नभ में श्यामल कुन्तल छहरा

क्षिति मं चल हरिताचल फहरा,

लेटी क्षितिज तले, श्रर्धोत्यित शल माल जघना

इंच्छाएँ करती उर थन

चिर अतृप्ति भरती गुरु गजन,

मुक्त विहेंसती मत्त यौवना स्फुरित तडित दशना

रजत विदु चल नूपुर भकूेत

मद्र भुरज रव नव घन घोषित,

मुग्ध नृत्य करती बवहस्मित, कल बलाक रसना !

बकुल मुकुल से कबरी गुम्फित

दवास कंतत्री रज से सुरभित,

भू नभ को बाहा मे बाँघे इद्रघनुप. बसना |

बाचिका

धरती की ऋतुएँ मिलकर करती भ्भिवादन चद्घमुखी नभ को ऋतु का अनिमेप नयन हो, बविहगा के स्व॒र, सर के कमल, घना का वादन, भू के रगो का वभव भ्रपणं कर उसको ' रक्‍्ते जबा फूलों से रेंगकर उसके पदत्तल

रजत चिलखर | १६७

झाम्र मौर का मेंकेट। कुई के कर्ण फूल रच, हर सिंगार चेणी, बेला कलियो की माला मधुपा से गजित कंदम्ब भेखला वाँधकर, करती मानस पूजन बे स्वर्गीय विभा की ] छा के चल पश्ा से ऋष मद मंदु व्यजन, ज्योतिरिंगणों से जगमग थूर्ति मभीराजन कर

झव छुप्र ग्रवनि मे शुश्र सर्र्ति, सरसी म॑ श्वेत कमल दल री

भू वासिनि ऋतुएं अन्य सभी, तुप्त नभ बासिनि चिर निर्मल री,

वे घरती वो जे मे लिपटी,

तुम स्वगगा सी उज्ज्वल

झ्रव कास हास से इवेत धरा, सरसिज से सिंत सरिता जले रो,

चल हंस पाति से शुक्र पवन, शक्षि मुख से स्मित नम मण्डल री

बेला जूही फूल धंवल। हिम धवल कद बलियाँ कल री+

तुम चर (खा को स्नेह विभी जो स्वण शुक्र चर शीतल री ]

झाठी - जाती ऋतुएँ जग भे कर जाती उर चचल री,

तुम शरद छतना स्वर्गोज्ज्वल बरसाती निर्ते जन मगल री '

दबे जीवन रंगों का. मोर्देक फैलाती. गयी अचल री तुम प्रीति द्रवित स्वर्गाभा * सी पावन कर जाती अंदर री '

तुम पारदणशिती। ज्योततिमपि, अत शोभा मधि निशठल री,

प्रस्पदय अदृइय विंभा उर की,

है रूपमयी रज मासल

घातक

रजत नील जल सी अम्बर सरसी की निमल जिसमे स्वप्नो की अरप्सरियाँ तिरती रहती,

१६८ | पत ग्रथावली

झपनी ही आभा में ओकल शरद चाँद्रिका कोमलता - सी, तमयता - सी, दिव्य दया - सी विचर रही धरती पर स॒स्मित स्वप्न चरण धर, शोभा के स्वर्गीय ज्वार में डुबा दष्टि तट। मुग्य धरा उर के भावो-से फूलो के शिशु रंग रंग की स्मिति बरसा, गाते शरद वदना !

फूलो का गीत

ग्राझ्ों हे हँसमुख फूलो, हिलमिलकर हम सव गावें शरद चेतना के आगन में उत्सव मधुर मनावें! रग पखडिया के पर फैला अम्बर में उड़ जावें, रजत सुरभि के झलक जाल में मारुत को उलकावें ! ग्रपलक चितवन के स्मित्त चचल वदनवार बँधावें जन भू के पत्र पर हँस हँस शत इद्गचाप बरसावें ' तुहिनों के मोत्री क्रिणो मे पोकर हार बनावें, डाल डाल पर उर स्वप्नो के मोहक जाल बिछावें ! फूलो का तन फूलो की बाँहो में भर सुण पाववें, स्नेही मधुपो की मधु गुजन सुनकर प्राण जुड़ावें | वाचिका डूब रहा नभ, डूब रही दिशि, डूउ रही भू एक अनिवचनीय महंत गझाभद मे अमित, द्रवित हो गयी निखिल रूप रेखा बरणी की, लीन हो गयी अखिल अ्सगत्तिया जडता की, विस्मय से अ्भिभूत प्रकृति के उर उठता जिज्ञासा भरा मोन संगीत गगन को '

प्रकृति फा गीत

क्यो हँसते रहते फूल मधुर, क्या लहरें नित नाचा करती, क्यो इद्धधनुप छायाचल मे किरणें छिप छिप सत्तरंग भरती ? क्यो उपा लालिमा मोन सलज नव मुग्धा-सी मन को हरती, क्यो कुह-कुह्ु याती रहती कोयल चिर मम व्यथा सहती ? क्यो अपलक तकते रे तारे, सपने देखा करती धरती, क्या शशि को वहा मे भरने सागरबेला उठता गिरती ? निज सुख-दुख की ही चिन्ता क्‍या डूबी रहती है जगती क्यो स्वप्नो के पर खोल वह प्रिय तितली सी उडती फिरती ? जो घृणा द्वेंप की प्रंधियाली इस घरती फंली रहती तुम उर का प्यार उडंल उस घो डालो हू, ज्योत्स्ना कहती

चबाचक

पग्रदल पकड़ प्रकृति का मात नवल मुकुल दल झधघ खुले विस्मित नयनो स॑ प्रथम बार ज्या निरख घरा की दुग्ध स्नात भनन्‍्त श्री उज्ज्यल

रजत शिपर / १६६

३२७०

हरित गौर भू उर पर सोया रजत नील नभ स्वप्म देखता हो विराद सौदय के भमर

घुकुलों का गीत

हास लास हो हुलास, सुरभित हो साँस साँस !

चांदनी खिली श्रपार

स्वप्नों का उठा ज्वार, मौन मसुख्ध आर पार

दोभा श्री की बिलास !

उमड़ रहा अतल प्याए+

प्राणी का यह निखार पाथ, अब में रहे उदास

खोल हृदय द्वार, गूज उ6 मूक तीर,

दुग्ध फेत-सा, म्लीने कमल-सा स्फर्टिक खण्ड-सा पावस का शर्शि उज्ज्वल किरणा से मण्डित ही दमक उठा अब रजत बह के ज्योतिकुण्ड सा

निखिल सुष्दि को द्ोभा का प्रतिमाने रूप-सा, विश्व प्रकृति के चूद्वानन सा चार सुंधाकर

(दादना गीत)

बरसो ज्योतिर्धाराओं में बरसो धरती के मानस घन,

[पत ग्रय दली

प्रव निमल नभ, श्रम धृता घरा मुख, खुले सरप्ति के कमल नयब !

मिट्टी के प्राण प्ररोह जगे, सात्विक लगते काँसो के वन, भव हसो के पखां में उड हंसता धरती का उर चेतन !

बरसाओं है नव श्री शोभा

हो स्वप्नो से स्मित भू प्रागण, लहरा म॑ भलके रजत ज्वाल

फूलो की पलकी भें हिमकण !

बरसो हे स्वण सुधा के घट,

बरसो है रजत विभा के घन, बरसी भू मानस के प्रतीक,

चेतना सिक्‍त हो सब भू-जन !

(१ सितम्बर, १६५१)

रउत शिखर / १७१

शिल्पी

[प्रथम प्रकाशन वर्ष १६५२],

डॉ० नगेंन्द्र को सस्नेह

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(शिल्पी में मेरे तीन काव्य रूपक सगहीत है, जो अशत शझ्ाकाश

वाणी के विभिन केद्रा से प्रसारित हो चुके हैं। इन रूपको से वतमान विश्व सघप को वाणी देने के साथ ही नवीन जीवन- >ऑ की दिशा की झोर इग्रित करने का प्रयत्न किया ग़या है

१५ सितम्बर ५२ सुमित्रावदत पते

शिल्पो (कलाकार का अन्त सघपं )

शिल्पी शिष्या

दशकगण प्रामिव्नत जन

पहिले गोलाई ले लूँ। यह रहा सेरना ! ठोक-पीट, देखू, पत्थर में फूल खिल उठें !

(फिर फाय-व्यस्त हो जाता है)

गीत

ग्रा जाता वसनन्‍्त पतभर में प्राणयो का स्पदन प्रस्तर मं, जंगती दिव्य ज्योति गझ्न्तर म॑ !

त्तम के मूल हिला !

दीपित होता भ्राधकार नव, जड म॑ चेतन का निखार नव, ताम॑ रूपमय भसिराकोर नव,

साथक सुजन कला !

जीवन सघधपण होता लय मिटता जरा मरण दुख का भय, हँस उठता नव युग झरुणोदय

भ्रव सग्राम भिला !

(घेनो रखकर मूर्ति का निरीक्षण फरत्ा है)

शिक्षी ईश्वरा भव जाकर पापाण सजीव हुप्रा कुछ! छुंग विप्लव की पृष्ठभूमि साकार हो गयी,--- प्रस्तर के घर में युग जीवन का समुद्र ही हिल्लोलित हो उठा, क्षुब्ध जन प्रावेशो भें मेघा में विद्युत सी, तख्वन मे भेभा सी, ग्रधकार को चीर, नयी चेतना शिखा ज्या दौड रही जन मन में, दीपिद कर शत पावन गर्वोन्तित मस्तक, विस्मय से खुले हुए मुह, विस्फारित लोचन, विस्तृत उर, उठी भुजाएँ--- सागर लहरो से, दावा लपटोन्से जनगण जीवन शभ्राकाक्षा से लगते स्पा दत-कम्पित,-- मधु ज्वाला से वेण्टित नव तर शाखाओं से !

निखिल दृश्य पट आ्रादोलित है नव भावों से ! एक बहत्‌ चट्टान फलक ही नव चेतन हो जीवन की गति से हो उठा अवाक गुजरित ! रेवागा में घ्वनित हो उठा गरेक अचेतन, प्राणो के स्पर्शों से जाग उठी चिर निद्रा |

झा, अनन्त यौवन अब फूट पडा पाहन में ! भगुर जीवत को बदी कर शिलाखण्ड ने अ्रमर कर दिया,कालचक्र की गति स्तम्मित कर ! मूत हो उठा नव युग का इतिहास वत्त ही | सीमा में निसीम, भमर॒ता को मृण्मय मे,

१८७ ( पत॑ प्रधावली

शिएपा शिल्पी

कुछ दा शिल्पी द्विष्या शिल्पी शिष्पा छ्ल्पी

एक दशा

दूसरा तोसरा श्षिष्या

एफ

अफित करये फी चेप्टा करता प्रयल से उसका रूप बदल जाता कल्पना क्षितिज मे ! प्रॉसमिचोनी खेला करती बहू नित सुभंसे--- घूपछौद फे पट में ओभल हो रहस्यन्सी ! नही जानता, बसे उस सम्रानति काव की नित्य बदलती हुई वास्तविबता के पढे मे करूँ चिरल्तन सत्य भनुज प्रात्मा का [ 8 होती जग की वास्तवता प्रतिदिन, कितु नहीं श्रादश् वदलता है उस गति से, उसका दिन, वहते हैं, ब्रह्मा का दिन होता ! ब्राह्म क्रा ते ही मात्र नहीं यह भोतिक युग की, बदल रहा भ्रन्तर का भी आादन्न साभ ही, प्राज कला को अभिनव को बवल्पित करना है, मिट्टी की जडता में फूकक सके जो जीवन हार गया में खोट - खाद पापाण शिला को पर आदर्श नहीं अंठ पाता र॑पाी मं, सुक्ष्म सत्य, छाया सां खिसक दूर हट जाता विस्मित हूँ में !

(झन्त सघपद्योतक ध्वनि प्रभाव)

बाहर वुछ दशक भश्राये हैं ' उनका स्वागत कर, भ्रदर ले आग्रों बेटी

(ददकों का प्रवेद)

हम विश्रुत शिल्पी का अभिवादन करते हैं ! कलाप्रेमियो का सबिनय स्वागत करता हूँ कलाकल का झनुद्ीलन करन प्राय हैं * इनको कंक्ष दिखाग्नो बेटी ! बड़े हप से ! उधर दिल्प के कुछ विशिष्टि प्रतिमान पड़े हैं, जो लवीन हैं सम्भव, इनकी मार्जित रुचि को उतसे कुछ परितोप मिले ! मिश्चय ही, ऐसे

निरुपम कला प्रतीको का झवल्ोकन करके किसकी अ्रा्खें तप्त हांगी !

ग्रदभुत ऋति हैं ! चलो, इधर ही से देखें यह गाधीजी की प्रतिमा है

जी, यह प्रसिद्ध दाण्डी यात्रा के

जेतनायक गांधीजी है

उपत मस्तक पर रोली चदन वय, जन श्रद्धा का प्रतीक सा, मगल तिलक सुझोभित है, दक्षिण कर ये स्थित

१५२ | पत्त प्रयावली

कसरा तीसरा शिष्या

एक

बूसरा

शिष्पा तीसरफ

उन परिचित है, जो बापू के पृंढ निरचय सी आगे बढ़ने को उचत है दायाँ पैर » स्थिर निभय गुदा में खडे हुए वे, युग अभात किरणों से मण्डित मे सिर से सुदर लगते,-... दीप पावन लोक जागरण की उज्ज्वल चेतना शिखा-से आत्मत्याग के शुभ्र 49० त्ती पक की ये

'जत चद्रिका-सी इग्घोज्ज्वलः यात्त सौम्य वे देवपुन से निस्पम लगते, स्निग्ध हास्यमय | शत प्रयाम इस महापुरुष को _जवित कृति है ! बैठे

बापजी

वूतरा

शिष्पा एक

शिष्पा दूसरा

तीसरा

शिष्या

एक

वूसरा

यह प्रसिद्ध ग्रतिकृति हैं उतवी भारतजन के प्रिय प्रधिनायक जिस विनम्नता की प्रतिमा थे यह शृति उसकी सुस्मृति चिर जीवित रवसेगी जहँ भ्रय देशा के जननाथक इस युग में भ्रगरक्षकंं से वहु रहते घिर॑ निरन्तर, वहाँ भ्रहिसक बापु सिमय स्वग दूत से मुंदबत विचरते रहे सतत जनगण समूह में,-- सागर लहरा-से जो, जय घोपो मुस्तरित,. उह सुरक्षित रखते पे श्रद्धावेष्टित कर | झपराजिंत व्यक्तित्व रहा उनका दवोपम पावन वे पर गये घरा को चरण प्रणत कर, गौतम ईसान्स, जग को सादद दे प्रमर गोतम बुद्ध उघर शोभित हैं ध्यानावस्थित ग्रात्मवुन्त पर, प्रन्त स्मित हो मानस शतदल प्रस्तर का जड माध्यम भी प्रन्तशरचेतन हो समाधिस्थ हो उठा, शान्ति-सा मूतिमान बन [ पद्मासन में लीम,--भ्रधस्फूट युगल कर कमल स्वम दया के पश्रध्यपात्र-स शोभित स्वणिम, विष्व प्रीति शासाप्ना सी आजानु बाहुएँ, करुणा स्पा दत वक्ष, रश्मि गुम्फित सागर-सा ,--- झन्तर्लोचन, ज्योति शिसर-से ऊष्व प्रर्ताद्गत !

ये मसीह हैं |

दिव्य हुदय, साकार प्रेम से | स्वग राज्य वे अग्रदूत, भगवत्‌ जीवन को महिमा गरिमा के शभ्रन्तद्रप्टा, पृथ्वी पर विचरे जो, उरकी पलको पर झ्मर स्वप्न ले। जन भू के कलुपो को स्वगिक रुधिर दान से पृण्यस्नात कर गये, क्षमा से प्रीति द्ववित कर हिस्न धरा उर की निममता की सूली को ! गौतम से गाधी तक भू जीवन विकास फ्रम विचरण करता स्वप्न चरण घर कला कक्ष मं / भू जीवी को पुन स्वग चेतना शिखा का वाहक बनना होगा, उसको उठा उच्चतर | यह कवीद्वध का अ्रधकाय है!

कला सप्टि है |

पूण साम्य है. मुखमण्डल की रेजाझो में | शात, ध्मश्रु युत मुख श्री जैसे स्वय काव्य है ! अद्वितीय गायक थे निशम्चय कवियां के कवि गुरु रवीद्र, नव युग द्र॒ष्टा, नव जीवन ल्षष्टा, झमर कल्पना पख खोल, रलच्छाया स्मित सेतु बाँध जो गये घरा को मिला स्वग से --- स्वप्न मुखर भावों की नि स्वर पद चापो से

श१८४ढ / पत प्रथावली

तीचरः

एक

शिल्पी प्राप ठीक कहत हैँ, दोना प्रथम दृष्टि मे रापाहृष्ण सदृश लगते हैं, वस मैंने मेघ दामिती की मोहक पावस शोभा को मूतित वरने या प्रयास है किया शिल्प मं!

दुसरा मोलिक, तित्य-नवीत कल्पना है यहू निश्चय ! मौन विद्रवित मेघ एप्ण-सा लगता सुदर, वाप्पा की लहरायी रेखा पीत वसन-सी, दुद्बब्याप का श्र दीपता मोर मुकुटनसा मस्तव पर घोमित | गम्भीर उदार मंघ छवि भाव साम्य रखती हे श्रदूभुत घनश्याम | ध्रध निमोलित लोचन, कुचित उलकी श्रलकें, फरुणा विगलित अन्तर, शोभा निभर बांहं, नील गयन वी पृष्ठभूमि म॑ उभरी प्राकृति झनुपम लगती है |

तोसरा वारिद के उर से लिपटी पुलक लता सी प्राभा देही प्रतनु दामिनी श्री राधा सी तमय लगती इृष्ण प्रेम म॑ चंचल अचल खिसक उच्छवर्सित वक्ष स्थल छाया सा लिपटा है घन के बर्टि प्रदेश |

एक स्वप्म सृष्टि है |

दूसरा शिल्पकला का चमत्कार है |

डिल्पी पूण् च॒द्र सागर बेला की प्रतिमा है वह, वाम पाछव में |

एक मूतिमान प्रेमाकपण है!

उमड रही उदहाम मौन सागर की बला

नव यौवन की चचल गोभा मे हिल्लोलित,

आतुल, बाहँ उठी मुक्त भावना ज्वार-सी

पृण चद्ध को वदी करने बाहुपाश्न में पृष्ठेदेश पर लहराये घन कोमल कुतल

फेनो के स्मित फूलों की माला ग्ुम्फित, जलप्रसार सा फला चल अचल अकूल ज्या

भ्रम्बर तट छूने की झाशा से उद्देलित ! झधखले भ्राक्ण मीन लोचन है अपलक,

रेखा म॑ चपल भगियाँ मानो स्तम्भित,--

स्पीत वक्ष मे श्रतल सि घु ही प्रीति उच्छवसित।

पूण चद्र मुसकुरा रहा है विजय दप से रश्मिपाश मे. बाधे उमद रूप ज्वार का,

उपमुख अधरा पर नीरव चुम्बन अंकित कर |

दूसरा शक्ति स्फूर्ति की द्योतक है सप्राण मूर्ति यह | तीसरा वह कोन मे एकदन्त हैं विध्त विनाझ्न | वूसरा परिचप देता स्वत्त गजवदन प्रणव रूप सा | एक अहा, इधर शोभित हैं मनमोहन मुरलीधर,

१८६ / पत ग्रयावलो

में इनको ही बोज रह था कैसी स्वमिक भव्य मत है तप यही उठी

उभ कीि

गृह के निक्त्ा उरलीपर #) मृत्ति खोजन पेय हे उठा आज मपकी श्रमर कला की "पप्न सृष्टि को अजित २२ इस क्वाक्क्ष मे स्वीक्त करे >पायुवक लघु पेम्म भेंट यह रस भमुल्य निधि #| बदले-....

शिल्पो / (८७

शिल्पी कृतवृत्य हुमा मैं श्राज प्रापफे श्रद्धासिक्त मधुर वचना से ! एक तत मस्तक मेरा प्रणाम लें | दिह्पी चिर मगल हो ! दूसरा हमको भी. भ्राप्मीर्वाद दें '--कष्ट के लिए क्षमा करें इस कला कक्ष का प्रनुशीलन कर भ्राज महत प्रेरणा मिली ! --हम घिर छृतन हैं | शिल्प कला की ग्रतुल घरोहर हैं ये कृतियाँ, श्री प्रकलुप सीौदय श्रापने सजन किया है इस छोट से निभृत कुज मं--भिखिल विश्व के भ्रन्तर का अक्षय वभव सचित कर श्रम से निमम पापाणों के उर को प्राणवान कर उनमे जीवन फक दिया जादू के बल से,-- शितला हृदय में स्पश्न चेतना का कर जाग्रत तीसरा मूठ कर दिया भाव स्वप्न प्रस्तर पल्रको पर रूप चेतना से भूकृत कर निस्‍्वर जड़को धाय प्रापके श्रमर शिल्प को शिल्पी. (हाथ जोडकर) उपक्ृत हूँ मैं

(दशको का प्रस्थान)

द्वितीय दृष्य

[विज्ञाल भनोरण देवालय फा दश्प घुरलीधर की सूर्ति को प्राण- प्रतिष्ठा सम्पन हो चुकी है। ध्या का समय, मा दर श्रारतो फे समा रोह से जगमगा रहा है, बाहुर का प्रागण प्नतिथियों से लचाखच भरा हुमा है, ममल पाद्यों के साथ फीतन चल रहा है |]

गोत्त

जय मुरलीधर, जय राधावर,

जय गिरिधर वनमाली,

जय जन - मन वनमाली गुजित नीरद मुरली के स्वर कम्पित थर थर अम्बर सागर, नृत्य मिरत सब मुग्ध चराचर

तण तर देते ताली,

मनमोहन बनमाली ! स्वप्न मजरित जन - मन मघुवन, प्रपलक लोचन के वातायन, मम प्रीति ममर से अनुक्षण

रोमांचित उर डाली,

रहसे मिलन वनमाली

१८८ | पत॑ प्रथादली

निस्तल पभ्राणा का यमुना जल

इच्छाओ्रो की लहरें उच्छल,

ड्बा मन का दुक चचल मथो वासना कालिय, मभेघ वरण वनमाली '

पीताम्बर छृषि श्यामल तम पर

स्वण रेख - सी कसी निकप पर

मील गगन से लिपटी सुदर प्रथा उपा की लाली, पीत वसन वनमाली '

जय श्रनत, जय शाश्वत, भ्रक्षर,

जय जलघधघर कोमल करुणाकर

बरस रहे ग्रक्षय रस भमिभर, जय अतुलित बलशाली, देत्य दलन वनमाली | शक झतिथि जैसा भव्य प्रयोग कला का देवद्वार यह, मौन प्राथना सा पृथ्वी की उठा गगन को,--- वैसी ही जीवन्त मूर्ति है मुरतीघर की! जिनके पावन दशन से इस महाभूमि का जीवन का गौरव सहसा झ्राखो के मुख पुन उदय हो उठता, चिर प्राचीन अ्रनश्वर | वह वैभव का युग होगा निश्चय भारत का, जिसमे कल्पित हुआ पूण वध्यवितत्व कृष्ण से महापुरुष का | उस युग की समस्त श्री शोभा, भर्वित ज्ञान दशन की अदभुत महिमा गरिमा निखिल रहस भावना, कला कौशल वा वैभव मूतिमान हो उठा क्रृष्ण के दिव्य रूप में चूसरा श्रभी सुतायी पड़ती जैसे वह वशी ध्वनि निभुत निकूजों, गिरि' गहनो मे ममर भरती, यमुना की आकुल लहरों में मधु मुखरित हो निजन छाया वीथी पथ से जन-मन हरती रहस प्रीति की मिश्छल धारा बहती होगी तब इस भू पर, उर में रस के अमर स्रांव शत भरते होंगे, जन-मन को विस्मित बविमुग्ध कर ! पूण सर्मावत होगा उस युग का भू-जीवन, विशद तुलन होगा भावषा में कर्मों मे ! विश्व विमोहन मुरलीधर की अश्रमर वृल्पना लोकचेतना की शद्याश्वत प्रतिनिधि है निश्चय सीसरा काम क्रोध से कुण्ठित भवतपण्णा से लुूण्ठित प्रात्मा को कर मोहमुक्त मुरली की मधु ध्वनि जो नित ग्न्तरत्म में नि स्व॒र गुजित रहती,-- निज गोपन भाकपण से मानव प्रात्मा की

लिल्पी / १८६

$.

चौषा

सतत उठाती रहूती स्वग्िक सोपाना पर सूक्ष्म भावना के ये मे सब्चविदानदमय ! मुरतीधर थे श्रीचरणों पर घात्मापण कर शान्त वृत्तियाँ द्दो जाती, बालिय - सी मर्दित, ज्ञाग दग्य हो जाता सचित कर्मों वा फत, मलिन वासना विमुत्त हो उठता प्रन्तर मतोभूमि पर उतरे4थ श्री राम, मनुज की मनश्चतता यो विदहु कर देहू नीति से, मर्यादाएँ बाँध नीति वीं, सदाचार वी पथ प्रशस्त कर गय जनो वा मोह निया मं शाद्रिय ग्रस्त तमस की,--जीवन वी छाथा को ऊष्ष मनुज के चरणा पर कर दप विलुण्ठित | जन के प्रागा वे! स्तर पर अ्रवतरित हुए थे लतीतामय श्रीएष्ण, भावता क॑ समुद्र को मा थत कर, लालसा चपल मानस पुलिनों को निस्तल मज्जित वर, ऊघ्यय जीवन शोभा का नेवब प्लावन भर गये घरा म,--मघुर भाव में भक्त द्ववित कर, रस प्रवाह से डुवा जगत को | योगेशवर थे निश्चय पुरुषोत्तम रहस्यमय (भीतर के झ्ाँमन से संगीत के स्वर श्राते हैं)

भाव गीत

पमुना तट पर नंद नागर ने फंसी वेणु बजायी,. प्राणा में घ्वनि छायी !

चराने मैं वन झायी,

मुरली की घुन सुन प्रकुलायी,

डुवे री मानस यमुना तट, प्रीतिधार लहरायी, प्राणो०

मधु मजरित हुई उर डाली, कूक॑ उठी कोयल मतवाली, सिहरी देहू लता स्मति पुलकित प्रिय छवि री मन भाई, प्राणो

जाने कब भर श्राये लोचन,

बिसर गया सुधि बुधि उमन मन

घिरे श्याम घन, यमुना जल में छाया - सी गहरायी, प्राणो०

हिले न॑ जड पग, मूल गया मग,

बया जाने, क्या सोचेगा जग,

मुरली के स्वर में थी निस्‍्वर ; निस्तल व्यथा समायी, प्राणों०

१६० / पत प्र थावली

पांचवां

वह मच के भ्रत्तर मे प्रादर्शा का दी रुप ग्रहण बर लेती भ्रन्त सयौजित हो! घाहद्य परिस्थितियों में जब परिवतन पश्राता जीवन मन के मान बदलते रहत थुगपत्‌, इसीलिए प्राददा, जो कि मैतिक सत्यो के भूत रूप हैँ, परिवधित होते रहते वित्त !

पॉचिवाँ भ्रध सत्य यह वस्तु पक्ष ही नहीं, श्रवत्र है

भाव पक्ष भी, --जिससे आपूत है समस्त जड ) भपते ही उर की भाशृति में ठोक पीटकर सानव ढाला है इस जड वस्तु जगत वो, उसको निज श्रत प्रकाद में भाव द्रवित कर, झ्राकाक्षा के स्प्शों से शोभा कल्पित कर पर, धंट घट बासी उस सूक्ष्म भ्मृत सत्य को ग्रहण नही कर पाता जन साधारण का मन, प्रतिमा पुजतत॒ का महत्व इसलिए सदा ही घना रहगा जन मन में, जग के जरिवन में विशद दष्टि स, नतिक भ्राध्यात्मिक सतत्यें भी प्रतिमाएँ हो हैं, सापेक्ष सिद्ध होने से!

छठा श्राप मौन क्‍यों ? इस स्वर्गाय मूर्ति के सप्ठा,--

शिल्पी

प्रतिमा पुजन के महत्व पर प्रपना मत दे स्वण सम्रापत् करें आप ही इस विवाद को ! जड़ प्रतिमा तो मात्र भाव का कला रूप है ! जीवन के प्रति धद्धा, मानव के प्रति भादर, जीवा के प्रति स्नेह यही प्रभु का पृजन हे ! यह समम्त ससति ही ईश्वर को प्रतिमाह, सार रूप में वही व्याप्त हूँ निखिल जगत से मानव का मन ही उसका वावन सादर है ! उसे स्वच्छ सुदर रखना, उनत भावषां के सुमनो से भूपषित करना, उर की इच्छा को प्रभु को प्रवित करना ही मानस पूजय है ! परा शक्ति की ही प्रतिमा है भूत प्रकृति भी, सूय - चद्र - तारे जिसका नीराजन करते, सागर जिसके पावन पद प्रक्षालित्र करता, गाघ समीरण जिसे डुलाता मद व्यंजन नित पड ऋतुए जिसबी परिक्रमा करती सतत रंग - रेप के फ्लो की अजतलि स्नेह भेंट कर, ध्यान मौन रहते गिरि नदियाँ गाती भमहिमा,--- उस निसग की मचुर मूति मं दिश्य शक्ति के मित्य रूप के दशत करना ही पूजन है ' एक चेतना शक्ति व्याप्त जड़ जीवन मन में, विविध लोक शभ्रादश उसी के महत्‌ गुणोंके मृत रूप हैं,--जग-जीवन के पोपक पूरक !

१९२ | पत श्र यावलोी

श्री शोभा भ्रानदमयी वह सुजन शक्ति ही नित्य प्रवर्तरित होती रहती नव रूपो मं--- विश्व विघानी, मगलमयी, पनत चेतना '! पाँचयाँ यही सत्य है थरुग-परिवतन की फ्रीडा का, यही सत्य, जीवन की मित झॉविनव सीला का | घिर विकास प्रिय, विर समिय है जम जीवन की प्रमर चेतना, जो युग -युग मे नव रूपो में झ्रभिव्यक्ति पाती जमती के व्यापारों में | दंश जाति गन मूल प्रकृति वर अ्रनुशीलन कर, वस्तु परिस्थिति के पभ्नुख्प हमें नव युग के भ्रादर्शों की प्रतिमा निर्मित करनी होगी बाह्य विरोधों मं भर भ्रन्त साम्य, समन्वय ! घ्वस हो रही भ्राज मायताएँ युग - थुग की, मिस्र रहे फिर सूक्ष्म शिखर नव आादर्शों के, सजन प्राण मानव मन को उनके प्रकाश को मूतिमान करना होगा नव युग जीवन मे,--- मानवीय ससस्‍्कति म॑ सयोजित कर उनको युग विप्लव नव्य सचरण को सचेष्ट कर छिए्पो यही प्रदन है श्राज कला के समुख निरचय, जो दुसाध्य प्रतीत हो रहा कलाकार को वहिरन्तर की जटिल विपमताग्रो उसको नव समत्व भरना होगा, सौदय सतुलित | -- मानव उर की वद्यी नव स्वर सगति भर, आवपूण कर निखिल अभावा के जीवन को | नव्य सजन वी कूच्छ व्यथा से पीडित कब से कलाकार का हुदय विकल है नव जीवन की प्रतिमा अक्ति करने को सर्वांग पृणतम-- जनयुग की तिमम पापाण शिला के उर में | -- महत प्रेरणा का भाकाक्षी हैं थुग मानव | पाचत्रां कलाकार के योग्य महत्त्वाकाक्षा है यह ' श्राज विश्व के कोने - कोन म॑ जागृति की सूक्ष्म शकितिया काय कर रही जन के मन मे, जो प्रच्छन्त श्भी है मिश्चय ही भविष्य से नव्य चेतना विंचर सकेगी जन घरणी पर नव जीवन की शाभा गरिमा मे मूर्तित हो ! व्यय मनुज बाहर के मरु मे उसे खोजता ग्न्तरतम में स्लीत छिपा जो अमत सत्य का, आत सलिला धारा ही मे श्रवगाहन कर युग मरीचिका से विमुक्त होगा मानव-मन --- आवाहन करती युग आ्रात्मा नव प्रकाश का

(नेपथ्य से वाहित समीत के स्वर)

शिल्पी /

गीत

नव प्रकाश बन पभ्राप्रो ! जीवत के पन अभधकार को ज्योति द्रवित कर जाम्मी

झात स्मित हो मानव वा मन

घधात विश्व जीवन सघपण,

नव स्वर लहरी मे जन भू का क्रदन करण डुबाझों !

छाया मृत आ्रादर्शों का तम,

छाया जड भौतिकता का भ्रम,

प्रध वीथियो म॑ जन मत की पव विरणें वरसापो |

घृणा द्वेष को प्रीति अ्रथित कर

महानाश में प्रमृत क्वविद्र कर

अविश्वास को चिर प्रतीति में परिणत कर मुंसकाओो !

3 विदव ग्लानि में नव्य रूप धर

श्री घोभा स्वणिम समप्व भर

जने धरणी म॑, जन जीवन में भन का स्वयं वसाप्रो

एुय वेणु उर में नव स्वर भर

मूक व्यथा हर, नव मुरली घर

प्रभिनव श्री सुपमा गरिमा में धरणी को लिपदठागों |

तुत्तीय दृश्य

[शिल्पो का कला कक्ष शिल्पी यर्दे की पोट मे श्रपनी श्रधूरों प्रतिमा का निर्माण करने से सलन है उसकी दिष्पा एक ओर बंढी हुई हथिायरो

में धार चढ़ा रही है।]

दिलल्‍पी (प्रतिमा का निरीक्षण करते हुए) नयी सभ्यता जम ले रही प्राज घरा पर, लुद्र विभेदों, घुणित निर्षेधा की जग्रती के पुन संगठित संयोजित कर जन मगल हित नव भू जीवन के मासल शोभा सौष्ठव मे | उद्वेलित हो रहा धरित्री वा उपचेतन गरज रहा युग आदोलित जन जीवन सागर नव श्राशाह्काक्षा के शिवरों म॑ लहराकर,--. अतल मग्न करने जड घरणी के पुलिना को !

१५४ / रत प्रयावली

दोड रहा भूकम्प चेतना के भुवनो मे, घ्यसत हो रहा विगत मन संगठन मनुज का, भू लुण्ठित हो रहे सौध गत श्रादर्शों के छिन्न-भिन हो रही रोति नीतियाँ युगा की टूट रहे विश्वास प्राध तारो-स हतप्रभ विगत युगा के मान चित्र को मिटा धरा के !

ऐस विश्वक्रान्ति के युग में अन्तनभ में ज्योतिभप क्रिणी की रखाग्नो से मण्डित एक मनोरम दिव्य मूर्ति प्रस्फुटित हो रही नव नावो की स्वण शुशञ्र शाभा मे वेष्टित | जन भत थे स्वप्नां से कल्पित उसके ग्रवयव, निखिल विद्व की आाकाक्षाओं से स्पीदत उर, प्रीति मौन निस्तल करुणा से द्वरवित विलोचन, शात, सौम्य आनन शक्री,--जिसकी पावनता के प्रमृत स्पश से दीपित हो उठता जीवन-तम ! खिर वल्याणमयी, आभादेही वहु धीरे प्रकट हो रही प्रन्तरिक्ष में भ्रतमन के, नव जीवन की महत्‌ कल्पना सी मूर्तित हो,--- निखिल विपमताशो म॑ भरने स्वण सम वय ! शिला फलक भक्ति करना आज शिल्प को रश्मि रेस उस नव्य चेतना की प्रतिमा को, मुण्मय अगा में संवार दग सूक्ष्म स्वप्न को !

कितु हाय, मूं जीवन की निमम वास्तवता वाँध नहीं पा रही मनुज आत्मा का वैभव, मिट्टी की जडता विरोध करती प्रति पग पर नव प्रकाद के शोभा स्पर्शों के प्रति निष्किय!

कुण्ठित हो उठती फिर फिर उदश्रात कत्पना !

अज्षिष्या श्राप व्यय उद्विग्न हो रहे अपने मन में,-- भला कौन -सी वह विदग्व कल्पना रही है जिसे आप साकार नहीं कर सके शिल्प अपने कला कुशल हाथी से सदा सूक्ष्म से सूक्ष्म भाव भी भलक उठ प्रस्तर के मुख पर में कहती हू, आप हृदय की धड़कन को भी प्रस्तुत कर सकते पाहन मे, प्राण फूककर |

क्वित्पी एक बार फिर प्रयत्न बर देख बेटी, बज्प्राण पाहन यह सम्भव, द्रवित हो उठे ! युग युग के जड सस्कारी में जड़ीभूत जो जन भू के निश्चेतन का निष्प्राण शिला तद, जिसके अणु परमाणु बँधघे निमम्म घनत्व मं गत अभ्यासों के निष्क्रिय श्रालस से कुण्ठित,---

शिल्पी / १६५

नव्य बेतता के सक्रिय स्पशों से उसको

पुनरज्जीचित करना है नव मनुप्यत्व में

(छेनो लेकर शिला फो गढ़ने मे व्यस्त हो जाता है) गीत

जन भर पर उत्तरो यगरुग मन्न की पाषाण शिज्ञा को करुणा द्ववित करो !

घृणा द्वेप से पीडित भू जन,

देन्य निराशा से कुष्ठित मन,

युग विपाद को चीर, व्रिणमयि, अन्तर में भिसरो !

स्वप्नमयी, विहेंसो पलकों पर,

भापसयी, विलसों नव तन घर,

नव श्री सुपम्रा मे मूतित हो चिमयथि झ्थि, विदरी

जगती मन मे छवि रेखाएँ

कॉंपती ज्यो शत दीप शिखाएँ,

जग जीवन की वाहां म॑ बेंध उर का शुय भरो।

खोलो हु, मुख का अवगुण्ठन

कद से अ्रपलंक तकत॑े लीचन,

ग्रथवकारभप पथ ज्योतित कर नवे पदचिह्ध घरो !

नव प्रतीति भें कर उर गुम्फित,

नव श्राजश्षा से जन मन कुसुर्मित,

भू की जडता को चेतन कर जग का न्ञास हरो !

शिल्पी (प्रतिमा को ध्यानपुवक देखते हुए) आह, अत में दष्टि जय पाहुन पंलंको पर मुत हो उठा स्वर्ण स्वप्न मानव अंतर का ! अवश्रव की रेखान्ना मे साकार हो उठा सानेव झात्मा का अ्रवाकू सौदर्य अ्रकलुपित अऋलेक उठी जन मानवता की भव्य कल्पना विस्मय अ्पलक दुश्यपटी में मूर्तिमान हो! भू जन का उज्ज्वल भविष्य भणखोके समुख उदय हो उठा चीर थ्रुभो का भ्रध आवरण स्वगिव श्री सुपमा में ही अ्वर्तारित शिला पर मातृ बल्पना ने संजीव कंर दिया दश्य को! ईश्वर, मेरा स्वेप्त मनोरथ पृ" हो गया

१६६ | पत प्रयावल्री

दिष्पा (मूर्ति को देखकर साह्लाद)

जाग उठा पापषाण हुदय जीवन-चेतन हो, युग-युग का जड मौन हा उठा गति से मुखरित कसी जीवित भावपूण प्रतिकति उतरी है, दपण पर बिम्नित हो तद्बत निखिल दद्यपद | शिल्पकला निज चरम शिखा पर पहुँच गयी है, प्रस्तुत यह प्रादश निदशन मूर्तिकरण का पट का जड व्यवधान हटा दू श्रब प्रतिमा से | (पर्दे को हटाती है ) कलाकक्ष हो उठा नवल गौरव से मण्डित | लो, मुहृत ज्यां देख, थ्रा रहे दशकंगण भी ' (दश्षकों का प्रवेश) एक अभिवादन | क्या पूण हो गयी कला सृष्टि वहु ? जक्षिष्पया उधर देखिए, कलाकक्ष के मध्य भाग में होल शिखर ही शिल्पव॒ला के पख मारकर उडने को उद्यत है नव चेतना स्वग में | मैं ग्रव तक सवरण कर पायी निज विस्मय | बदूसार आप सत्य कहती हैं यह प्राइचय है महत्‌ शिल्पकला का ! मुग्ब दष्टि अनिमेष हो उठी ! जन मन का सागर ही जीवन हिल्लोतलित 4. घनीभूत हो गया अलौकिक दश्यपटी में | गति से, अविरत गति से स्पादत लगता पाहन, > अ्रविरत गति ही सूक्ष्म रूप हो जैसे जड का ' मौन हाथ लग रहा मुखर जीवन शोभा का, युग आवेशों से झ्रादीलित लगती प्रतिमा ! दीप्त मुबो पर खेल रहे शत भाव हृदय के, दढ अगा में फलीमृत-सी शक्ित स्फूर्ति नव ! फूट रही युग जीवन को गआ्राशाकऋ़्काक्षाएँ जनगण के झ्रानन॑ से, नव गरिमा मण्डित हो ! (जनरव) छ्लिष्या अरे, कौन भरा रहे इधर श्रमिको कृपकां के जननायक से ? हृदय शान्ति का कम्पित करते कुद्ध पुकारा से-- शिल्पी उनको झआ ने दो बेटी ! (जन-समूह का प्रवेश)

एक स्वर हम मूं की सगठित शक्ति है, हम धरती की क्रान्ति भरी उठती पुकार हैं हम देखेंगे,

झ्राप यहा स्वप्नो के सुदर मीड म॑ छिपे

कौन मह॒त निर्माण कर रहे जनगण के हिंत !

चूसरा स्वर मध्य वग की या आातप्त वसाना पूर्ति के

शिल्पो / १६७

तोसरा स्वर

दूसरा स्वर

चौथा स्वर

शिल्पी

वश

कं

अ्रध नान, कुत्सित, शुगारिफ चित्र गढ रहे १, दुख देय से जजर जब जनगण का जीवन,---.. कुलाकक्ष में बैठ, निमृव कल्पना स्वग मे, श्राप व्यस्त हैं, यश को तिप्सा से प्रेरित हो, निदय जड पापाणो को कल्पित करने मे, ग्रात्म भाव रत, जीवित जनता से विरक्‍्त हो ! मधुर व्यजनों से कर भ्रपतती उदर तप्ति मत ग्रात्मा के हित खाद्य खोजते आप निरन्तर, ललित कलाग्रो से पोषण कर शअ्रपने मन का, सस्कारा की शोभा में उसको लपेटकर कितु, झरने उपजादे जो हम धरती से लड, गठते बहु प्रासाद, भवन, कदम में समकर, हमे चाहिए क्या मबुर आत्मा का भोजन ? क्षुघापूति करते है यदि हम सम्य जनो की, उद्दे चाहिए, भाव पूर्ति वे करे हमारी,-- हमे सभ्यता दें बदले में, और कला की जन उपयोगी मधुर देन से जन के मन को नव जीवन शोभा मे वेष्टित करें ! कितु उफ, अन्न वस्त्र का भी प्रभाव है हमको !' यद्यपि हम ही अपने भुजबल से उत्पादन करते, श्रान्ति स्वेद में लयपथ, पालन करते जग्र का ! यही सभ्यता क्या इस थुग की ? यही “याय है ? कहाँ खोजते 'याय यहाँ हम जो धरती के प्राकृत शिल्पी हैं, जो भू के निमम उर को जीवन हरियाली में प्राण प्ररोष्ित करत, प्रपने अनगढ कर कौशल से,--कल को हम हीं जन मन के शोभा शिल्पी भी होगे निश्चय,--- हम उपजेंगे भावी स्वप्ना के स्रप्दा,. नवल प्रेरणा म्पर्शों से रोमाचित प्रन्तर,-- नव विकसित मस्तिष्का हुदयों के वैभव धरा चेतना को उबर करने मे सक्षम लोक नियति भिमायक, जाग्रत्‌ कलाकार बन हम दरिद्रता को कर देंगे भू निर्वासित | यही जनोचित स्वाभिमान है कला चेतना लोक जागरण की कब से कर रही प्रतीक्षा | कला प्रभी तक सकेतो का सृजन कर सकी, उसे वास्तविकता वनना हे भू पर व्यापक! स्वागत करता हूँ मैं जन का | प्राप देपिए, मेरी नूतन प्रतिमा जन मन की दपण है ! इधर किसान खड़े हैं, घरती के प्रतिनिधि-स, स्वण शस्प डाली सिर पर घर उधर श्रमिक हैं. नवयुग जीवन के निर्माता, हृप्ट पुप्ठ तन,---

१६८ / पत प्रयावलों

निज वाौहा मैं भूगोलक को लिये गेंद-सा

परी के नीचे उद्देलित जीवन सागर

युग सघपण, जन आकाक्षा का द्योतक है !

ऊपर जैसे नव आशा का क्षितिज खुल रहा

मोन ममरित पलल्‍लव दल के पअझ्रतराल से। जननायक चमत्कार है निश्चय अद्भुत शिल्पकला का दशक ये अजेय इल बैल, लोक जीवन के सम्व॒ल, जो घरती की निसंम जंडता को विदीण क्र

प्राण प्ररोहो में पुलकित करते भू का उर !

यत्र शक्ति है उधर, प्रगति सुचक नव युग की,

इधर हथौडा विश्व विपमता चुण कर निखिल

नेव समत्व भर रहा विरोधो मे जीवन के !

जन गीत

जन धरणी का बल है हल, जन - मन का सम्बल है हल ' साथी सजग हथौडे हँसिया जिसके कमठ कला कुशल पृथ्वी का पँगम्वर बन हल श्राया, नवल सम्यता का प्रभात सेंग लाया, हल ने चीर जमी का सीना मानव का घर -दह्वार वसाया स्वण धरा का बल है हल जनता का सम्बन है हल, साथी सबल हथौड़े हेसिया जिसके कमठ, कला कुहाल ! लौह नियति को ठोक-पीटकर प्रतिक्षण घन ने निर्मित किया महत जग जीवन, लुन-लुन॒कर नित शस्यों के स्वर्णिम कण हँसिये ने हुस भरा भाड मे भूधत ! कठिन तपां का कते है हल, प्रथम कलो की फल हैं हल, जीवन की रोटी, घरती का राजा, अटल भप्रचल हे हल मातभूमि का वल्चन॒ है हल, जनगण का सम्बल है हल, भाई सगे हथौड़े हेंसिया जिसके कर्मठ कला कुशल दशक घयथ हो उठा कला कक्ष इस जन उत्सव से

(प्रतिमा को लक्षित कर)

काल चक्र यह घूम्र, नव्य युग परिववन को सूचित करता ग्न्तरिक्ष मे नव युग का रवि

शिल्पी | १६९

उदय हो रहा जिसकी स्मित किरणा से मण्डित घरा स्वग के मध्य खड़ी गोलाध सेतु पर नव्य चेतना की प्रतिमा शोशित है निरुपम स्व शालि वह लिये वाम कर म, दक्षिण कर भ्रभय दान दे रहा वरद मुद्रा मे उठकर,-- विजय ध्वजा-सा अचल फहरा रहा क्षितिज मे ! तीरव करुणा ममता से स्पादित वक्षस्थल दिव्य शान्ति है घरतस रही स्मित मुख मण्डल से, ध्वस पभ्रश हो रूदि रीतियों के जड बाधन चरणों पर हैं पढ़े छिन्‍त खुखता कडीन्‍से !

शिल्पी लोक सोहिनी विश्व दालति की मनोमूर्ति यह्‌

कुछ स्वर

दशक फुछ स्वर वशक

फुछ स्वर

प्रश्निव श्री छ्योमा गरिमा में जाग रही जो घरा क्षितिज पर, जंग जीवन के वपम्यों को निखिल समन्वित करने निज निसीम वक्ष में ! शाइवत्त करुणा यह, जिसके प्रिय सकेतो पर अमर प्रेरणाएँ भरती रहतों धरती पर, सेव नव झादशों, मे, मुल्यों में कल्पित हो प्राज वहिमुख बिसखरे जन - भू के जीवन को झ्रत के द्रत, अन्त संयोजित कर फिर से नव समत्व में बाँध रही वहूं जोवन मासल ऊध्वग व्यापक लोक - चेतना म॑ विवसित हो! ! मातव केदद्रिक है जीवन का सत्य चिरतन, मानवीय महिमा में मूरतित हो स्वर्गोपम, युग जीवन के अधकार को अमत स्पश से नव प्रभात में बदल रही वह स्वणिम चेतन निरचय, यहु॒ जन के मन मन्दिर की प्रतिमा है, जन प्ाकाक्षा की प्रतीक, जन जीवनमग्र हैं! सामूहिक चेतना हो उठी मभूतित इसमे, शवित स्फ्ति विश्वास भरेगी यह जन मत से! हम इसके हित प्राणा का बलिदान करेंगे, भू जीवन मे प्राण प्रतिष्ठित कर इसकी छवि निज कर्मों, में मृत करेंगे इसका बेभव |-- शुग तक गायेंगे जनगण इसकी महिमा! बह्व शान्ति की प्मर चेतना की चिर जय हो नव युग जीवन की शोभा प्रतिमा को जय ही | युग निमम परापण शिता मे जिसने अभिनव प्राण भर दिये निज शाइवत श्रन्त प्रकाश से,-- जग जीवन को मात चतना की चिर जय हो। लोक शकिद की जय हो, नवयुग श्री को जय हो ! समवेत गीत जयति जयति मात मूत्ति, दान्ति चेतने!

२०० / पत प्रयावत्तो

जयति लोक शक्षित, लोक

मुक्ति फेतन नव युग जोबन प्रभात निपरी छुम ज्योति स्वात, स्व रश्मि स्फुरित गात,

नास्वर पदने ! धरा देन. बना गाने हृदय स्वप्वन मूतिमान, गूज उठे मूक प्राण

जन दुस झमने सफल हुए योग ध्यान सफ्ल बकत केस शान सिले मनस्‌ कमल म्लान

भव तम प्रशन ! रुद्ध भाव हुए मुक्त मानव सन प्रीति युक्त शान्त रक्‍त पर्क युद्ध

गति प्रिय चरण ! बरस हिम घुप्र शान्ति मनिसरे फिर दिव्य कफान्ति, भू - मन की मिदे श्रान्ति

जनगण शझारणे!

शितपी /२०१

घ्वस-शेष (नव जीवन-निर्माण का स्वप्न)

वृद्ध

पुरुष प्रकृति नागरिक सेनिक द्र्प्टा प्रतिनिधि

प्रथम ददय

[विस्तृत राजमायम डके की चोट के साथ ध्वनिप्रको (लाउड- स्पोकर) द्वारा राजधोषणा हो रही है। एक और से कलावुद्ध का प्रवेदरा, जो ज्ञात का-सा प्रतीक लगता है। वद्ध, ध्वनिप्रको के घोष से प्रस्त होकर, कानों पर हथेली दिये, राजमाम के किनारे एक बडी-सो कोठो सेश्रहाते मे घुस जाता है ।]

(राजघोषणा)

शात रहो हे भरू-जन, व्यय न॑ धय गँवाश्रो, विश्व युद्ध की आशका मन मत लाझो आतकित मत हो जो जन में मूंठा रण भय॑ मिथ्या जनरव फलायंगे, राजाज्ञा से दण्डित होगे सावधान सब जन हो जाओ शान्त रहो हूँ, थोथी श्रफवाहे उडाग्रो राजाज्ञा यह, सव जन सावधान हो जाओ ! (डक की चोट) वृद्ध (कमरे से प्रवेश कर) कहाँ श्रा गया हाथ, ते जान, राह भूलकर भटक गया बाहर के जग मे ! ठीक कहा है, मूल भुलय्या यह दुनिया! धोखे की ट्ट्टी नयी सभ्यता! इहू ससारे खलु दुस्तारे कृपया पारे पाहि मुरारे! भज गोविद, भज गोविद, गोवि भज मूढमते। ग्रह, जाने कसी धूम मची है राजमाग मं! बहरा हो जाऊँगा मैं, इन ध्वनि-यातरो के विकेट नांद से, विस्फोटक से फूट रहे जो! युवती (उठकर) शाति ! युद्ध का भय फैलाते आप नगर में विस्फोटक के फटने का भिथ्या प्रचार कर दण्डनीय अपराध हो चुका है यह घोषित राजाना से चंद (घबराकर ) क्षमा करें अपराध देवि, मैं बाहर के कोलाहल से मन मे घबडाकर ग्रनुमति लिये बिना ही झ्रादर घुस आया हूँ

शिल्पी | २०४५४

बढ

पदतोी हो

युवती

बदू

युवती

चद युबती

पब-धर करता हृदप नगर की रेल-पत्र स! उफ, फप्ता जन प्रान्दोजनन, केसी हसचल है ! यही हाय, नागरिका वा सस्गृत जीवन है? (सहाए्य)

दयादृद्ध हूँ श्राप, व्यय या विचेलित मत हु, घान्त, सुस्थ हो, उधर बंठ जायें भासन पर !

(स्वस्थ होकर)

भाप यान हैं देवि, यहाँ मैं कहाँ प्रा गया ? समाचार पत्मा का वार्यालय हूँ यह क्या ? नही पिता, यह युग वा मन है वंस इसको कायालय ही समर्थे !

(साइचप ) ईश्वर |

विश्व शी थी नयी सम्पता हूँ मैं, जिसके सकेदो पर मिछिल विश्व जन नाच रहे हैं मन्ममुग्ध हो /

(विस्मय पिसुढ़ बया कहती हो बेटी, यहू वया युग का मन है? टूट फठे, दीमक के खाय खाना वा, घूल भरे गंदे कागज पत्रों में लिपटा, कटे-छेटे असबारों के परनो - सा बिखवरा, घडे-वडे खातों, भारी भरकम पोथो से भरा ठंसाठस, युग का मन है ? रीढ #ुकाये जीण पुलिन्दा के घोका से !। सच कहती हो ? प्रस्तथ्यस्त, कूडा कचरा यह युग का मन है? पिता, यही ग्रुग का मन, युग मानव का मन है ! श्राप दुभा झ्ाइचय मत्त करें ! (पघ्िर हिलाकर) सबनाश है ! ! इसे अजायवंघर समभभे या चिडियाखाना ! इसके सकरे खाना में प्रतिदिन की चौोडी घटनाएँ हैं ठुसी हुई, सब छोटी - मोटी देश विदेशों की,--धरती, आकाश, सिधु वी ' जग के क्रिया कलापो का भण्डार यह वहुदु--- आप इसे ग्ोटाम कह या कुडाखाना ! (बद्ध सिर हिलाता हैं) पर, भू जीवन की कुरूप कद वास्तवता का इममे निमम परिचय सबचित है दिग व्यापक ! जीवन सघपण का तीखा कडओआ अनुभव, रूढि वृद्ध युग युग का पथराया विस्मत मन बडे यलपुवक सरक्षित किया गया है

२०६ | पत प्रयावलो

इन विपण्ण सानो मे जड प्रवसाद भरे | युद्ध कैसा रिक्त प्रदशनन थोथी बोढिक्ता का! ! युवती प्ाष नयानक गूज यहाँ जो सुनत्त प्रतिक्षण समाचार यत्रा ये! हलचल की ध्वनि हैं वह, यहन कर रहें जो सम्बाद विविध देशों के, मनुज नियति पर दाँत पिटक्टा फ्रोध फीक से! वायु माग स, स्िघु माग सं, भूमि माग से नियिल विश्व जीवन वा मन का स्पन्दन बम्पन प्रचित वाहित हो, प्रान्दोलित करता रहता प्राज धराजीवी मनुष्य के आहत मन को,-- जजर जो हो रहा सतत विद्युत दशन ! युठ (रुफ़रसि स्थर मे) हाय, प्रभागे मानव की ऐसी घिडम्वना | ! युदती मू विस्तत हो गया, पिता, मानव का प्रतर, उसे पात अभ्रव रूस, चीड, जापान में वहाँ नव क्या है हो रहा, विविध भू के नागा मे ! प्रथ'ः लन्दन, यूयाक पैंठ थाना वे भीतर भनभन वरत रहते वबरों के छत्ता स,--- पेक्गि मास्वों सब ग्रोठा पर हैं जन जन वी --- धरा प्रामलक-सी करतल सर सम्य मनुज थे ! बूंद वया बरती, बंटी, दुमुस कक्‍लें निरतर घृणित जतुपम्रों-ली विपमय फुफ्कार छोडती ? मुनगा-सी भुनभुना दादुरा-सी ठर्रा कर! युवती विद पक्षिया ली ये भपन प्‌ छटपटा ग्रातनाद बरती सब माथा ठाव-पीटवर-- कप-कोप मन में मानव मन की निदयता सू॑ ! ये कहती हैं पिता, प्राज सब देश धरा के लोक सम्यता की, सस्कृति वी, मानवता की उच्च पुकररें लगा, लोह प्रावरण डालकर शुक्र शान्ति की छप्म श्रोट में महाप्रलयथ का खर ताण्डव रच रहे भयकर भझणु दानव को पाल-पोसकर, समर सगठित कर जन-बल को ! बत्ध (झनुपात से)

प्रहा, आसुरी हाथो भे पड गयी शक्ति किर ! ! सुबती विगत युद्ध में प्रजातन की रक्षा के हिंत जूफे थे भू राष्ट्र, रक्त में ध्वजा डुवांकर, दप दल्लित करने दुमद फासिस्त शक्ति को,

भौर सदा के लिए समापन करने रण को ' कितु झाज सव जन मगल के आकाक्षी बन विश्व शान्ति के हेतु दीखते भावुल उच्चत, श्रौर बढ़ाते जाते सेनिक शस्त्रा का बल,-- झणुबम के, श्रतिवम के बिना थिजय मोदक बहु !

शिल्पी | २०७

आज शान्ति के पीछे पागल है पभ्रशान्त जय || वृद्ध देख रहा हूँ बेटी, मैं मन की श्रास्रा से अनति दूर, भीषण धूमिल दुग क्षितिज जगत का ! कृप्णाय॑ पखो में उडकर चला प्रा रहा महानाश का घन मं पर शोणित वरसाता | | शात पाप हो जग्र के! मेरे वद्ध उदर में अवचेतन का गह्दर कभी उमड़ उठता है। पर मानव शासक है मूं की अध भियति का पिघला सकता लौह वच्च की निममता वह झौर बदल सकता मू पथ जीवन प्रवाह का ! देख रहा मैं, देंत्यावार प्रलय का बादल उदय हो रहे स्वण धिम्ब पर मद मोहित हो दोड रहा है उसे लीलने, कितु साथ ही उसकी स्वणिम आाभा मे चेतना द्रवित हो युग प्रभात की नव शोभा में सुलंग रहा है समझ रहा हूँ मैं युग के कटू सघपण को ऊध्वग समदिक सचरणा के बीच छिडा जो ग्राज धरा मे, भौतिक आध्यात्मिक विप्लव बन ध्वस्त हो रही जीण मायताएँ जन मन की, बदल रहा जग जीवन के प्रति दृष्टिकोण प्रव, छंटता जाता भय संशय का घना कुहांसा, जम ले रहा मनुष्यत्व नव अ्रतरिक्ष मे,-- मनुज जाति को भू जीवन का नव वर देते * विजयी होगा मानव या नरक युग दानव पर, तवल वास्तविकता निसरेगी भौतिकता से -- नव आध्यात्मिकता का स्वणिम सजीवन पा! युवती पिता, आपके वचनो को सुन कप उठता मन, ओर हप गदगद हो उठता कातर अन्तर ! रक्‍त स्वेद के पक में सनी आज मनुजता, नात नहीं, कब होगा भू पर बह स्वर्णोदय ! चुद्ध नियत समय पर सब कुछ हो जायेगा बिटिया, निकट झा रही धीरेग्रव निर्दिष्ट घडी बह, जो मानव अतर मं कब की जम ले चुकी धय घरो, सब मगल होगा ! अच्छा, बेटी, ग्रब॒ मैं जाता हैं, थोडा विश्वाम कखूँगा ! (वृद्ध का प्रस्थान) (राजमाग पर नगाड़े को चोट के स्राथ दूर सश्ाते हुए राज घोषणा के स्वर सुनायी देते हैं ।) शान्त रहो हे मू-जन, व्यथ धेय गेंवाओं, विश्व युद्ध की आशका मन में मत ला | शान्त रहो सब, कूठी अफवाह ने उडाग्री, राजाना यह सव जन सावधान हो जा्रो!

२०८ | पत प्रयावली

द्वितीय दृदय

[विप्लद्सूचक भीम करुण वाद्य संगीत एक विशाल नगर का खेंडहर नेपथ्य मे श्रणु विस्फोटकी के फूटने को भयानक ध्वनि पृष्ठभूमि फे पट पर भहाध्वस्त की विकराल छाया पडी है श्रग्ति फी लपटो में लिपटे रगोन घुएऐं के वादल उमड रहे हैं सुद्र से वाहित ग्रीत के समवेत् स्वर, धोरे धीरे स्पष्ट होक र, सुनायी देते हैं।]

गीत

प्रलयकर हे, डम डम डम्र डमित डमझ दुदम स्वर हे ! दहक उठी नेन ज्वॉल, फूहुंक उठा उरस व्याल, लहक रहा विप कराल, भव भय हर हे | उगल रहा अग्नि व्योम रच रहा विनाश होम, घुमड रहा तिमिर तोम लहर हहर हे ! घ्वस शेप भू दिगन्त, एक वत्त हुप्ना अन्त, आर मुक्त झव ग्रनन्त, जग जिल्वर हे! भस्म स्वाथ कलुप शोक, घ्वस्त नगर ग्राम ओक, निखर रहे नव्य लोक विश्वम्भर है ! भौतिक मंद हुआ चूर, मानस धश्रम हुआा दूर, चेतन मे उठा पुर शिव छझिवतर हे (प्रततरिक्ष मे पुरुष प्रोर प्रकृति का प्रवेश पुर ज्योति रश्मियों से भ्रावृत्त, प्रकृति इद्रधनुपो छाया से वेष्टित है ।) प्रकृति देख रहा दु स्वप्न हाय क्‍या धरती का मन | महाष्वस-सा छाया कसा घोर चतुर्दिक्‌ ? गहरा रही प्रलय की छाया जन धरणी पर ग्रंधियाली के डाल भयानक मधघ पक्‍्रावरण ! उद्देलित हों उठा धरा चेतना सिश्चु क्यो प्लावित करन झन्न प्राण मन के पुलिनां को? नील सरोरुह-सी झरुम्हलाकर म्तान दिशाएँ महएून्य की पल्का-सी मुद रही तमस मे!

न्क़्पा २०६

लील रहा घन भ्रधकार भगभीत ज्योत्ति का,

छिन्‍त भिन कर किरणा के भीने सतरंग पट

धुधली सी पड रही रूप रेखाएँ जग्र की

ढाँप रहा क्‍या विश्वग्लानि से निज विपण्ग मुख ?

घ्वत अ्रछ् हो रहे सघटन जड भूतों के

समारधिस्थ-सा आज हो रहा स्थूल जगत क्यो ! (विप्लच सूचक बाद्य समीत])

प्रसलय बलाहुक प्रा धिर घिर कर विश्व क्षितिज में गरुत रहा सहार घोर म्थित कर नभ को, महाकाल का वक्ष चीर निज श्रद्टहास्य से धत शत्त टारण निर्घोषा म॑ प्रतिध्वनित हो अगषित भीषण बच्च कड़क उठत अम्बर में लप लप तडित शिखाएँ टूट रही घरती पर, महानाश स्टिकिटा रहा कटु लौह दन्‍त मिज विकट धुम्र वाष्पा के श्वासोच्छूवास छोडकर ! रंग रंग के लपटा की जिद्धाएँ लपकाकर हरित पीत, अ्रारकद नील ज्वालाओआ दे घर घुमड़ रहे विद्युत घोषों के पख मारकर ज्यलित द्रवो के निकर वरसा अगिति स्तम्म से ! घूधू करता ताम्र व्योम, धू घू जलती भू, धूधघू बलती दिशा, उब्बलता धू-धू सागर, भभक रही भू को रज, दहक रहे गल प्रस्तर, सुलग रहे वन विटपी, धधक रहा समस्त जग ! (सहु(चिष्वससूचक वाद्य समोत)

अग्नि प्रतय क्या हाय, भस्म कर देगा मनु की इम सु दर मानसी सुष्टि को, जिसे जल प्रलय॑ मग्न नही कर पाया दुस्तर महा ज्वार से | विचर रही छाया5कृतियाँ - सी' कैसी भू पर ? प्रेत जीक' खुल गया आज चया मत्य लोक मे ! स्वप्त देइय से श्रोमल होते ग्राम पुर नगर, चित्रित हो यह माया जग चल छाया पट पर | भूतों का पिण्डित धनत्व गंल तडित स्पश से धूम वाष्प बनकर बविलीन हो रहा निमिप मे कया स्मृति मे ही दोप रहेंगी ध्वस सप्द्धि पश्रव दश्य, स्पश, रस, ग/घ, शब्द गुण से विहीन हो ? कृसे आया महानाश इस प्रबल वेग सं? हाय, कौन-सा महादत्य वह छूट नरक से भष्ट भ्रष्ट करता निसंग को पदाधात सं ! पुरथ महिपासुर त्तारक, वत्रासुर से भी भीपण महाकाम यह अणु दानव उड़ रहा गगन मे, धूमिल दह फुला प्रचण्ड जलते वाष्पा की

२६१० | पत प्र थावलो

किमाकार पावक के पवत -सी रोमाचक ! जड भूतां की मूल शक्ति से अनुप्राणित हो उगल रहा वह मलते द्रव्या के जलते घन निगत कर नथूनों से शत विंपम्रय फु्त्कारे दारुण गजन से दिक्‌ कस्पित कर अनन्त को ! शत शत तडित प्रपातो सा वह टू ध्योम से रौद रहा जन भू को निमम लीह पदा से, सस्‍त ध्वस्त कर क्षण में जडभूतो के अवयव चूण चूण कर अ्रडिय भूधरों के दंढ पजर | मदो मत्त व6, विकट हास्य भरता दिग्दारक सहानाश का खर ताण्डव रच नस्त भवस से,-- विद्युर शला स॑ विदीण कर बरा वक्ष को घध्वस भ्रश कर निखिल सृष्टि को महावेग से ! त्राहि नाहि मच रही झवनि भे, अगन पवन में नाहि जाहि कर रहे सकल जल यलचर नभचर रुंघ रुँध जाती प्रात उरो की भग्न पुकारें घ्वनि की गति से कही प्रखर है वेग दत्य का

(बिप्लव भजन)

प्रकृति क्‍या होगा तब देव, हाथ, इस भूत सष्टि का, रूप रग रेखामय मेरी निरुपम हूत्ति का? मुम्ध प्रेम के पलवो पर सौ दस स्वप्त -सी मोहित करती रही सदा जो स्वग्ग लोक को! विश्व प्रभव के सूजन हुप से पुलकित होकर सूक्ष्म स्वूल के छायातप को गुम्फित कर नितत जिसमे मैने झपने रहस कला कौशल से सीमा में मि सीम, अचिर मे॑ बाबा चिर को, मृत्यु तमस में गूथ अ्रमरता के प्रकाजश्ष को चेतनता को अ्थ ध्वनित है विया शब्द भे ! अपने उर के रक्‍त दाने जिस निसम को थ्रुग युग से अविराम स्नह श्रम से सिचित कर विकसित मैने किया नित्य नव श्री सुपमा म॑ रूप गरुणो के सतरंग ताने-बान भरकर !

(सुज़न श्रान योतक दाद्य सगीत)

कैसे प्रहसित हुई मीलिमा मौन गगन की घरती को रोमाच हुआ कब हरियाली म, कैसे नाच उठी सागर उर मे हिल्लोलें, अवचनीय है मम कथा उस रहस सूजन की मुझे याद है सुधा कलश -सा पूण चाद्ध जब रजत हुए से छलक उठा था प्रथम उपा के सुख पर सहसा जब लजु वी लाती दोडी इुद्घघधनुप के सेतु टपा जब फेनिल नभ मे

चिल्‍ल्पी / २११

अभी-म्रभी तो फलो के अपलक दुग अचल थ्राकाक्षा से रेमे स्वप्न भावनावेश मे, समा सकी प्राणा वी आऊुल सुरभि उर मं, कोयल का आवेश स्वरा मे फूट पडा दात |

(फरुण बाद्य सगीत)

कैसे म॑ भ्रमरो की इस प्यारी ससति का देख सबूगी करुण ध्वस आसुरी क्षषित से, जिसको मेने मा को मदु ममता क्षमता से सतत संवारा निज श्रतर के निभूत कक्ष मे! तडित्‌ कोप से दविघटित हो भौतिक विधान सब वाप्प घूम वन त्तितर बितर हा रहा तुय मे, खौल रहा भअ्रणु विगलित जड़ द्रव्यों का सागर सूय खण्ड ज्यों दूट घंस गया हो धरती मे ! उमड रहे दुम पूर्ण उच्छवास विपले धरा गरभ को अग्नि फूट झ्रायी है बाहर, गूज रहा श्रह, महामुत्यु संगीत चंतुर्दिक चकाचोध में बिखर रहे तश्लत्र पूज हो! उमड रहे दैत्यों -से भूधर घरा गभ से हिल्लोलो से उठ गिर, क्षण भर मे विलीन हो महा प्रवल अणु के विघात से दीण धरित्री खण्ड-खण्ड हो रही गिकत मिट्टी के घट सी | (धिदुव प्रलयसूचक वाद्य सगीत)

कस हाथ, रहेगा विचुत ताडित भू परु कोमल मासल, भांभा देही दुबल जीवन, जिसके भुख पर खेजा करती मुकुलो की स्मिति, चितवन मे पलती झोसों वी मौन सजलतता, जिसके उर में स्वग धरा का चेतन वैभव ऋरीडा करता गरहस भावनाओं में दोलित !

गो जीवन सौदय, जहा तरू के पत्ते भी भरते नित शाश्वत सुख वी नीरव गति लय में, मिज नया में मूंद विश्व की श्री सुदरता स्वप्तालंस पलकों से भप #प, प्रम मग्न हो! भो विराद सौदय, निभत जिमके ग्रन्तर मे शत रवि शशि ताराग्रह ज्लीभा स्पा दत रहते, उपा भावती खोल स्वण बातायन नभ का, रजत चाद्रिका शुत्र शाति बरसाती भू पर | हाय, भ्राज क्या विधि के निष्ठुर भञ्रू दिलास से मुरभा जाझोगे तुम अ्रसमय घूलिसात्‌ हो? जीव जगत की, मनुज लोक की दुलभ शोभा लुप्त निखिल हो जायंगी कंदु कान गभ;

२१२ पत प्रयादती

जीवन की चेतना नब्द हो जायेगी क्‍या निश्चेतन के अप्रकेत तम म॑ विकीण हो !! किसने जप दिया इस्र दुमद अणु दानव को, कौन वच्च की कोल रही वहु विश्व घातिनी ? किसने दिक सहार बुलाया जन धरणा पर, कहो, कौन वह नारकोय, भू जीवन द्रोही पुदष कातर मत हो प्रकृति, तुम्ह यह मर्त्यों की सी करण बलीवता नरौी सुहातों, शांत करो सन ! भूत प्रलय यह नहीं, मात्र यह सन क्रान्ति है, आरोहण कर रही सम्पयता नव शिसर्रा पर अभतमन की ही विभीपिका बाह्य जगत पर प्रतिविम्बित हो रही नयावह, भाव प्रताडित भौतिक भअ्रणु यह नहीं, दलित मानव आत्मा का ्यायथ कोप ही दृढ़ रहा परायक प्रपात सा जीण घरा मन के खेंडहर पर, जो युग युग से मनुज दंप की घृणित भित्तियों में विभवन है ' प्राज युगा के रुद्ध मूक मानव भ्रतर का विकट नाद लगकार रहा निज मनुप्यत्व का, संघपण चल रहा घोर मानव के दर में यह विराट विस्फोट उसी वा राम दूत है

अक लोभ थ्रादि को बोनी फुछ्प छापाक्ृतिया कुत्सित चेष्ठाों के झभिनय करतो हैं जिनके ऊपर एक विराट घन को छाया भूलकर, चोद फरती है ।)

मानद ही है सर्वाधिक मानव का भ्क्षक, भौतिक भद से बुद्धि आतति युगजीवी मानव दानव बनकर आत्मघात कर रहा श्रध हो ! चोपक शोपित में विभक्त अ्रव युग मानवता, जातियाँति में, वर श्रेंण भें शतश खण्डित, घनिवा! का श्रसिको का, धन बल का जत चल का यदु अ्रन्तिम दुघप समर है दिदव विनाशक --- सामूहिक सहार तिकत विपफल है जिसका * जाग रहे है भ्राज युगो के पीडित छोषित टाय दुष्र के जड़ पजर, नव युग चेतन हो कम मुश्ल जंग जीवन के श्रमजीवदी शिल्पी लोक साम्य निर्माण हेतु सब एक प्राण हो! दूट रही वटु लौह श्ुसलाएं जनग्रण की भू रज जीवी प्रावक कण हो रह प्ररोहित, झ्राज रुद्र मिज अ्रग्नि चक्षु फिर खोल प्रज्वलित भस्म कर रहे भू का कल्मप दृष्टि ज्वाल से झवचेतन के मनोज्ञान से पीडित मानव अवरोहण कर रहा तिमिर के शभ्रवल गत मं,

लिल्पी / २१३

प्रो की आसुरी शक्ति जन का अंतर विपर रहा जीवन प्रमत्त हो बहिजगत में ! रूढि रुग्ण नतिकता से झ्राक्नात चेतना देख नही पा रही प्रगति का पथ दिग्प्रम मातव का ही हुदय क्षोभ अणु विस्फोटक बनत्त महानाश का आवाहन कर रहा घरा पर सख्यात्रों में वद्ध संगठित इधर क्षुपा है, उगन रहा है उधर काम अ्वचेतन तम॑, क्षुपा काम से दीण शीण हो लोक चेतवा आरोहण के विमुष्त, भटकवी अधोमुखी हो

(सम्पता का विनाशसूचक वाद्य समीत्)

देखो प्रिय, विराट भीष्म सौ दय नाश का, अद्भुत श्री शोभा हैं दारंण महाध्वस की

महा वब्याल सा रत सहुस्त फन तान गयन में महानाक्ष फूत्कार भर रहा बच्च घोष कर ! गरल फंन वे उगल लहकते धूमिल बादल महामृत्यु के कुश्डल मार दिश्वाओ्रे म॑ वह भाट रहा युग कचुल भीयण थ्र वकार की दात शत दावाएँ बडवानल की ज्वालाएं चाट रही गहनो, गिरियो, सागर लहरो को, सुरंग स्फुलिगां की फुहार भे भू को विखरा,--- ऋर भर पडता तडित चकित हो तारापथ ज्यों ! घोर बवण्डर, प्रवल प्रभजनन भ्रदुह्ास भर पख ग्रश्व दैत्यो से उडकर, निखित भवन को कुचल रहे निज मत्य मत्त उद्धत ढापो से !

घुघ धूल बन निखिल भूत घुमत प्रलय के विकट मेंबर से चकाकार घुसड़ अम्बर में!

उछल रहे पवत दुक से मूल भ्रष्ट हो, केपत अगद चरण, खिसकते गंव शिखर पिर, फूट रहे निभर निपात शत्त तडित स्वलित हो, विगसित प्रस्तर खण्डो थे वाप्पो से फेनिल '

उमड रहा अम्बुधि शत फत जल स्तम्भा में उठ, हिल्लोलोीं पर वललोले करती आरोहण, बाष्प घूम बत छितक रहे सतरेंग जल के कण स्पीत सीकरा से, सपख सर्या से लोडित !

मूमि कम्प शत दौड रहे क्षत परा-वक्ष पर दिला झस्थियां को, मासल रज को बदेरते, कट फट पड़ती ज्वालामु्ियाँ विक्ट घोष कर द्रद्ित रक्त मज्जा उडलती धरा उदर से--. हृदय क्षीभ ज्यो उगल उंदाला मं, चमनो मं थूक रही हू! नभ के मुख पर घोर घुणा स॑ !

२१४ / वत प्रधावलो

प्रणु लपद पुफकार भरी जीने चटकाकर आ्रात्मसात्‌ कर रही पदार्था के तत्वा का, ज्वल्ति द्रदों से पदत दुट रहे पृथ्वी पर गहरे गर्तों में विदीण कर चरावक्ष को! सिह गुहाल्नो में दहाड़ते महात्रात से, गज चिघाड़ते जल सीकर वर्सा सूडा से, दीप्त धूमत्र श्गों से आहत ऋक्ष कदते, गिर भिर पडते विहग, रुदन करते कषि कप कोपू ! विचलित मत हो प्रिये, सवरण करो दया को, यह केवल दु स्वप्न मात्र है युग के मत का, तुम त्रिकाल दर्णषिवी शविति हो मेरे उर की, देख रही हो केवल सम्भावित भविष्य को / अविनाशी हैं तत्व अखिल, अधिनाशी है हम, ग्विनादशी है अमर चेतना क्षर जीवा की, नाश नहीं हाता विकास प्रिय भ्रमुत संत्य का मिथ्या का सहार प्रवश्यम्भावी जगे में ! पुन लिभत्न सेपस्य लोक म॑ निज कौशल से नवल सष्टि तुम सुजन करोगी महाकाश से,--- पराशक्ति के महानद से अभिप्ररित हो! आग्रो हम तुम लय हो जायें श्रव परोक्ष मे ! (प्रसत व्यस्त वेश में सहसा भयभीत वागरिको का प्रवेश)

दौड़ रह शत प्रलंण घरा का बक्ष दीरते, रोद रही लपटे पावर के भूधर पंग धर, टूट पड़े शत्त नरक, बरसते €ुण्ड मण्द हत, छूट गये रोरव के भूत पिशाच प्रेत हो! कंड कड़ करते ऋद्ध बच्च, पट फूट पड़ते सिर, रक्त मास्त मज्जा उडते क्षण घूम आप बने -- फूट गया पृथ्वी के भीपण पापों का घट ! !

लुज पुज मामल तन पल मे होते शोकल, चटक भ्रस्थि पजर क्षण मिलते भूरज म॑ ! तन्तु-जाल सी त्वच! सिहरती भूलख दाप से, छिनन प्लियाँ, छितर टहमियो-सी पत॒कर की, चरमर जल उठती पल मे दात मोम शिखा सी चीत्कारें करती चीत्कारें छूट कण्ठ से, मूज प्रतिध्वनिया-न्सी, ठत्कषण देह मुक्त हो, बाल वृद्ध स्त्री पुछप युवक झगणित भिरीह जन निमम वेदी पर चढते दारुण दिनाश की

महामृत्यु मुह फाड नयानक नरक गुहासा निगल रटो भू को, सौसो मे सीच मशक-्सी -- प्रोधे मुह गिर नगर लोठत घरा गभ म,

चिल्‍ल्पी /२१५

गतों में घेंस, उछल स्फीत धूमिल शिखरो म॑ ! छायाग्रो से कंप्त उडत--दर॒य पुरा के, भस्म शेष प्रासाद दीखते खडे यधावत्‌,-- घूम रहे भू भ्रात, मेंबर में पड़ी नावसे'! छायी घोर तुमुल विभीपषिका जन घरणी पर वरस रही परावक धाराएँ रक्त सूय से भय, विभीत हो रहा भयकरता से अपनी, भगदड हो मच गयी प्रकृति के तत्वा में ज्यो-- भाग रहा जीवन प्रपनी ही छाया से डर, मिज प्रन्तिम चरणों पर लेंगडाता, डगमग डग | (तिजी से प्रस्थान) (सेमिको तथा अमिको के देश में कुछ लोगो का प्रवेश) कुछ स्वर॒ जूक रहे अणु के दानव से भू के जनगण, जूक रहे है महानाद्य से श्रपराजित जन, भ्रव निसग॒ के तत्वों ने झपना अ्दम्य बल जम मन मे भर दिया, मनुज की मास पेशियाँ पवत-सी उठ रोक रही दुधप शजु को ! नाच रहा जन के शोणित में जीवन परावक दोड रही उमत्त शिराप्रों में शत विद्युत, बहते है उनचास पवन उनकी श्वासां में भीत नहीं होगा मानव इस महानाश से, विश्व ध्वस से लोक करेंगे नव जग निर्मित,-- श्री समत्वमय मनुष्यत्व को नव्य जाम दे! कुछ स्वर॒ फिर से मानव शिशु खेलेंगे भू इमशान मे, पुन बहेगी जग के मरुं में जीवन धारा, मरुत भर रहे प्रबल शवित जन के प्राणा मं, विस्तत करता वरुण तरुण वक्ष स्थल उनका भस्मसात कर रही अ्रग्नि जीवन का कदम, मुवत हो रहा इद्बगासन फिर महायाल्र से, शेप ऊध्व फन खोल उठाता भू को ऊपर फहराते दिड नाग मनुज की विजय ध्वजा को |

तोसरा दृदय

[काल यापन सूचक वाद्य सगीत दस के बाद का दृदय प्ररित का प्रकोप शा हो गया है, कुछ बलिष्ठ हाथ फाबड्डे, कुदाल भ्रादि लेकर प्वत्त के ढेर फो खोदते हुए बोच में गा रहे हैं।] गीत खोद, खोद रे, हार शान्त हुई अग्ति वष्टि ध्वस शेप भग्त सप्टि,

२१६ / पत प्रथावलो

एक स्वर